रायपुर की मोजो मशरूम फैक्ट्री में बड़ा बाल-मजदूरी कांड: 109 बच्चे छुड़ाए गए, लड़कियों से छेड़खानी और दिनभर मजदूरी का खुलासा

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के खरोरा इलाके में स्थित मोजो मशरूम फैक्ट्री से एक बार फिर बड़ा बाल-मजदूरी मामला सामने आया है। 17 नवंबर की शाम दिल्ली से आई मानवाधिकार आयोग की टीम, महिला एवं बाल विकास विभाग और पुलिस ने संयुक्त कार्रवाई करते हुए 109 बाल मजदूरों को फैक्ट्री से मुक्त कराया। इनमें 68 बच्चियां और 41 बच्चे शामिल हैं, जिनमें से अधिकांश नाबालिग हैं और बेहद खराब परिस्थितियों में काम करने को मजबूर थे। कार्रवाई के बाद सभी बच्चों को माना स्थित बाल संप्रेक्षण गृह में रखा गया है, जहां विशेषज्ञ उनके बयान ले रहे हैं और मानसिक काउंसलिंग की जा रही है। यह छापा इस बात का ताजा सबूत है कि प्रदेश में अवैध मजदूरी और मानव तस्करी का नेटवर्क कमजोर होने के बजाय लगातार मजबूत होता जा रहा है।

कमरों में ठूंसकर रखा जाता था, 3 महीनों से 3 साल तक फैक्ट्री में फंसे थे बच्चे

टीम द्वारा छुड़ाए गए बच्चों ने फैक्ट्री के भीतर की स्थितियों के बारे में हृदयविदारक खुलासे किए। बच्चों ने बताया कि उन्हें एक छोटे से कमरे में 10 से 15 लोगों के साथ ठूंसकर रखा जाता था, जहां न रोशनी की व्यवस्था थी, न हवा की। कई बच्चों ने यह भी बताया कि वे पिछले तीन महीने से लेकर तीन साल तक फैक्ट्री के अंदर ही बंद थे और बाहर जाने की अनुमति नहीं थी। भोजन की व्यवस्था अत्यंत खराब थी—दिन में केवल दो बार खाना दिया जाता था, वह भी कई बार बेहद निम्न गुणवत्ता का। पीने के लिए साफ पानी भी उपलब्ध नहीं था, जिस वजह से बच्चे पॉलिथीन में भरा पानी पीने को मजबूर होते थे। इन खुलासों ने छापे में शामिल अधिकारियों को भी झकझोर दिया।

मारपीट, धमकियाँ और लड़कियों से छेड़खानी—सुपरवाइजर और ठेकेदारों पर गंभीर आरोप

माना बाल गृह में मौजूद कई बच्चों ने बताया कि उनसे रोज सुबह 4-5 बजे उठकर देर रात तक काम करवाया जाता था। मजदूरी समय पर नहीं मिलती थी और पैसे मांगने पर सुपरवाइजर और ठेकेदार उन्हें जान से मारने की धमकी देते थे। बच्चियों ने बताया कि फैक्ट्री के भीतर कई कर्मचारी और सुपरवाइजर लड़कियों से छेड़खानी करते थे। विरोध करने पर मारपीट की जाती थी और चुप रहने के लिए कहा जाता था। बच्चों के अनुसार, उन्हें इस डर में रखा जाता था कि बाहर जाकर शिकायत की तो परिवारवालों को नुकसान पहुंचाया जाएगा। इस कारण कई बच्चे महीनों तक चुपचाप अत्याचार सहते रहे।

पॉलिथीन में भरा पानी पीना पड़ता था, गंदगी और बदबू से भरे थे कमरे

बच्चों ने बताया कि पीने के पानी की व्यवस्था इतनी खराब थी कि उन्हें कई बार पॉलिथीन में भरा पानी दिया जाता था। फैक्ट्री परिसर के कमरे गंदगी और तेज बदबू से भरे हुए थे। कई बच्चे बीमार थे, लेकिन उन्हें किसी भी तरह की मेडिकल सुविधा नहीं दी जाती थी। कुछ बच्चों ने कहा कि अगर किसी की तबीयत बिगड़ती थी तो उसे कमरे में बंद ही रखा जाता था, इलाज के लिए बाहर ले जाना “समय की बर्बादी” बताया जाता था। यह पूरा सिस्टम बच्चों की मजबूरी का फायदा उठाकर उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में काम करवाने पर आधारित था।

मानवाधिकार आयोग सख्त, फैक्ट्री प्रबंधन पर जल्द बड़ी कार्रवाई की तैयारी

छापेमारी के बाद मानवाधिकार आयोग की टीम ने फैक्ट्री प्रबंधन से इस संबंध में कड़े सवाल पूछे हैं। प्राथमिक जांच में यह स्पष्ट हो गया है कि फैक्ट्री में किसी भी प्रकार की कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया जा रहा था। न बाल मजदूरी निषेध कानून का पालन, न श्रम कानूनों का, और न ही सुरक्षा नियमों का। अधिकारियों ने बताया कि यह मामला केवल बाल मजदूरी का नहीं, बल्कि गंभीर मानव तस्करी और शोषण का है। पुलिस फैक्ट्री से जुड़े ठेकेदारों और सप्लाई नेटवर्क की भी जांच कर रही है, ताकि यह पता चल सके कि बच्चों को किन राज्यों और जिलों से लाकर यहां काम करवाया जा रहा था। जल्द ही फैक्ट्री मालिकों पर भी आपराधिक धाराओं में केस दर्ज किए जाने की संभावना है।

छत्तीसगढ़ में लगातार बढ़ते बाल-मजदूरी मामलों पर गंभीर सवाल

मोजो मशरूम फैक्ट्री से पहले भी इसी तरह के मामले सामने आए हैं और इसी फैक्ट्री पर सितंबर में भी मजदूरों को लेकर सवाल उठ चुके हैं। फिर भी कार्रवाई के बाद हालात दोबारा जस के तस लौट आना यह साबित करता है कि निगरानी और कानूनी व्यवस्था में गंभीर खामियाँ हैं। लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने राज्य की बाल सुरक्षा व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर बच्चों की तस्करी और श्रम शोषण को जड़ से खत्म करना है तो कड़ी मॉनिटरिंग, त्वरित कानूनी कार्रवाई और फैक्ट्री स्तर पर नियमित निरीक्षण बेहद जरूरी है।

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Author: THE CG NEWS

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