भारी बारिश से लेकर सूखे की मार तक, देश में मानसून 2025 ने पैदा की मिली-जुली तस्वीर

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देशभर में इस साल का मानसून एक असमान प्रवृत्ति के साथ सामने आया है, जिसने कहीं अत्यधिक वर्षा से बाढ़ जैसे हालात पैदा किए, तो कहीं मानसून की सुस्ती ने सूखे की आहट दे दी है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की ताजा रिपोर्ट और राज्यों से आ रही जमीनी हकीकत दोनों इस साल की बरसात को “मिश्रित और क्षेत्र विशेष पर केंद्रित” मानते हैं। जून के आखिर से शुरू हुआ मानसून अब तक अपने पूरे विस्तार में है, लेकिन इसका असर अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग तरह से पड़ा है।

उत्तर भारत में जहां सामान्य से अधिक बारिश दर्ज की गई है, वहीं पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में अब भी वर्षा की कमी बनी हुई है। यह स्थिति न केवल किसानों की चिंता बढ़ा रही है, बल्कि जल संसाधन, ऊर्जा उत्पादन और जीवन व्यवस्था पर भी व्यापक असर डाल रही है। महाराष्ट्र, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल और केरल जैसे राज्यों में अतिवृष्टि से बाढ़ जैसे हालात बने हैं, जबकि झारखंड, ओडिशा और बंगाल के कई हिस्सों में अब भी धरती फटने की प्रतीक्षा कर रही है।

उत्तरी भारत में सामान्य से अधिक बारिश, लेकिन नुकसान भी भारी

उत्तर भारत में मानसून ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया है। उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे क्षेत्रों में जून के अंत से लेकर जुलाई के तीसरे सप्ताह तक सामान्य से 15 से 30 फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई है। इससे सिंचाई और जलाशयों को फायदा तो मिला है, लेकिन लगातार तेज बारिश के कारण कई जगहों पर जलभराव और सड़क क्षति की घटनाएं भी देखने को मिली हैं।

दिल्ली-एनसीआर में मानसून की बारिश ने इस बार कई बार रिकॉर्ड तोड़े हैं। यमुना का जलस्तर खतरे के निशान से ऊपर चला गया, जिसके चलते निचले इलाकों में पानी घुस गया और हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भेजना पड़ा। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन और सड़कें बहने की घटनाओं ने एक बार फिर पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता को उजागर किया है।

पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में बरसात की कमी, खेती पर संकट

पूर्वोत्तर भारत, जो आम तौर पर मानसून की पहली मार सहता है, इस बार अपेक्षा से काफी कम बारिश प्राप्त कर रहा है। असम, मेघालय, मणिपुर और नागालैंड जैसे राज्यों में औसतन 25 से 40 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई है। इससे नदी जलस्तर सामान्य से नीचे हैं और धान की बुवाई प्रभावित हुई है।

बिहार और झारखंड में भी स्थिति अच्छी नहीं है। इन राज्यों में जुलाई में बारिश की कमी ने खरीफ फसलों की बुआई को सीधे तौर पर प्रभावित किया है। राज्य सरकारों ने किसानों से संयम बरतने और वैकल्पिक फसलों की ओर रुख करने की सलाह दी है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर अगस्त की शुरुआत तक बारिश सामान्य नहीं होती है, तो खाद्यान्न उत्पादन में गिरावट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर तय माना जाएगा।

पश्चिमी भारत में अतिवृष्टि से नुकसान, बाढ़ की स्थिति

महाराष्ट्र और गुजरात में मानसून ने कुछ ही दिनों में महीनों की बारिश दे दी है। नागपुर, नासिक, रायगढ़, पुणे, अहमदनगर और मुंबई के कई हिस्सों में जलभराव से सामान्य जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। कोल्हापुर और सांगली जिलों में नदियां खतरे के निशान पर बह रही हैं।

गुजरात में सौराष्ट्र और कच्छ के कई हिस्सों में तेज बारिश के कारण सड़कें कट गई हैं और बिजली आपूर्ति बाधित हो गई है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यही प्रवृत्ति रही, तो कपास और मूंगफली की फसलों को गंभीर नुकसान हो सकता है।

सरकारी एजेंसियां लगातार निगरानी कर रही हैं और जरूरत के अनुसार राहत कार्यों में तेजी लाई जा रही है, लेकिन मानसून की अनिश्चितता ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है।

दक्षिण भारत में संतुलित मानसून, कुछ जगहों पर भारी बारिश

केरल और कर्नाटक जैसे राज्यों में मानसून ने अपेक्षाकृत संतुलन बनाए रखा है। हालांकि, केरल के कोट्टायम, कोझीकोड, त्रिशूर और एर्नाकुलम जिलों में भारी बारिश से बाढ़ जैसी स्थिति बनी है। NDRF की टीमों को तैनात किया गया है और प्रभावित इलाकों में राहत कार्य जारी हैं।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में भी बारिश सामान्य के आसपास रही है। तमिलनाडु, जो आम तौर पर पूर्वोत्तर मानसून पर निर्भर करता है, वहां अब तक ज्यादा प्रभाव नहीं देखा गया है।

खरीफ बुआई में प्रगति, लेकिन अनिश्चितता बनी हुई है

कृषि मंत्रालय के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अब तक देशभर में 70.8 मिलियन हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बुआई हो चुकी है, जो पिछले वर्ष की तुलना में 4.1 प्रतिशत अधिक है। धान, दालें और तिलहनों की बुआई में भी तेजी देखी गई है।

हालांकि, पूर्वी भारत में वर्षा की कमी ने कुछ राज्यों में बुआई को बाधित किया है। मौसम विभाग का कहना है कि यदि अगस्त के पहले सप्ताह में अच्छी बारिश होती है, तो यह कमी पूरी हो सकती है।

जलाशयों का जलस्तर सामान्य के करीब

केंद्रीय जल आयोग के अनुसार, देश के प्रमुख जलाशयों में जलस्तर सामान्य के 85 प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जो औसतन संतोषजनक माना जा सकता है। विशेष रूप से पश्चिमी भारत में अधिक वर्षा से बांधों में जल स्तर तेजी से बढ़ा है।

हालांकि, पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों में जलाशयों का जलस्तर अपेक्षा से कम है, जो आने वाले दिनों में जल संकट की स्थिति उत्पन्न कर सकता है।

मौसम विभाग की भविष्यवाणी

भारतीय मौसम विभाग का कहना है कि अगले 5 से 7 दिनों में पूर्वी भारत, उत्तर-पूर्व और उत्तर भारत के कुछ हिस्सों में भारी बारिश की संभावना है। इससे किसानों को राहत मिल सकती है, लेकिन बाढ़ की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

आईएमडी ने यह भी बताया कि इस वर्ष मानसून की वापसी सामान्य समय यानी सितंबर के अंत में होगी, और कुल वर्षा सामान्य से 5 प्रतिशत अधिक रहने का अनुमान है।

निष्कर्ष

मानसून 2025 ने देश में एक बार फिर साबित किया है कि मौसम की अनिश्चितता अब सामान्य बात बन चुकी है। कहीं ज्यादा बारिश तो कहीं सूखा — यह नया सामान्य है, जिसके लिए किसानों से लेकर नीति-निर्माताओं तक को तैयार रहना होगा। आने वाले महीने भारत की खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की दिशा तय करेंगे।

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Author: THE CG NEWS

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