
महाभारत में चौसर का खेल विनाश का कारण माना जाता है। पांडवों का वनवास, द्रौपदी का चीरहरण और कुरुक्षेत्र युद्ध की नींव भी इसी खेल में रखी गई। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि एक समय भगवान श्रीकृष्ण ने भी शकुनि के साथ चौसर खेला था। यह प्रसंग कई धर्मग्रंथों और पुराणों में वर्णित मिलता है, जहां चौसर का यह खेल केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक गहरी रणनीति का हिस्सा था। यह कथा उस बड़े उद्देश्य से जुड़ती है जिसके लिए कृष्ण ने पूरे महाभारत काल में कार्य किया—धर्म की स्थापना और अधर्म का विनाश।
शकुनि को चौसर का महारथी माना जाता था। उसके पासों में ऐसी चालाकी छिपी थी कि सामने वाला खिलाड़ी जीतने का भ्रम पालता था, जबकि खेल पहले ही हार चुका होता था। यही कारण था कि दुर्योधन और उसके भाइयों को भी शकुनि पर पूरा विश्वास था। परंतु कृष्ण जानते थे कि शकुनि की इस कला के पीछे केवल कौशल नहीं, बल्कि छल, कपट और दूसरे को विनाश की ओर ले जाने की प्रवृत्ति थी। इसलिए कथा के अनुसार, एक अवसर पर कृष्ण ने स्वयं शकुनि को चौसर खेलने की चुनौती दी।
कृष्ण का उद्देश्य समझ से परे था
शकुनि को लगा कि वह श्रीकृष्ण जैसी दिव्य शक्ति को भी पासों में मात दे देगा। उसके पासे साधारण नहीं थे, बल्कि उसमें उसकी वर्षों की चालाकी और सिद्धियाँ जुड़ी थीं। चौसर के इस खेल का प्रारंभ हुआ तो शकुनि ने वही खेल खेलना शुरू किया जो वह हमेशा खेलता था—दिखावे की हार और अचानक की जीत। लेकिन कृष्ण के सामने ये सब छल-कपट टिक नहीं सके।
कथा में बताया जाता है कि कृष्ण ने खेल की शुरुआत में ही शकुनि से कहा—“खेल केवल पासों का नहीं, मन का होता है।” शकुनि यह सुनकर हंस पड़ा, क्योंकि उसे लगता था कि पासों पर उसका नियंत्रण पूर्ण है। लेकिन जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ा, शकुनि समझ नहीं पा रहा था कि उसकी हर चाल उलटी कैसे पड़ रही है।
श्रीकृष्ण ने न तो शकुनि के छल को रोका, न ही उसके पासों के भेद को खोला। वे केवल मुस्कुराते रहे, जैसे सब जानते हों। अंत में शकुनि खेल हार गया। यह वही व्यक्ति था जिसने पांडवों जैसे महावीरों को चौसर में परास्त किया था, लेकिन कृष्ण के सामने पूरी तरह विफल हो गया।
इस खेल से कृष्ण ने क्या सिखाया?
कथा स्पष्ट करती है कि कृष्ण का उद्देश्य शकुनि को अपमानित करना नहीं था। वे केवल उसे दिखाना चाहते थे कि छल से जीता गया खेल कभी टिकाऊ नहीं होता। धर्म की रक्षा के लिए बुद्धि, संयम और सत्य की आवश्यकता होती है, न कि छल और धोखे की।
कृष्ण ने शकुनि से कहा कि कपट का मार्ग सामने वाले को गिराने से पहले स्वयं को गिराता है। तुमने अपने जीवन में कभी साधारण पासे नहीं फेंके, इसलिए तुमने कभी सच्चे खेल को जाना ही नहीं।
शकुनि को पहली बार अपनी सीमाएं समझ आने लगीं। उसके पासों की शक्ति कृष्ण की दिव्य बुद्धि के सामने क्षणभर भी टिक नहीं पाई। यही वह संदेश था जिसे कृष्ण ने पूरे महाभारत में स्थापित किया—धर्म की विजय केवल शौर्य से नहीं, बल्कि बुद्धि और नीतियों से होती है।
यह प्रसंग महाभारत के संदर्भ में क्यों महत्वपूर्ण है?
यह कथा भले पुराणों और टीकाओं में अलग-अलग रूपों में मिलती है, लेकिन इसका संदेश एक ही है—महाभारत केवल युद्ध नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म के संघर्ष का सबसे बड़ा उदाहरण था। शकुनि चौसर के माध्यम से कुरु वंश में फूट और विनाश लाना चाहता था, जबकि कृष्ण हर मोड़ पर उस अधर्म को संतुलित करने का काम करते रहे।
कृष्ण का चौसर खेल यह दर्शाता है कि वे केवल एक योद्धा या रणनीतिकार नहीं, बल्कि मनोविज्ञान, राजनीति और धर्म के भी सर्वोत्तम ज्ञाता थे। उन्होंने शकुनि को खेल में हराकर केवल पासों की जीत नहीं हासिल की, बल्कि यह स्थापित किया कि छल की जीत हमेशा अस्थायी होती है।
कहानी का सार
इस प्रसंग से हमें यही सीख मिलती है कि जीवन में जीत का असली अर्थ किसी को नीचे गिराकर जीतना नहीं, बल्कि स्वयं को ऊँचा उठाते हुए सही मार्ग पर बने रहना है। शकुनि का छल और कृष्ण की नीति—दोनों उस समय के दो मार्ग थे, जिनमें से एक विनाश की ओर ले जाता था और दूसरा धर्म की स्थापना की ओर।
महाभारत की यह अद्भुत कथा आज भी यह संदेश देती है कि परिस्थिति कैसी भी हो, विजय हमेशा सत्य, धर्म और बुद्धिमता के पक्ष में ही होती है।
Author: THE CG NEWS
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