नाग पंचमी पर देशभर में आस्था की लहर, श्रद्धालुओं ने नाग देवता को अर्पित किया दूध और पूजन

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आज देशभर में नाग पंचमी का पर्व पारंपरिक श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के साथ मनाया गया। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाए जाने वाले इस पर्व का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन नाग देवता की पूजा करने से काल सर्प दोष से मुक्ति मिलती है, संतान सुख की प्राप्ति होती है और जीवन में समस्त संकटों का निवारण होता है। इस अवसर पर देश के विभिन्न हिस्सों में मंदिरों, नाग स्थलों और शिवालयों में सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।

मंदिरों में उमड़ा भक्तों का सैलाब, नागों को अर्पित किया गया दूध और पुष्प
देश के प्रमुख नाग मंदिरों जैसे उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर, काशी के काल भैरव परिसर में स्थित नाग स्थान, तथा दक्षिण भारत के नागाराज मंदिरों में आज सुबह से ही पूजन-अर्चन का क्रम आरंभ हो गया। भक्तों ने नाग देवता की प्रतिमाओं को दूध, चंदन, केसर, दूर्वा, पुष्प और लड्डुओं का भोग अर्पित किया। नाग पंचमी की पूजा में महिलाएं विशेष रूप से भाग लेती हैं, जो संतान सुख और परिवार की मंगलकामना के लिए व्रत रखती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में मिट्टी से नाग देवता की आकृति बनाकर उनकी पूजा की गई, तो वहीं कई स्थानों पर जीवित नागों की भी पूजा करते हुए लोग उन्हें दूध पिलाते देखे गए।

शिव मंदिरों में विशेष पूजन, कालसर्प दोष से मुक्ति के लिए उमड़ी भीड़
नाग पंचमी के दिन शिव पूजन का विशेष महत्व भी होता है। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु भगवान शिव के प्रमुख ज्योतिर्लिंगों – काशी विश्वनाथ, महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर, केदारनाथ आदि स्थानों पर पहुंचे और शिवलिंग पर नागों का प्रतिरूप चढ़ाकर दूध, बेलपत्र और जल अर्पित किया। कई ज्योतिषाचार्यों के अनुसार आज का दिन काल सर्प दोष की शांति के लिए अत्यंत फलदायी होता है। इसी उद्देश्य से विशेष पूजन व हवन अनुष्ठानों का आयोजन किया गया, जहां बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए।

लोक संस्कृति से भी जुड़ा है नाग पंचमी का गहरा संबंध
नाग पंचमी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण पर्व है। भारत की लोक परंपराओं में नागों को धरती की रक्षा करने वाले और वर्षा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। नाग को कृषि संस्कृति का संरक्षक भी माना गया है। कई स्थानों पर लोक गीतों, नृत्यों और मेलों के माध्यम से इस पर्व को मनाया जाता है। बिहार, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में लोक कथाओं पर आधारित झांकी और गायन-वादन के आयोजन भी देखने को मिले। बच्चों को नागदेव से जुड़े किस्से, जैसे कि समुद्र मंथन में वासुकी नाग की भूमिका, सुनाए गए।

आधुनिक चेतना के साथ पारंपरिक आस्था का समन्वय
इस वर्ष नाग पंचमी के अवसर पर जहां पुरातन परंपराओं का पालन किया गया, वहीं वन्य जीव संरक्षण और पर्यावरण संतुलन की चेतना भी दिखाई दी। कई धार्मिक संगठनों और वन विभागों ने अपील की कि जीवित सांपों को पकड़कर उनकी पूजा करना अमानवीय और असंवैधानिक है। नागों को दूध पिलाने की परंपरा पर वैज्ञानिकों ने भी सवाल उठाए और बताया कि नाग दूध नहीं पीते और इससे उनके स्वास्थ्य को नुकसान होता है। इसके बावजूद श्रद्धालु अपनी परंपरा और आस्था के अनुसार विधिपूर्वक पूजा करते रहे।

प्रशासन ने सुरक्षा के किए थे पुख्ता इंतजाम
नाग पंचमी के पर्व को देखते हुए प्रशासन ने कई बड़े मंदिरों और पूजा स्थलों पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए। भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिसकर्मी तैनात किए गए और नगर निगम द्वारा स्वच्छता व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त रखा गया। कई स्थानों पर सुबह से लेकर दोपहर तक लंबी कतारें देखी गईं, लेकिन कोई बड़ी अप्रिय घटना की खबर नहीं मिली।

निष्कर्ष
नाग पंचमी का पर्व भारतीय धर्म और संस्कृति का ऐसा उत्सव है, जिसमें प्रकृति, आस्था और अध्यात्म का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इस दिन नागों की पूजा केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि एक गहन सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। आज का दिन यह सिखाता है कि हर जीव का प्रकृति में स्थान है और उसका सम्मान मानव जीवन के संतुलन के लिए आवश्यक है। श्रद्धा और समर्पण के साथ मनाया गया यह पर्व हमें प्रकृति और देवत्व के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

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Author: THE CG NEWS

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