
वर्किंग ऑवर्स में बड़ा बदलाव लाने की तैयारी
कर्नाटक सरकार राज्य के आईटी, बायोटेक और स्टार्टअप सेक्टर में कार्यरत कर्मचारियों के लिए कार्यदिवस को मौजूदा 8 घंटे से बढ़ाकर 10 घंटे करने की योजना पर काम कर रही है। इस बदलाव के तहत कर्मचारियों को सप्ताह में चार दिन 10-10 घंटे काम करवाकर तीन दिन की छुट्टी देने का विकल्प भी दिया जा सकता है। यह प्रस्ताव सरकार द्वारा इंडस्ट्रियल एंप्लॉयमेंट स्टैंडिंग ऑर्डर्स (IEOS) में संशोधन के तहत लाया जा रहा है।
फ्लेक्सिबल मॉडल की ओर बढ़ती सरकार
सरकार का कहना है कि यह कदम कार्य संस्कृति को लचीला बनाने, वैश्विक प्रतिस्पर्धा में राज्य को मजबूत करने और निवेश को आकर्षित करने के उद्देश्य से उठाया जा रहा है। प्रस्तावित मॉडल में कंपनियों को विकल्प मिलेगा कि वे सप्ताह में 4 दिन 10 घंटे के वर्क शेड्यूल के तहत कर्मचारियों से काम लें और उन्हें 3 दिन की छुट्टी दें।
कर्मचारियों के बीच चिंता का माहौल
हालांकि सरकार इस बदलाव को एक विकल्प के रूप में पेश कर रही है, लेकिन कर्मचारियों में इसको लेकर चिंता देखी जा रही है। उनका मानना है कि पहले से ही निजी जीवन और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन कठिन होता जा रहा है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि हर कर्मचारी की एक व्यक्तिगत ज़िंदगी भी होती है। कार्यदिवस में दो घंटे की बढ़ोतरी किसी व्यक्ति के पूरे जीवन चक्र पर असर डाल सकती है — चाहे वह पारिवारिक समय हो, मानसिक स्वास्थ्य हो या सामाजिक जुड़ाव।
“मॉडर्न गुलामी” जैसे शब्दों से उठे सवाल
कुछ कर्मचारी समूहों और सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। ट्विटर पर #ModernSlavery और #10HourWorkDay जैसे हैशटैग ट्रेंड कर चुके हैं। हालांकि सरकार का पक्ष है कि यह अनिवार्य नहीं होगा और कर्मचारियों की सहमति के बिना कोई बदलाव नहीं किया जाएगा।
ट्रेड यूनियनों की प्रतिक्रिया
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) और अन्य श्रमिक संगठनों ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है। यूनियनों का कहना है कि सरकार को ऐसे निर्णय लेने से पहले कर्मचारियों की सामाजिक और मानसिक जरूरतों पर भी विचार करना चाहिए। हालांकि यह विरोध तीव्र नहीं है, लेकिन वे चाहते हैं कि कार्य घंटों को बढ़ाने से पहले व्यापक विमर्श हो।
सरकार की सफाई: ये सिर्फ एक विकल्प है, कोई बाध्यता नहीं
राज्य के श्रम विभाग ने इस मुद्दे पर स्पष्टीकरण देते हुए कहा है कि यह एक अनिवार्य नियम नहीं होगा, बल्कि एक वैकल्पिक व्यवस्था होगी जो कर्मचारियों और नियोक्ताओं के आपसी समझौते पर आधारित होगी।
श्रम मंत्री के अनुसार, “हम कोई कठोर व्यवस्था लागू नहीं कर रहे हैं। यह सिर्फ एक ऑप्शन है। जिन कंपनियों और कर्मचारियों को यह मॉडल उचित लगेगा, वे इसे अपना सकते हैं।”
किस सेक्टर पर होगा लागू, किन पर नहीं
सरकार ने साफ किया है कि यह प्रस्ताव केवल आईटी, बायोटेक और स्टार्टअप कंपनियों पर लागू होगा। मैन्युफैक्चरिंग, निर्माण या पारंपरिक उद्योगों पर इसका कोई असर नहीं पड़ेगा। यह प्रस्ताव केवल उन्हीं कंपनियों के लिए होगा जो अधिसूचित श्रेणी के तहत आती हैं।
अंतिम निर्णय बाकी, सुझाव आमंत्रित
फिलहाल यह प्रस्ताव प्रारंभिक स्तर पर है। सरकार ने इस पर सभी हितधारकों से सुझाव मांगे हैं। अंतिम फैसला सभी पक्षों — सरकार, कंपनियों और कर्मचारियों — की सहमति और राय के आधार पर लिया जाएगा।
निष्कर्ष
कार्य घंटों में यह बदलाव एक बड़ा प्रशासनिक और सामाजिक कदम हो सकता है। यह देखना बाकी है कि कंपनियां इसे कैसे अपनाती हैं और कर्मचारी इसे कैसे स्वीकार करते हैं।
Author: THE CG NEWS
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