
जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी के प्रमुख अमित बघेल ने एक बार फिर सामाजिक विवाद में घिरते हुए कहा है कि “मारवाड़ी-सिंधी समाज ने छत्तीसगढ़ के लिए क्या किया है?”। यह बयान उस समय सामने आया जब रायपुर में मित बघेल (हिंदी समाचार में अमित बघेल से इतर नामकरण) ने अग्रवाल और सिंधी समाज को लेकर तीखी टिप्पणी की थी, जिससे संबंधित समुदायों में भारी आक्रोश देखा गया।
बघेल ने कहा है कि यदि समाज को माफी मांगनी है, तो एफआईआर दर्ज करने से पहले चर्चा क्यों नहीं की गई। उन्होंने यह भी कहा, “जैसा करोगे, वैसा पाओगे।” बघेल ने यह टिप्पणी दौल कल्याण सिंह (एड्रेसमेंट में अग्रवाल समाज के दान-कर्ता के रूप में) के नाम के संदर्भ में करते हुए कहा कि उनके योगदान को उनकी पार्टी सम्मान देती है।
विवाद की पृष्ठभूमि
मामला उस वक्त गरमा गया जब रायपुर में छत्तीसगढ़ महतारी की मूर्ति टूटने की घटना सामने आई थी। इस घटना के बाद छत्तीसगढ़िया क्रांति सेना तथा जोहार छत्तीसगढ़ पार्टी ने प्रदर्शन किया था। प्रदर्शन के दौरान अमित बघेल ने अग्रवाल एवं सिंधी समाज को लेकर दिए गए बयानों में कहा कि बाहरी लोगों को उद्योग, जमीन, टिकट… सब मिलता है, पर छत्तीसगढ़िया को मूल आत्मीयता नहीं मिल रही। इस वक्तव्य ने तुरंत सामाजिक प्रतिक्रिया को जन्म दिया। उस बयान के बाद अग्रवाल और सिंधी समाज में नाराजगी फैल गई और प्रदेश के अलग-अलग जिलों में विरोध प्रदर्शन हुए। रायपुर और सरगुजा में बघेल के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज कर ली गई है।
बघेल का कहना–
अमित बघेल ने दैनिक भास्कर डिजिटल को दिए इंटरव्यू में कहा कि उन्होंने “छत्तीसगढ़िया” की बात की है, किसी खास समाज के खिलाफ नहीं। उन्होंने सवाल उठाया कि जब 46 बच्चियों को बिहार ले जाकर बेचा गया था, तब किसकी भावनाएँ आहत हुई थीं? उन्होंने यह भी कहा कि धर्म की आड़ में कही जाने वाली गतिविधियों पर भी सवाल उठाए गए हैं – उदाहरण के तौर पर गरबा-डांस, अश्लील स्टाइल, छोटे कपड़े। बघेल ने यह भी कहा कि यदि उनकी बात को गलत समझा गया है तो वह न्यायालय में अपनी बात रखेंगे, लेकिन पहले चर्चा क्यों नहीं हुई?
समाज की प्रतिक्रिया
अग्रवाल और सिंधी समाज के प्रतिनिधियों ने बघेल के बयान को ‘अभावित’ और ‘दोषपूर्ण’ माना है। समाज द्वारा कहा गया है कि उन्होंने छत्तीसगढ़ में शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग-योगदान के माध्यम से योगदान दिया है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने बघेल से माफी मांगने तथा अपने बयान वापस लेने की मांग की है। दोनों समाजों ने कार्यवाही की भी मांग की है कि ऐसे आरोपों के साथ राजनीति न हो।
राजनीतिक एवं सामाजिक असर
इस विवाद ने छत्तीसगढ़ की सामाजिक राजनीति को उकसा दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब कोई नेता जन-भावनाओं और जातीय-सामुदायिक संवेदनाओं को छूने वाला बयान देता है, तो इसका असर तुरन्त सामाजिक समरसता और राजनीतिक स्थिरता पर पड़ सकता है। बघेल द्वारा आह्वान किया गया 31 अक्टूबर का रायपुर बंद इस माहौल में और अधिक संवेदनशील हो गया है। यदि व्यापारी वर्ग व विभिन्न समाज बंद का समर्थन नहीं करता है, तो आयोजन की सफलता पर प्रश्न उठेंगे।
निष्कर्ष
अमित बघेल का बयान और उसके बाद सामने आई प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि छत्तीसगढ़ में सामाजिक–सामुदायिक समीकरण कितने जटिल हैं। राजनीतिक दलों द्वारा सामाजिक–समानता और ‘छत्तीसगढ़ियापन’ के बीच संतुलन बनाना एक चुनौतीपूर्ण कार्य हो गया है। बघेल का कथन, समाज की प्रतिक्रिया तथा राज्य में बढ़ती राजनीतिक हलचल इस बात का प्रमाण है कि आज की राजनीति सिर्फ विकास–उपलब्धि तक सीमित नहीं, बल्कि सांस्कृतिक–पहचान और संवेदनशीलता के बीच भी गतिशील है।
Author: THE CG NEWS
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