श्रीलंका का सख्त रुख: किसी कीमत पर कच्चाथीवू द्वीप नहीं छोड़ेंगे, भारतीय मछुआरों पर समुद्री सीमा लांघने का आरोप

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भारत और श्रीलंका के बीच लंबे समय से विवाद का कारण बने कच्चाथीवू द्वीप को लेकर श्रीलंकाई सरकार ने एक बार फिर सख्त रुख अपनाते हुए स्पष्ट कहा है कि यह द्वीप पूरी तरह से श्रीलंका की संप्रभुता का हिस्सा है और इसे किसी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा। श्रीलंका का यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में तमिलनाडु के मछुआरों के गिरफ्तार होने की घटनाओं के चलते द्वीप को लेकर बहस दोबारा तेज हो गई है।

श्रीलंकाई विदेश मंत्री अली साबरी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा,
“कच्चाथीवू द्वीप पर श्रीलंका का पूरा कानूनी अधिकार है। भारत के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों के बावजूद, हम अपनी समुद्री सीमा और संसाधनों की रक्षा करना जानते हैं। भारतीय मछुआरे हमारी सीमाएं लांघकर गैरकानूनी तरीके से हमारे समुद्री क्षेत्र में मछली पकड़ रहे हैं, जो पूरी तरह अस्वीकार्य है।”

कच्चाथीवू द्वीप क्या है?

कच्चाथीवू एक छोटा निर्जन द्वीप है जो भारत और श्रीलंका के बीच पाक जलडमरूमध्य (Palk Strait) में स्थित है। इसका क्षेत्रफल मात्र 285 एकड़ है लेकिन रणनीतिक दृष्टि से यह काफी अहम है।

1950 और 1960 के दशक में यह विवादास्पद क्षेत्र था, लेकिन 1974 में भारत सरकार ने श्रीलंका के साथ एक समझौता किया, जिसके तहत यह द्वीप श्रीलंका को सौंप दिया गया। हालांकि, इस सौंपने को लेकर भारत के अंदर खासकर तमिलनाडु में लंबे समय से राजनीतिक विवाद बना हुआ है।

भारत में उठ रही आवाज़ें

तमिलनाडु के राजनीतिक दलों, विशेषकर AIADMK और DMK ने केंद्र सरकार से मांग की है कि कच्चाथीवू द्वीप पर भारतीय मछुआरों के पारंपरिक अधिकारों को फिर से बहाल किया जाए। पूर्व मुख्यमंत्री ओ. पन्नीरसेल्वम ने कहा,
“यह द्वीप ऐतिहासिक रूप से भारत का था और मछुआरों के पारंपरिक अधिकारों की अनदेखी करके इसे श्रीलंका को सौंपना भारत की भूल थी।”

भारतीय विदेश मंत्रालय ने फिलहाल इस विवाद पर संयम बरतते हुए केवल इतना कहा कि “हम श्रीलंका के साथ समुद्री सीमा और मछुआरा मामलों को लेकर द्विपक्षीय चर्चा कर रहे हैं, ताकि समाधान शांतिपूर्ण तरीके से निकाला जा सके।”

श्रीलंका का कानूनी तर्क

श्रीलंका ने अपने बयान में 1974 के इंदिरा गांधी-जूनियस जयवर्धने समझौते का हवाला देते हुए कहा कि भारत ने कच्चाथीवू को पूरी तरह से श्रीलंका की संप्रभुता के अंतर्गत मान लिया है।
विदेश मंत्री अली साबरी ने कहा,
“हमारे पास ऐतिहासिक, भौगोलिक और कानूनी सभी प्रकार के दस्तावेज़ मौजूद हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि कच्चाथीवू द्वीप हमारा ही हिस्सा है। भारत को अपने मछुआरों को हमारी सीमा में प्रवेश से रोकना चाहिए।”

मछुआरों की गिरफ्तारी और संसाधन दोहन का आरोप

श्रीलंकाई नौसेना ने हाल ही में 17 भारतीय मछुआरों को गिरफ्तार किया, जिन पर श्रीलंका की समुद्री सीमा में अवैध रूप से मछली पकड़ने का आरोप है। श्रीलंका का दावा है कि भारतीय मछुआरे ट्रॉलर और बड़े जाल का इस्तेमाल कर समुद्री जीवन को नुकसान पहुँचा रहे हैं।

पर्यावरणविदों का भी कहना है कि अंधाधुंध मछली पकड़ने से स्थानीय जैवविविधता प्रभावित हो रही है। श्रीलंका सरकार ने इस मुद्दे को “राष्ट्रीय सुरक्षा और संसाधन संरक्षण” से जोड़ते हुए इसे गंभीर माना है।

समाधान की संभावनाएं

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और श्रीलंका के बीच एक समुद्री प्रोटोकॉल और संसाधन साझा करने की संधि इस विवाद को सुलझा सकती है। इसके लिए द्विपक्षीय बातचीत और सीमित समय के लिए मछुआरों के पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देने जैसे विकल्प सामने आ सकते हैं।

भारत ने कई बार इस मुद्दे को राजनयिक चैनलों के ज़रिए उठाया है लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।

निष्कर्ष

कच्चाथीवू द्वीप को लेकर भारत और श्रीलंका के बीच बढ़ता तनाव दोनों देशों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंधों को चुनौती दे सकता है। जहां श्रीलंका संप्रभुता और पर्यावरण सुरक्षा की बात कर रहा है, वहीं भारत में मछुआरा समुदाय अपने पारंपरिक अधिकारों की बहाली की मांग कर रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या दोनों देश शांतिपूर्ण और कूटनीतिक रास्ते से इस जटिल मुद्दे का हल निकाल पाते हैं या नहीं।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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