पाकिस्तान में फिर तख्तापलट की आहट: सेना की बढ़ती सियासी दखलंदाजी, जनरल मुनीर को राष्ट्रपति और बिलावल को प्रधानमंत्री बनाने की चर्चा तेज

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पाकिस्तान एक बार फिर राजनीतिक संकट और सैन्य हस्तक्षेप के मुहाने पर खड़ा दिखाई दे रहा है। वहां की आंतरिक राजनीति में हलचल तेज़ हो गई है, और मीडिया रिपोर्ट्स व विश्लेषकों के हवाले से संकेत मिल रहे हैं कि पाकिस्तानी सेना फिर से सत्ता के गलियारों में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। चर्चा है कि आर्मी चीफ जनरल आसिम मुनीर को देश का अगला राष्ट्रपति बनाया जा सकता है, वहीं प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को हटाकर बिलावल भुट्टो जरदारी को सत्ता सौंपी जा सकती है।

यह घटनाक्रम तब सामने आ रहा है जब देश की अर्थव्यवस्था गहराते संकट से जूझ रही है, महंगाई चरम पर है, IMF की शर्तें सख्त होती जा रही हैं, और जनता का भरोसा लगातार घट रहा है। ऐसे में सेना की साजिशों और सियासी कूटनीति की चर्चाएं एक बार फिर पाकिस्तान को अशांत भविष्य की ओर ले जा सकती हैं।

सेना की छाया हमेशा से पाकिस्तान की राजनीति पर

पाकिस्तान की सियासत में सेना की दखलदाजी कोई नई बात नहीं है। 1947 में आज़ादी के बाद से ही पाकिस्तान में कई बार सीधा या परोक्ष रूप से सैन्य तख्तापलट हो चुका है। जनरल अय्यूब खान, जनरल जिया-उल-हक और जनरल परवेज़ मुशर्रफ इसके प्रमुख उदाहरण हैं जिन्होंने लोकतांत्रिक सरकारों को हटाकर सीधे सत्ता पर कब्जा जमाया।

हालांकि हालिया वर्षों में सेना ने सीधे सत्ता में आने के बजाय बैकडोर राजनीति के जरिए सरकारों को नियंत्रित करना शुरू किया है। यही रणनीति अब एक बार फिर दोहराई जा रही है, ऐसा विश्लेषकों का मानना है।

क्या है मौजूदा साजिश?

सूत्रों और पाकिस्तानी मीडिया में आ रही रिपोर्ट्स के अनुसार, सेना चाहती है कि मौजूदा राष्ट्रपति आरिफ अल्वी की जगह जनरल मुनीर को राष्ट्रपति पद सौंपा जाए। इससे उन्हें संवैधानिक शक्तियों के साथ सियासी नियंत्रण भी हासिल हो जाएगा।

वहीं दूसरी ओर, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की लोकप्रियता में गिरावट और उनके आर्थिक फैसलों से नाराजगी को देखते हुए, सेना उन्हें हटाना चाहती है। उनके स्थान पर पीपीपी (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी) के चेयरमैन बिलावल भुट्टो जरदारी को प्रधानमंत्री बनाए जाने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। बिलावल पहले विदेश मंत्री रह चुके हैं और सेना के साथ उनके रिश्ते अपेक्षाकृत सहज माने जाते हैं।

क्यों चाहती है सेना ये बदलाव?

राजनीतिक अस्थिरता से बचाव – सेना चाहती है कि सरकार उनके इशारों पर चले ताकि देश में उथल-पुथल से बचा जा सके।

आर्थिक फैसलों पर नियंत्रण – IMF और चीन से होने वाले समझौतों में सेना की भूमिका अहम बनती जा रही है। सेना चाहती है कि फैसले उनकी सहमति से हों।

आंतरिक सुरक्षा और आतंकवाद – बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा और सिंध में बढ़ती अशांति के चलते सेना खुद को निर्णायक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहती है।

इमरान खान का प्रभाव खत्म करना – पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जेल से रिहाई की मांग और उनकी बढ़ती लोकप्रियता से सेना असहज है। उन्हें सियासत से पूरी तरह हटाना सेना का मकसद है।

विपक्ष और जनता का रुख

हालांकि इस संभावित बदलाव को लेकर विपक्षी दलों और नागरिक समाज से आलोचना भी सामने आ रही है। कई नेताओं ने इसे ‘नरम तख्तापलट’ की संज्ञा दी है। सोशल मीडिया पर #MilitaryTakeover ट्रेंड कर रहा है और आम लोग लोकतंत्र की दुहाई देते नजर आ रहे हैं।

वहीं, इमरान खान की पार्टी पीटीआई के प्रवक्ता ने कहा,

“ये वही पुराना खेल है—जहां असली शासक वर्दी पहनता है और कठपुतली नेताओं को सामने खड़ा किया जाता है।”
अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पाकिस्तान की राजनीतिक दिशा पर निगाहें टिकी हैं। अमेरिका, चीन और IMF जैसे देशों और संगठनों के लिए पाकिस्तान की स्थिरता अहम है। अगर वाकई वहां सत्ता परिवर्तन की कोई असंवैधानिक कोशिश होती है, तो यह कूटनीतिक और आर्थिक समर्थन पर असर डाल सकती है।

निष्कर्ष

पाकिस्तान एक बार फिर ऐसे चौराहे पर खड़ा है जहां से या तो वह एक मजबूत लोकतंत्र की ओर आगे बढ़ सकता है, या फिर एक बार फिर सेना के साए तले सियासत करने को मजबूर हो सकता है। जनरल मुनीर को राष्ट्रपति बनाना और बिलावल को प्रधानमंत्री की कुर्सी सौंपना केवल चेहरों का बदलना नहीं होगा, बल्कि यह एक सुनियोजित रणनीति का हिस्सा होगा जो सत्ता की असली चाबी सेना के पास रखेगी।

आने वाले दिन पाकिस्तान की सियासत के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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