अमेरिका में 100 साल का सबसे बड़ा टैरिफ बोझ: हर नागरिक को ₹2 लाख सालाना नुकसान, वैश्विक मंदी की आशंका गहराई

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अमेरिका में मौजूदा टैरिफ नीति ने बीते एक सदी का रिकॉर्ड तोड़ दिया है। 2025 की दूसरी तिमाही तक, अमेरिका ने चीन, भारत, यूरोपीय संघ और अन्य प्रमुख व्यापारिक साझेदार देशों पर जो आयात शुल्क (टैरिफ) लगाए हैं, वह पिछले 100 वर्षों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। यह नीतिगत रुख अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भारी पड़ रहा है, जिसके चलते देश के हर नागरिक को औसतन सालाना दो लाख रुपये ($2,400) का नुकसान हो रहा है।

यह केवल अमेरिका की आंतरिक अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यापार और विकास दर पर भी नकारात्मक असर डाल रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह रुख जारी रहा तो दुनिया एक नई आर्थिक मंदी की ओर बढ़ सकती है।

बाइडेन प्रशासन की आक्रामक व्यापार नीति

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के प्रशासन ने 2023 के बाद से ‘अमेरिका फर्स्ट मैन्युफैक्चरिंग’ और ‘चीन से निर्भरता खत्म’ जैसे नारे देते हुए लगातार कई देशों पर भारी टैरिफ लगाए हैं। खासतौर पर टेक्नोलॉजी, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और एग्रो प्रोडक्ट्स जैसे क्षेत्रों में टैरिफ दरें 15% से बढ़ाकर 25% तक कर दी गई हैं।

2025 में भारत से आने वाले कुछ कृषि उत्पादों पर भी 25% टैरिफ लागू किया गया है, जिसे भारत ने ‘अविवेकपूर्ण और अनुचित’ बताया है। इसी तरह यूरोपियन यूनियन से आने वाली कारों और बैटरियों पर भी अतिरिक्त शुल्क लगाया गया है। अमेरिका ने यह तर्क दिया है कि घरेलू उद्योग को बचाने और चीन की असमान प्रतिस्पर्धा का जवाब देने के लिए यह कदम जरूरी है।

आम अमेरिकी को हर साल ₹2 लाख तक की चोट

‘नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च’ की हालिया रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है कि अमेरिका में लागू इन उच्च टैरिफों के कारण घरेलू कीमतें काफी बढ़ गई हैं। उपभोक्ताओं को अब रोज़मर्रा की चीज़ों से लेकर गैजेट्स, वाहन और खाद्य उत्पादों तक हर चीज के लिए अधिक भुगतान करना पड़ रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में टैरिफ के चलते औसतन एक अमेरिकी नागरिक को $2,400 (लगभग ₹2 लाख) अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ा। इसके अलावा, देश की मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में भी मांग में गिरावट देखी गई है, जिससे बेरोजगारी में भी मामूली बढ़ोतरी हुई है।

वैश्विक व्यापार पर असर, मंदी की आशंका गहराई

अमेरिका के इस टैरिफ-प्रभाव ने वैश्विक सप्लाई चेन पर भी प्रतिकूल असर डाला है। भारत, चीन, वियतनाम, मेक्सिको और जर्मनी जैसे देशों से अमेरिका में होने वाले निर्यात में गिरावट आई है, जिससे उन देशों के उद्योगों पर भी असर पड़ा है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक ने चेतावनी दी है कि यदि अमेरिका इसी तरह बहुपक्षीय व्यापार नियमों को ताक पर रखता रहा, तो वैश्विक GDP विकास दर 2025 के अंत तक 1.5% तक गिर सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और चीन के बीच व्यापार युद्ध पहले ही कई देशों के लिए मुश्किल खड़ी कर चुका है। अब अगर यह नीति भारत, यूरोप और अन्य सहयोगी देशों के खिलाफ भी अपनाई जाती है, तो वैश्विक निवेश और व्यापार में भारी गिरावट देखने को मिल सकती है।

भारत सहित कई देशों की प्रतिक्रिया

भारत ने अमेरिका द्वारा टैरिफ बढ़ाए जाने की आलोचना करते हुए इसे WTO के नियमों के खिलाफ बताया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह कदम वैश्विक दक्षिण (Global South) के हितों के खिलाफ है और इससे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

चीन ने भी अमेरिका के इस रवैये को ‘आर्थिक धमकी’ करार दिया है, जबकि यूरोपीय यूनियन ने संकेत दिए हैं कि वह WTO में औपचारिक शिकायत दर्ज कर सकता है।

निष्कर्ष

अमेरिका में बीते 100 वर्षों का यह सबसे बड़ा टैरिफ प्रहार घरेलू नागरिकों और वैश्विक अर्थव्यवस्था – दोनों पर भारी पड़ रहा है। आने वाले महीनों में अगर व्यापार नीति में बदलाव नहीं हुआ, तो दुनिया एक बार फिर वैश्विक मंदी की चपेट में आ सकती है। विशेषज्ञ अब इस बात पर नज़र बनाए हुए हैं कि अमेरिकी कांग्रेस और वैश्विक संगठन इस पर क्या रुख अपनाते हैं।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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