
दैनिक जीवन में जब भी कोई अच्छा काम हो जाए या कोई शुभ बात कही जाए, तो कई लोग सहज ही कहते हैं— “टच वुड”। यह वाक्य इतना सामान्य हो चुका है कि इसका इस्तेमाल करने वाले भी कई बार यह नहीं जानते कि आखिर इस परंपरा की शुरुआत कैसे हुई और इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव क्या है। आधुनिक दौर में इसे अंधविश्वास भी माना जाता है, पर इसके पीछे की मान्यताएं और मानव मन की प्रवृत्तियां इसे आज भी प्रासंगिक बनाती हैं। इस शब्द के इस्तेमाल की लोकप्रियता जनरेशन दर जनरेशन बढ़ती गई और आज यह दुनिया के कई देशों में शुभ संकेत के रूप में बोला जाता है।
‘टच वुड’ कहने की ऐतिहासिक मान्यता
‘टच वुड’ की शुरुआत पश्चिमी देशों में मानी जाती है, जहां लकड़ी को पवित्र और प्रकृति से जुड़ा माना गया। प्राचीन यूरोप के कई समुदायों का विश्वास था कि पेड़ों में दैवीय शक्तियां निवास करती हैं। ऐसे में लकड़ी को छूना उन शक्तियों से आशीर्वाद लेने जैसा समझा गया। धीरे-धीरे यह मान्यता लोगों के बीच फैलती चली गई और शुभ कार्य के समय या किसी अनचाहे संकट से बचाव के लिए ‘टच वुड’ कहना एक आम रिवाज बन गया। समय बदलता गया, पर लकड़ी को शुभ मानने की धारणा आज भी लोगों की सोच में मौजूद है।
बुरी नजर और नकारात्मक ऊर्जा का डर
भारतीय समाज में भी बुरी नजर से बचने की मान्यता बेहद गहरी है। जब कोई अपनी सफलता या अच्छे भाग्य का जिक्र करता है, तो मन में यह डर रहता है कि कहीं किसी की नजर न लग जाए। यही कारण है कि ‘टच वुड’ एक तरह से सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। लोग मानते हैं कि लकड़ी को छूने से नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है और अच्छी घटनाओं पर किसी तरह की बाधा नहीं आती। यह मानसिक रूप से व्यक्ति को संतुलित और सुरक्षित महसूस करवाता है। आधुनिक विज्ञान भले ही नजर लगने की अवधारणा को प्रमाणित नहीं करता, लेकिन मनोविज्ञान यह स्वीकार करता है कि यह विश्वास व्यक्ति के आत्मविश्वास को प्रभावित करता है।
मनोविज्ञान क्या कहता है?
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार ‘टच वुड’ कहना एक कॉग्निटिव बिहेवियरल पैटर्न है। जब इंसान किसी अनिश्चित स्थिति में होता है, तो वह अपनी आशंका को कम करने के लिए कोई प्रतीकात्मक क्रिया करता है। यह क्रिया उसे मानसिक शांति देती है और उसकी चिंता को कम करती है। ‘टच वुड’ भी ऐसी ही एक मानवीय प्रतिक्रिया है, जो अनजाने डर, भाग्य, भरोसे और नियंत्रण की भावना से जुड़ी होती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह व्यवहार पूरी तरह मानसिक है— इसका प्रभाव लकड़ी में नहीं बल्कि व्यक्ति की मनोस्थिति में होता है। फिर भी, मानसिक सुरक्षा का यह अहसास कई बार वास्तविक जीवन में सकारात्मक परिणाम उत्पन्न करता है।
आज के समय में क्यों बना हुआ है इसका प्रभाव?
बदलते दौर में भले ही परंपराएं तकनीक और तर्क से प्रभावित हो रही हों, लेकिन ‘टच वुड’ का इस्तेमाल आज भी उतना ही लोकप्रिय है। फिल्मों, सोशल मीडिया और रोजमर्रा की बातचीत में यह शब्द लगभग आदत बन चुका है। पेशेवर माहौल हो या निजी जीवन— जब स्थिति अच्छी हो या जब कोई कहे कि चीजें सही चल रही हैं, तो लोग तुरंत “टच वुड” कह देते हैं। यह शब्द न केवल भाग्य पर भरोसा दिखाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि इंसान की मन:स्थिति में सकारात्मक सोच कितनी महत्वपूर्ण होती है। यही कारण है कि यह परंपरा आज भी लोगों की भाषा और व्यवहार का हिस्सा बनी हुई है।
यह विश्वास चाहे वैज्ञानिक आधार रखता हो या केवल भावनात्मक, पर इतना तय है कि ‘टच वुड’ कहना इंसान की मनोवैज्ञानिक जरूरत पूरी करता है। यह उसे आश्वस्त करता है कि उसकी खुशियां सुरक्षित हैं और आने वाला समय भी बेहतर होगा। यही कारण है कि सदियों पुरानी यह कहावत आज भी हर वर्ग और हर पीढ़ी के लोगों की जिंदगी में अपनी जगह बनाए हुए है।
Author: THE CG NEWS
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