World Lung Cancer Day 2025: फेफड़ों के कैंसर के शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज़ करना पड़ सकता है भारी, समय रहते पहचान ही बचा सकती है जान

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विश्वभर में 1 अगस्त को ‘वर्ल्ड लंग कैंसर डे’ मनाया जाता है। यह दिन फेफड़ों के कैंसर से जुड़ी जागरूकता बढ़ाने, समय पर पहचान के महत्व को समझाने और इससे बचाव के उपायों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मनाया जाता है।

भारत में हर साल फेफड़ों के कैंसर के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं, और विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे सबसे बड़ा कारण लोगों द्वारा इसके शुरुआती लक्षणों को नज़रअंदाज़ करना है। स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, देश में कैंसर से होने वाली मौतों में सबसे बड़ा हिस्सा फेफड़ों के कैंसर का है, और यह चिंता का विषय बन चुका है।

समस्या की गंभीरता

एम्स दिल्ली के वरिष्ठ कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अजय भारद्वाज के मुताबिक, “फेफड़ों का कैंसर एक साइलेंट किलर की तरह काम करता है। इसके लक्षण आमतौर पर मामूली खांसी या सांस फूलने से शुरू होते हैं, जिन्हें लोग आम बीमारी मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। जब तक जांच करवाई जाती है, तब तक कैंसर तीसरे या चौथे चरण में पहुंच चुका होता है।”

उन्होंने बताया कि पुरुषों में फेफड़ों का कैंसर सबसे अधिक होता है, लेकिन हाल के वर्षों में महिलाओं में भी इसके मामले तेजी से सामने आए हैं, खासकर शहरी इलाकों में।

प्रमुख कारण: तंबाकू और प्रदूषण

विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत में फेफड़ों के कैंसर के सबसे प्रमुख कारणों में धूम्रपान, वायु प्रदूषण और औद्योगिक रसायनों के संपर्क को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

धूम्रपान अब भी देश में लंग कैंसर का नंबर वन कारण बना हुआ है। सिगरेट, बीड़ी और हुक्के का सेवन करने वालों में यह बीमारी सामान्य लोगों की तुलना में 20 गुना अधिक पाई जाती है। इसके साथ ही पैसिव स्मोकिंग, यानी आसपास धूम्रपान करने वालों का धुआं भी रोग का खतरा बढ़ाता है।

हाल के एक अध्ययन में यह भी सामने आया कि मेट्रो शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण भी अब लंग कैंसर के मामलों में बड़ा योगदान दे रहा है, खासकर उन लोगों में जो कभी धूम्रपान नहीं करते।

इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज

फेफड़ों के कैंसर की शुरुआती पहचान ही इसका सबसे अहम बचाव है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार यदि इन लक्षणों में से कोई भी लंबे समय तक बना रहे, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें:

लगातार खांसी या खांसी में खून आना

सांस लेने में परेशानी

सीने में लगातार दर्द

अचानक वजन कम होना

आवाज़ भारी होना या बदल जाना

बार-बार फेफड़ों में संक्रमण

इलाज संभव, लेकिन समय रहते ज़रूरी

अगर बीमारी की पहचान शुरुआती स्टेज पर हो जाती है, तो इलाज की सफलता दर काफी अधिक होती है। इसके इलाज में सर्जरी, कीमोथेरेपी, रेडिएशन, टारगेटेड थेरेपी और इम्यूनोथेरेपी शामिल हैं। हालांकि इलाज महंगा और समय लेने वाला हो सकता है, इसलिए बचाव ही सबसे सस्ता और असरदार उपाय माना जाता है।

डॉ. भारद्वाज कहते हैं, “भारत को एक ऐसे हेल्थ सिस्टम की जरूरत है जो कैंसर की जांच को सुलभ और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का हिस्सा बनाए। इसके अलावा, लोगों को भी अपने शरीर के संकेतों को गंभीरता से लेना सीखना होगा।”

सरकार और समाज की भूमिका

केंद्र सरकार ने हाल के वर्षों में कैंसर स्क्रीनिंग कैंप और तंबाकू विरोधी अभियान चलाए हैं, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि इसकी पहुंच अब भी सीमित है। ग्रामीण इलाकों में जागरूकता की भारी कमी है, जिससे मामलों की पहचान देर से होती है।

WHO के आंकड़ों के अनुसार, फेफड़ों के कैंसर से विश्व में हर साल लगभग 18 लाख मौतें होती हैं, जिनमें बड़ी संख्या भारत से आती है।

निष्कर्ष

विश्व फेफड़ा कैंसर दिवस का यही संदेश है कि बीमारी से डरने की नहीं, उसे समय रहते पहचानने और रोकने की जरूरत है। छोटी-छोटी आदतों में सुधार कर, धूम्रपान छोड़कर, प्रदूषण से बचाव कर और समय पर जांच करवा कर इस जानलेवा बीमारी से बचा जा सकता है।

याद रखें – लंग कैंसर साइलेंट होता है, लेकिन समय पर कदम उठाना आपकी जान बचा सकता है।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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