वैश्विक बाल टीकाकरण में मामूली प्रगति, फिर भी 1.4 करोड़ बच्चे “शून्य-खुराक” वाले: WHO/UNICEF रिपोर्ट

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संयुक्त राष्ट्र की स्वास्थ्य और बाल कल्याण एजेंसियों, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूनिसेफ (UNICEF) द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट में वैश्विक बाल टीकाकरण को लेकर चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में बाल टीकाकरण में कुछ हद तक सुधार हुआ है, लेकिन अब भी लगभग 1.4 करोड़ बच्चे ऐसे हैं जिन्हें जीवन रक्षक टीकों की एक भी खुराक नहीं मिली है। ऐसे बच्चों को “शून्य-खुराक बच्चे” (Zero-dose children) कहा जाता है।

टीकाकरण में मामूली सुधार लेकिन लक्ष्य से दूर

2023 में दुनिया भर में लगभग 1.28 करोड़ बच्चों को डिप्थीरिया, टेटनस और काली खांसी (DTP) की पहली खुराक मिली, जो 2022 के मुकाबले थोड़ा अधिक है। हालांकि, महामारी से पहले 2019 में यह संख्या 1.23 करोड़ थी, जिससे यह स्पष्ट होता है कि टीकाकरण कार्यक्रम पूरी तरह से अभी भी पटरी पर नहीं लौटे हैं।

कोविड-19 महामारी का अब भी असर

रिपोर्ट के अनुसार, कोविड-19 महामारी ने स्वास्थ्य प्रणालियों पर गहरा असर डाला है, जिससे नियमित टीकाकरण सेवाएं बाधित हुईं। हालाँकि पिछले दो वर्षों में प्रयास तेज हुए हैं, लेकिन अब भी बहुत से देशों में स्वास्थ्य सेवाएं महामारी के बाद की चुनौतियों से पूरी तरह उबर नहीं पाई हैं।

सबसे अधिक प्रभावित देश

रिपोर्ट में कहा गया है कि शून्य-खुराक बच्चों की सबसे बड़ी संख्या भारत, नाइजीरिया, इंडोनेशिया, इथियोपिया और फिलीपींस जैसे देशों में पाई गई है। ये देश जनसंख्या की दृष्टि से बड़े हैं और इनमें स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच अब भी असमान है। भारत में स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन चुनौतियाँ अब भी बरकरार हैं, खासकर ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में।

भारत में स्थिति और प्रयास

भारत सरकार द्वारा चलाए जा रहे मिशन इंद्रधनुष और टीकाकरण अभियान ने बच्चों तक टीके पहुँचाने में मदद की है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने शून्य-खुराक बच्चों की संख्या कम करने के लिए विशेष योजनाएँ भी लागू की हैं। देश के कई राज्यों में वैक्सीन कवरेज में सुधार हुआ है, लेकिन अब भी आदिवासी क्षेत्रों, शहरी झुग्गियों और सीमावर्ती इलाकों में जागरूकता की कमी और संसाधनों की सीमाएँ बाधा बन रही हैं।

यूनिसेफ और WHO की चेतावनी

WHO और यूनिसेफ ने चेतावनी दी है कि अगर शून्य-खुराक बच्चों की संख्या पर जल्द नियंत्रण नहीं पाया गया, तो भविष्य में खसरा, पोलियो और अन्य जानलेवा बीमारियों के प्रकोप बढ़ सकते हैं। उन्होंने सरकारों से अपील की है कि वे निवेश को बढ़ाएँ, समुदायों को सशक्त करें और वैक्सीन वितरण तंत्र को मजबूत करें।

वैक्सीन तक पहुंच का अधिकार

संयुक्त राष्ट्र एजेंसियों ने ज़ोर दिया कि हर बच्चे को जीवन रक्षक वैक्सीन तक पहुंचना उसका अधिकार है। इसके लिए सिर्फ टीकों की उपलब्धता ही नहीं, बल्कि समुदायों में भरोसा और स्वास्थ्यकर्मियों की पर्याप्त संख्या भी आवश्यक है।

डिजिटल और सामुदायिक समाधान की जरूरत

रिपोर्ट में कहा गया है कि तकनीक की मदद से डेटा को ट्रैक करके टीकाकरण अभियान को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। साथ ही, स्थानीय समुदायों को जोड़कर जागरूकता अभियान चलाना भी ज़रूरी है ताकि माता-पिता टीकों के महत्व को समझें और समय पर अपने बच्चों का टीकाकरण कराएं।

निष्कर्ष

रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि हालाँकि वैश्विक स्तर पर कुछ प्रगति हुई है, लेकिन टीकाकरण की गति अब भी धीमी है। 1.4 करोड़ “शून्य-खुराक” बच्चों की उपस्थिति एक गंभीर चिंता का विषय है। यह सिर्फ स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और विकासात्मक चुनौती भी है। अगर समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह आने वाले वर्षों में वैश्विक स्वास्थ्य के लिए बड़ी बाधा बन सकता है। भारत सहित सभी देशों को टीकाकरण पर ध्यान केंद्रित करते हुए एक सशक्त, समावेशी और सतत स्वास्थ्य तंत्र की ओर बढ़ना होगा।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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