भारत में तेजी से बढ़ रही हृदय रोग की दवा की खपत: बदलती जीवनशैली और तनाव बन रहे बड़ी वजह

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दिल की दवाओं की बिक्री में 50% तक का उछाल

भारत में दिल की बीमारियों से जुड़ी दवाओं की बिक्री में बीते कुछ वर्षों में लगभग 50% तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। यह आंकड़ा सिर्फ एक बिजनेस ग्राफ नहीं, बल्कि इस बात का संकेत है कि देश की बड़ी आबादी अब हृदय रोगों की चपेट में आती जा रही है। मेडिकल रिपोर्ट्स और विशेषज्ञों की मानें तो यह बढ़ोतरी केवल आबादी बढ़ने या उम्रदराज़ लोगों तक सीमित नहीं, बल्कि युवाओं में भी दिल की बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं।

क्या कहती हैं मेडिकल रिपोर्ट्स?

पिछले पांच सालों के आंकड़े बताते हैं कि भारत में कार्डियोवस्कुलर दवाओं की बिक्री में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। खासतौर पर ब्लड प्रेशर कंट्रोल करने वाली दवाएं, कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवाएं और ब्लड थिनर की मांग लगातार बढ़ रही है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन और फार्मा डेटा कंपनियों के अनुसार, कोविड-19 के बाद इस बढ़ोतरी की रफ्तार और भी तेज हुई है। इस दौरान न केवल पुराने मरीजों में लक्षण बढ़े, बल्कि बड़ी संख्या में नए मरीज भी सामने आए।

बदलती जीवनशैली बन रही सबसे बड़ा कारण

हृदय रोग विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय समाज में तेजी से बदलती जीवनशैली इसका मुख्य कारण है। लंबे समय तक बैठने वाली दिनचर्या, फिजिकल एक्टिविटी की कमी, अनियमित खानपान, जंक फूड का अधिक सेवन, नींद की कमी और मानसिक तनाव – ये सभी कारण दिल की बीमारियों की जड़ में हैं। डॉ. अमित राठी, वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ, का कहना है, “आजकल 30-35 साल के युवक भी हार्ट अटैक की चपेट में आ रहे हैं। यह केवल जेनेटिक्स की वजह से नहीं हो रहा, बल्कि यह हमारी दिनचर्या और आदतों का सीधा नतीजा है।”

कोविड-19 के बाद दिल की सेहत पर असर

विशेषज्ञ बताते हैं कि कोविड-19 महामारी के बाद लोगों में दिल की समस्याएं पहले से अधिक देखने को मिल रही हैं। वायरस के बाद की थकावट, फेफड़ों और दिल पर दबाव, और लंबे समय तक तनाव में रहने के कारण हार्ट रिलेटेड दिक्कतें बढ़ीं। कोविड के इलाज में दी गई कुछ दवाओं का भी कार्डियक हेल्थ पर असर पड़ा। इसके अलावा, महामारी के समय में हुए लॉकडाउन, शारीरिक निष्क्रियता और मानसिक दबाव ने भी दिल की सेहत पर असर डाला।

युवाओं में बढ़ रहा हार्ट अटैक का खतरा

चिंता की बात यह है कि अब हार्ट अटैक या हृदय संबंधी समस्याएं केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहीं। 25-40 साल की उम्र वाले युवाओं में भी हाई बीपी, हाई कोलेस्ट्रॉल और स्ट्रेस-इंड्यूस्ड हार्ट कंडीशन्स तेजी से सामने आ रही हैं। डॉ. प्रिया गुप्ता, कार्डियोलॉजिस्ट, बताती हैं, “आज के युवा काम के प्रेशर, नींद की कमी और स्मार्टफोन आधारित लाइफस्टाइल में उलझे हैं। ये सभी चीजें सीधे दिल को प्रभावित करती हैं। जब तक लक्षण सामने आते हैं, तब तक बीमारी गंभीर हो चुकी होती है।”

डॉक्टर्स की सलाह: दवा नहीं, जागरूकता जरूरी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि दिल की दवाओं की बढ़ती बिक्री एक चेतावनी है। इसका मतलब है कि हम इलाज तो कर रहे हैं, लेकिन रोकथाम पर ज़ोर नहीं दे रहे। डॉ. राठी बताते हैं कि हृदय रोगों से बचाव के लिए नियमित एक्सरसाइज, हेल्दी डाइट, तनाव कम करने की तकनीकें जैसे योग और मेडिटेशन, और समय-समय पर चेकअप ज़रूरी हैं। वे कहते हैं, “दवा एक अस्थायी समाधान है, स्थायी समाधान जीवनशैली में बदलाव है।”

सरकार और समाज की भूमिका भी अहम

दिल की बीमारियों से लड़ाई सिर्फ व्यक्ति की नहीं, समाज और सरकार की भी जिम्मेदारी है। स्कूलों में स्वास्थ्य शिक्षा, ऑफिसों में वेलनेस प्रोग्राम, पार्कों की व्यवस्था, योग और फिटनेस को बढ़ावा देना – ये सभी कदम हृदय रोग के खतरे को कम कर सकते हैं। इसके अलावा, मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को भी जागरूकता फैलाने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

निष्कर्ष

भारत में दिल की दवाओं की बिक्री में 50% की बढ़ोतरी कोई सामान्य बात नहीं है। यह संकेत है कि हम तेजी से एक ऐसे दौर में जा रहे हैं जहां छोटी उम्र में ही दिल कमजोर हो रहा है। यदि अब भी हमने अपने खानपान, दिनचर्या और मानसिक स्थिति को नहीं संभाला, तो आने वाले समय में यह आंकड़े और भयावह हो सकते हैं। जरूरत है, हम सिर्फ दवा पर नहीं, अपनी आदतों पर भरोसा करें – क्योंकि दिल को दवाओं से ज्यादा जरूरत है देखभाल की।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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