
कम नामांकन के आधार पर स्कूल मर्जर योजना के खिलाफ दायर याचिका; सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई पर सहमति दी
उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा राज्य के 5,000 से अधिक सरकारी प्राथमिक एवं उच्च प्राथमिक स्कूलों को बंद या मर्ज करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में दावा किया गया है कि इस फैसले से करीब 3.5 लाख छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर संज्ञान लेते हुए शीघ्र सुनवाई की बात कही है।
क्या है मामला?
राज्य सरकार ने जून 2025 में एक अधिसूचना जारी कर कम नामांकन वाले स्कूलों को मर्ज करने या बंद करने का निर्णय लिया था। इनमें वे स्कूल शामिल हैं जिनमें छात्रों की संख्या 20 या उससे कम है। सरकार का दावा है कि यह कदम संसाधनों के बेहतर प्रबंधन, गुणवत्ता सुधार और शिक्षकों की उपलब्धता को ध्यान में रखते हुए लिया गया है।
हालांकि, इस नीति का विरोध करते हुए कुछ शिक्षकों, छात्रों और सामाजिक संगठनों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनका कहना है कि यह निर्णय ग्रामीण और वंचित तबकों के बच्चों को शिक्षा से दूर कर देगा।
याचिकाकर्ताओं की दलील
याचिका में कहा गया है कि:
•यह निर्णय शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 का उल्लंघन करता है, जिसमें प्रत्येक बच्चे को अपने घर से अधिकतम 1 किमी के दायरे में प्राथमिक विद्यालय उपलब्ध होना चाहिए।
•स्कूल बंद होने की स्थिति में कई बच्चों, विशेषकर लड़कियों और दिव्यांग छात्रों के लिए स्कूल पहुंचना मुश्किल हो जाएगा।
•सरकार बिना स्थानीय समुदायों की राय लिए स्कूलों को बंद कर रही है, जो शिक्षा के अधिकार की मूल भावना के खिलाफ है।
•इसके अलावा, यह कदम असमानता बढ़ा सकता है और सरकारी स्कूलों से छात्रों के पलायन को बढ़ावा दे सकता है।
हाई कोर्ट का आदेश और सुप्रीम कोर्ट की स्थिति
इससे पहले इलाहाबाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के इस फैसले को बरकरार रखा था। कोर्ट ने यह माना कि यह प्रशासनिक और नीतिगत मामला है, जिसमें न्यायिक दखल का स्थान सीमित है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आज दायर याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि बच्चों के शिक्षा अधिकार से जुड़े ऐसे गंभीर मामलों में संविधानिक समीक्षा की जरूरत हो सकती है।
सरकार का पक्ष
उत्तर प्रदेश सरकार का कहना है कि:
•राज्य में 29,000 से अधिक स्कूलों में छात्र संख्या बहुत कम है, जिससे शिक्षकों की नियुक्ति और संसाधनों का प्रयोग अप्रभावी हो रहा है।
•मर्जर नीति के माध्यम से छात्रों को बेहतर सुविधाओं वाले स्कूलों में स्थानांतरित किया जाएगा।
•सरकार ने यह निर्णय समेकित विकास और शिक्षा सुधार के लिए लिया है, न कि स्कूलों को बंद करने की मंशा से।
शिक्षा मंत्री ने कहा, “हम शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए प्रतिबद्ध हैं और यह योजना उसी दिशा में एक कदम है।”
क्या कहते हैं शिक्षा विशेषज्ञ और विपक्ष?
•शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि स्कूल मर्जर की प्रक्रिया में सावधानी बरतने की जरूरत है, ताकि बच्चों को शैक्षणिक नुकसान न हो।
•विपक्षी दलों, खासकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने इसे गरीब विरोधी नीति करार दिया है। उन्होंने कहा कि इससे ग्रामीण शिक्षा प्रणाली को भारी नुकसान पहुंचेगा।
आगे की राह
सुप्रीम कोर्ट अब इस मामले में अगले सप्ताह विस्तृत सुनवाई करेगा। यह देखा जाना बाकी है कि क्या शीर्ष अदालत राज्य सरकार की नीति को वैध मानती है या शिक्षा के अधिकार के तहत हस्तक्षेप करती है।
Author: THE CG NEWS
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