
डिजिटल युग में सोशल मीडिया और इंटरनेट का उपयोग जहां लोगों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सुविधाएं दे रहा है, वहीं इसके दुरुपयोग के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। खासतौर पर महिलाओं और युवाओं को ऑनलाइन बदसलूकी, आपत्तिजनक संदेश और अवांछित तस्वीरों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों को नजरअंदाज न करें, बल्कि तुरंत कानूनी मदद लें और संबंधित प्राधिकरण को शिकायत दर्ज कराएं।
साइबर बदसलूकी के बढ़ते मामले
पिछले कुछ वर्षों में फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और अन्य प्लेटफॉर्म पर आपत्तिजनक मैसेज, अश्लील तस्वीरें और फर्जी अकाउंट के जरिए परेशान करने के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। खासतौर पर महिलाएं और किशोरियां इस तरह की घटनाओं से ज्यादा प्रभावित हो रही हैं। कई बार शर्मिंदगी या समाज के डर से पीड़ित शिकायत दर्ज नहीं करते, जिससे आरोपी और ज्यादा हिम्मत पकड़ लेते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि चुप्पी साधना समस्या को और गंभीर बना देता है।
कानून क्या कहता है
ऐसे मामलों से निपटने के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), 2000 में कई सख्त प्रावधान किए गए हैं।
•IPC की धारा 354D – पीछा करने (stalking) को अपराध मानती है। किसी महिला का बार-बार पीछा करना, उसे सोशल मीडिया पर परेशान करना या अवांछित मैसेज भेजना गैरकानूनी है।
•धारा 509 – किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली हरकत या टिप्पणी के लिए दोषी को जेल और जुर्माने की सजा का प्रावधान है।
•धारा 292 और 294 – अश्लील सामग्री का प्रकाशन, प्रदर्शन या प्रसार करने वालों पर कार्रवाई की जाती है।
•IT Act की धारा 66E – बिना अनुमति के निजी तस्वीर या वीडियो शेयर करना अपराध है, इसके लिए तीन साल तक की सजा और जुर्माने का प्रावधान है।
•धारा 67 और 67A – इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील और यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का प्रसार करने पर कड़ी सजा दी जाती है।
शिकायत कहां करें
अगर कोई ऑनलाइन बदसलूकी का शिकार होता है तो सबसे पहले नजदीकी पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज करा सकता है। इसके अलावा सरकार ने साइबर अपराध से निपटने के लिए cybercrime.gov.in नामक पोर्टल बनाया है, जहां ऑनलाइन शिकायत दर्ज की जा सकती है। महिलाओं और बच्चों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता के आधार पर लिया जाता है। कई राज्यों में साइबर थाने भी अलग से काम कर रहे हैं, जहां सीधे जाकर मामला दर्ज कराया जा सकता है।
सबूत सुरक्षित रखना जरूरी
विशेषज्ञों का कहना है कि पीड़ित को चाहिए कि वह आपत्तिजनक मैसेज, तस्वीरें, ईमेल या कॉल रिकॉर्ड को डिलीट न करे। ये सभी दस्तावेज पुलिस जांच और कोर्ट में सबूत के रूप में काम आते हैं। स्क्रीनशॉट लेना, चैट को सेव करना और कॉल रिकॉर्ड को सुरक्षित रखना जरूरी है। इसी आधार पर आरोपी के खिलाफ कार्रवाई आसान होती है।
समाज और परिवार का सहयोग
अक्सर पीड़ित मानसिक तनाव और शर्मिंदगी की वजह से परिवार को भी नहीं बताते। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में परिवार और दोस्तों से बात करना बेहद जरूरी है। सहयोग और समझदारी से ही पीड़ित को आगे बढ़ने की हिम्मत मिलती है। परिवार का साथ मिलने पर शिकायत दर्ज कराना आसान हो जाता है और आरोपी को सजा दिलाने में मदद मिलती है।
विशेषज्ञों की राय
कानून विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यम में बढ़ती बदसलूकी को रोकने के लिए केवल कानून ही नहीं, बल्कि समाज को भी जागरूक होना होगा। हर व्यक्ति को यह समझना होगा कि ऑनलाइन दुनिया भी असल जिंदगी का हिस्सा है और यहां भी वही आचार संहिता लागू होती है जो वास्तविक जीवन में होती है।
निष्कर्ष
ऑनलाइन बदसलूकी और उत्पीड़न आज समाज के लिए गंभीर चुनौती बन चुके हैं। यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दा भी है। इसलिए जरुरी है कि पीड़ित चुप न रहें, बल्कि कानून का सहारा लेकर आरोपी के खिलाफ तुरंत कार्रवाई करें। पुलिस और न्यायालय इस तरह के मामलों में संवेदनशील हैं और शिकायत पर तुरंत कदम उठाते हैं। डिजिटल दुनिया में सुरक्षित रहने के लिए जागरूकता और सतर्कता ही सबसे बड़ा हथियार है।
Author: THE CG NEWS
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