
फ्रांस की राजनीति इन दिनों अस्थिरता की धार पर है। 9 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री बने सेबेस्टियन लेकोर्नू (Sébastien Lecornu) ने महज 27 दिनों के बाद इस्तीफा दे दिया, जिससे फ्रांस अपने इतिहास में अब तक का सबसे कम समय तक पद पर रहे प्रधानमंत्री अनुभव कर गया है। इस एक साल के अंदर फ्रांस में चार प्रधानमंत्री बदल चुके हैं, और इस घटना ने देश में राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया है। 
इस्तीफे की घटना एवं वजहें
लेकोर्नू ने पदभार संभालने के बाद एक दिन के अंदर ही अपना मंत्रालय (कैबिनेट) घोषित किया। लेकिन कैबिनेट को लेकर उन्होंने जो नाम सुझाये, उनमें कई पुराने मंत्री शामिल थे, जो कि जनता और विपक्ष दोनों के लिए “पुरानी नीतियों का पुनरावलोकन नहीं” जैसा प्रतीत हुआ। 
उनके इस निर्णय पर उनका दोस्ताना राजनीतिक दल (कोलिशन) भी नाराज़ दिखा। विशेष रूप से रूढ़िवादी दल Les Républicains ने ब्रूनो ले मायर के रक्षा मंत्री बनाए जाने का प्रस्ताव उठने के बाद समर्थन वापस लेने की धमकी दी। ऐसे आरोप लगे कि इस कैबिनेट में बदलाव अपेक्षाकृत सांठ-गांठ के कारण हुआ है, न कि नई राजनीतिक दिशा देने के मकसद से। 
लेकोर्नू ने इस्तीफे के बाद कहा कि “कार्रवाई करने के लिए आवश्यक अवस्था नहीं बनी रही” और राजनीतिक दलों द्वारा ज़िम्मेदारियों की साझेदारी और सामंजस्य की कमी मुख्य कारण हैं। 
एक-साल में चार प्रधानमंत्री: सरकार की अस्थिरता
सेबेस्टियन लेकोर्नू से पहले भी फ्रांस में प्रधानमंत्री बदलने की गाड़ी तेज़ी से चली है। इस सूची में शामिल हैं:
•मिशेल बारनिए (Michel Barnier) — सितंबर 2024 में नियुक्त, लगभग तीन-से-चार महीने बाद सरकार खो बैठे। 
•फ्राँस्वा बैरू (François Bayrou) — दिसंबर 2024 से सितंबर 2025 तक पद पर रहे; उन्हें संसद में बजट कटौती प्रस्तावों को लेकर समर्थन खोने पर इस्तीफा देना पड़ा। 
•गैब्रियल अत्ताल (Gabriel Attal) — उनसे भी कुछ महीने पहले इस्तीफा हुआ। 
इस तरह, 2025 में कम-से-कम चार प्रधानमंत्री बदलने की स्थिति उत्पन्न हुई है, जो फ्रांस की राजनीतिक संरचना और शासन स्थिरता की चिंताएँ बढ़ा रही है। 
परिणाम और राजनीतिक चुनौतियाँ
इस राजनीतिक अस्थिरता का असर सिर्फ सरकार-शासन पर ही नहीं, बल्कि जनता और अर्थव्यवस्था पर भी गहरा है:
•नीति निर्माण पर गिरावट: बजट, सामाजिक कल्याण योजनाएँ, कर नीति इत्यादि में लंबित फैसले और विवाद बढ़े हैं, जिससे सार्वजनिक सेवाओं पर दबाव है। 
•विश्वास और नेतृत्व की समस्या: राष्ट्रपति एमैनुएल मैक्रों (Emmanuel Macron) पर भी दबाव है कि वे या तो संसद भंग करें या नेतृत्व परिवर्तन करें। विपक्षी दल, विशेषकर अभिसुचित (far-right) और वामपंथी दल, सरकार की जवाबदेही मांग रहे हैं। 
•आर्थिक अस्थिरता: शेयर बाजारों में गिरावट, यूरो की कीमतों में उतार-चढ़ाव, निवेशकों में अनिश्चितता — ये सारे संकेत हैं कि राजनीतिक सक्रियता का असर आर्थिक माहौल पर पड़ा है। 
फ्रांस का संविधान और सरकार की वास्तविक स्थितियाँ
फ्रांस में प्रधानमंत्री का कर्तव्यों का आधार संसदिक समर्थन और सरकार बनाने की क्षमता है। यदि संसद में बहुमत न हो, तो सरकार टूटने की स्थिति बन जाती है। लोकसभा-समान National Assembly में किसी एक दल या गठबंधन के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होने की वजह से लगातार सरकार बनाने और टिकाये रखने में मुश्किल आ रही है। 
सेबेस्टियन लेकोर्नू के मामले में, उनका कैबिनेट प्रस्ताव संसद के विभिन्न दलों से अपेक्षित समर्थन नहीं जुटा पाया। इसलिए उन्होंने न्यून-समय में इस्तीफा देना ज़रूरी समझा। 
आगे संभव रास्ते
•राष्ट्रपति मैक्रों के सामने अब विकल्प है कि वे नया प्रधानमंत्री नियुक्त करें जो राजनैतिक दलों के बीच संतुलन बना सके।
•संसद को भंग कर दोबारा लेजिस्लेटिव चुनाव करने की मांग जोर पकड़ रही है। 
•विपक्ष इस तरह की घटनाओं को लेकर अधिक असंतुष्ट है और सत्ता पक्ष पर जनता के विश्वास को बहाल करने का दबाव है।
निष्कर्ष
फ्रांस की यह स्थिति बताती है कि राजनीतिक अस्थिरता, विभाजन और दलों के बीच समझौता ना होने पर शासन कितना मुश्किल हो जाता है। 27 दिन की प्रधानमंत्री अवधि सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि सरकार और राजनीति की चरम अस्थिरता का सूचक है।
आने वाले महीनों में यह देखा जाएगा कि वस्तुतः फ्रांस किस तरह से इस संकट से बाहर निकलता है — नए चुनावों के द्वारा, नए गठबंधनों के माध्यम से, या राष्ट्रपति द्वारा नए कदम उठाकर। राजनीति के इस उतार-चढ़ाव के बीच, जनता की अपेक्षाएँ बढ़ सकती हैं कि नेताओं को स्थिर और भरोसेमंद सत्ता देना चाहिए।
Author: THE CG NEWS
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