रूस के सस्ते तेल का आम आदमी को फायदा नहीं:तेल कंपनियों की कमाई 25 गुना तक बढ़ी, सरकार भी 46% टैक्स वसूल रही

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रूस से सस्ते कच्चे तेल की रिकॉर्ड खरीद के बावजूद पेट्रोल-डीजल के दामों में आम उपभोक्ता को अपेक्षित राहत नहीं मिली। वित्त वर्ष 2023-24 में सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों (ओएमसी)—IOC, BPCL और HPCL—की संयुक्त कमाई ऐतिहासिक रही और पिछली वित्त वर्ष की तुलना में 25 गुना से भी ज्यादा उछलकर करीब ₹86,000 करोड़ पर पहुँच गई। यह उछाल ऐसे समय आया जब घरेलू पंपों पर खुदरा कीमतें लंबे समय तक स्थिर रहीं और सस्ते रूसी कच्चे का लाभ कंपनियों के मार्जिन में ज्‍यादा दिखा। 

बीते डेढ़ साल में रूस भारत का सबसे बड़ा कच्चा तेल सप्लायर बना रहा। 2025 की पहली छमाही में भारत ने औसतन ~17.5–18 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी कच्चा आयात किया—जो कुल आयात का roughly एक-तिहाई से अधिक है। हालांकि early windfall वाले बड़े डिस्काउंट अब काफी घट गए हैं: जून-जुलाई 2025 में उरल्स ग्रेड पर ब्रेंट के मुकाबले छूट घटकर ~$2/बैरल के आसपास आ गई—यानी 2022 के बाद की सबसे कम। छूट घटने से refiners की लागत बढ़ी है, लेकिन खुदरा कीमतों में इसका तत्काल असर नहीं दिखा। 

दूसरी ओर, सरकार का टैक्स कलेक्शन भी ईंधन की कीमत का बड़ा हिस्सा बना रहा। संसद में दिए जवाबों के मुताबिक पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क 2024 तक ₹19.90/लीटर और डीज़ल पर ₹15.80/लीटर था; अप्रैल 2025 में इसे ₹2/लीटर और बढ़ाया गया—हालाँकि यह बढ़ोतरी कंपनियों ने पंप-दामों में नहीं जोड़ी। राज्यों का वैट इसके ऊपर अलग से लगता है। यानी उपभोक्ता तक पहुँचने से पहले ही प्रति लीटर कीमत का बड़ा अंश करों में चला जाता है। 

यही तस्वीर प्राइस-बिल्ड-अप के आधिकारिक दस्तावेज़ों में दिखती है। उदाहरण के लिए, HPCL के 1 मई 2025 के दिल्ली के लिए जारी ‘प्राइस बिल्ड-अप’ में पेट्रोल का RSP ₹94.81/लीटर दिखाया गया है, जिसमें सिर्फ वैट ही ₹15.40/लीटर है; इसके अलावा केंद्र का एक्साइज अलग से वसूला जाता है। कुल मिलाकर पंप-दाम में करों (केंद्र + राज्य) की हिस्सेदारी शहर और तारीख के हिसाब से बदलती रहती है, पर कई विश्लेषण इसे 40–55% के दायरे में मानते हैं—कई मीडिया आकलनों में ~46% का आंकड़ा भी आता है। 

तो फिर उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं? पहला कारण, मार्केटिंग मार्जिन। 2023-24 में कच्चे की औसत कीमत नरम रहने और खुदरा दाम स्थिर रहने से ओएमसी के पेट्रोल-डीज़ल पर मार्केटिंग मार्जिन ऊँचे रहे—उद्योग आकलनों में कई महीनों तक ये आरामदेह स्तर पर रहे और कंपनियाँ FY23 के नुकसानों की भरपाई करने में सफल रहीं। नतीजा, FY24 में तीनों ओएमसी का संयुक्त शुद्ध लाभ ₹81–86 हज़ार करोड़ के रिकॉर्ड रेंज में रहा। 

दूसरा कारण, कर संरचना। केंद्र का विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED)/एक्साइज तथा राज्यों का वैट मिलकर पंप-दाम में बड़ी हिस्सेदारी बनाते हैं। मार्च 2024 में ओएमसी ने पूरे देश में पेट्रोल-डीज़ल ₹2/लीटर सस्ता किया था, पर उसके ठीक बाद अप्रैल 2025 की एक्साइज बढ़ोतरी कंपनियों ने खुद absorb कर ली—अर्थात उपभोक्ता को सीधी रियायत के बजाय राजस्व-प्रबंधन और कंपनियों की बैलेंस-शीट को प्राथमिकता मिली। 

तीसरा, रूसी डिस्काउंट का सिमटना। 2022-23 में जो बड़ा डिस्काउंट मिल रहा था, 2025 आते-आते वह ~$2/बैरल के आसपास सिमट गया। ऐसे में refiners के पास ‘असामान्य’ लाभ की गुंजाइश घटती है और वे कीमतों को स्थिर रखकर मार्जिन-वैरिएबिलिटी से बचना चाहते हैं, खासकर चुनावी-मौसम और महँगाई-लक्ष्य के दबाव में। 

मैदानी सच्चाई यह है कि कच्चे में सस्ताई और रूसी आपूर्ति-विविधीकरण का फायदा सरकार और कंपनियों की ओर ज्यादा झलका—उपभोक्ता की जेब पर असर सीमित रहा। टैक्स-हिस्सेदारी उच्च बनी हुई है; कंपनियों की कमाई FY24 में रिकॉर्ड रही; और खुदरा कीमतें मार्च 2024 की एकबारगी कटौती के बाद ज्यादातर स्थिर रहीं। नीतिगत रूप से सरकार का तर्क राजस्व-स्थिरता और कीमत-मुद्रास्फीति नियंत्रण है, जबकि कंपनियाँ FY23 की under-recoveries और घटती अंतरराष्ट्रीय छूट का हवाला देती हैं। नतीजतन, “रूस का सस्ता तेल” फिलहाल आम आदमी की बजाय बैलेंस-शीट और बजट-मैथ में ज्यादा दिख रहा है। 

आगे क्या? यदि वैश्विक कच्चा नरम रहता है और रूसी छूट फिर बढ़ती है, तो ओएमसी के पास कीमतों में कुछ और कटौती की गुंजाइश बन सकती है। पर यदि डिस्काउंट कम और कर-हिस्सेदारी ऊँची बनी रही, तो उपभोक्ता-स्तर पर राहत सीमित ही रहेगी—और लाभ का बड़ा हिस्सा कंपनियों/राजस्व में जाता रहेगा। 

नोट: टैक्स का प्रतिशत राज्य-दर-राज्य और समय के साथ बदलता है; ऊपर दिए उदाहरण/आकलन उसी अवधि/शहर के हैं जिनके स्रोत संदर्भित हैं।

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Author: THE CG NEWS

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