ढाई लाख शिक्षकों को बढ़ी सैलरी का लाभ नहीं मिलेगा: हाईकोर्ट बोला—संविलियन से पहले शिक्षा विभाग में नहीं थे, 1188 याचिकाएं खारिज

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छत्तीसगढ़ में शिक्षकों से जुड़ा एक बड़ा मामला बुधवार को हाईकोर्ट में स्पष्ट हो गया, जब कोर्ट ने 10 साल की सेवा पूरी करने के बाद क्रमोन्नति (ग्रेडेशन) की मांग करने वाले 1,188 शिक्षकों की याचिकाएं खारिज कर दीं। इस फैसले का सीधा असर राज्य के ढाई लाख से ज्यादा शिक्षकों पर पड़ने वाला है। जस्टिस एन.के. व्यास ने कहा कि जिन शिक्षाकर्मियों का संविलियन शिक्षा विभाग में 1 जुलाई 2018 को किया गया, वे उससे पहले शिक्षा विभाग के अधीन नहीं थे, इसलिए संविलियन से पहले की सेवा को ग्रेडेशन के लिए नहीं जोड़ा जा सकता।

पंचायत से शिक्षा विभाग तक का सफर और विवाद

छत्तीसगढ़ के बड़े हिस्से के शिक्षक पहले पंचायत विभाग के तहत शिक्षाकर्मी ग्रेड-1, ग्रेड-2 और ग्रेड-3 के रूप में नियुक्त थे। बाद में सरकार ने इनका संविलियन करते हुए इन्हें शिक्षा विभाग के अधीन सहायक शिक्षक (एलबी), शिक्षक (एलबी) और व्याख्याता (एलबी) के पदनाम दिए। हालांकि पदनाम बदले, लेकिन ग्रेडेशन का लाभ नहीं दिया गया।

इसी को लेकर 1,188 शिक्षकों ने हाईकोर्ट में याचिकाएं लगाई थीं, जिसमें उनका तर्क था कि वे 10 साल की सेवा पूरी कर चुके हैं, इसलिए उन्हें क्रमोन्नति मिलनी चाहिए। उन्होंने 2017 के उस आदेश का हवाला दिया, जिसमें 10 साल बाद वेतन वृद्धि देने की बात कही गई थी। साथ ही सोना साहू मामले का उद्धरण देते हुए लाभ की मांग की।

हाईकोर्ट ने कहा—संविलियन से पहले सरकारी कर्मचारी नहीं थे

मामले में राज्य सरकार की ओर से कहा गया कि शिक्षाकर्मी पंचायत राज अधिनियम 1993 के तहत नियुक्त थे और इनकी सेवा जनपद पंचायत के अधीन थी, इसलिए इन्हें संविलियन से पहले राज्य का नियमित अधिकारी नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट ने सरकार के इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि 10 मार्च 2017 के सर्कुलर के अनुसार ग्रेडेशन के लिए आवश्यक सेवा अवधि केवल वही गिनी जाएगी, जब कर्मचारी शिक्षा विभाग में शामिल हो चुका हो।

क्योंकि संविलियन 1 जुलाई 2018 को हुआ था, इसलिए इस तारीख को सेवा अवधि की शुरुआत मानी जाएगी। इस आधार पर शिक्षक 10 साल की आवश्यक सेवा अवधि पूरी नहीं करते। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि संविलियन से पहले की सेवा को जोड़ने का कोई प्रावधान नहीं है।

सोना साहू केस का हवाला भी नहीं माना गया

शिक्षकों की ओर से सोना साहू केस का उदाहरण दिया गया, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि उस मामले के हालात पूरी तरह भिन्न थे, इसलिए इसे आधार बनाना संभव नहीं है। कोर्ट ने यह भी याद दिलाया कि 30 जून 2018 की संविलियन नीति में साफ लिखा है कि शिक्षाकर्मी केवल संविलियन की तारीख से ही सरकारी शिक्षक माने जाएंगे और उससे पहले किसी भी लाभ का दावा नहीं किया जा सकता।

सरकार पर आर्थिक दबाव पड़ता

सरकार ने कोर्ट को जानकारी दी कि यदि याचिकाओं में शिक्षकों को लाभ दिया जाता, तो प्रति शिक्षक 3.5 लाख से 15 लाख रुपये तक अतिरिक्त भुगतान करना पड़ता।

क्लास 3 से क्लास 2 में प्रमोशन वाले मामलों में पे-स्केल का अंतर काफी बड़ा होने से यह राशि बढ़ जाती। यदि कोई शिक्षक 2005 में नियुक्त हुआ होता, तो उसे 2015 से ग्रेडेशन मिल जाता। इससे मासिक वेतन में कई हजार रुपये का अंतर पैदा होता, जो सालों में लाखों तक पहुंच जाता।

शिक्षाकर्मियों के वेतनमान पहले ही अलग

सरकार ने बताया कि शिक्षाकर्मियों को पहले ही समयमान वेतनमान और 2014 में समकक्ष वेतनमान दिया जा चुका है। पंचायत विभाग में इनकी सेवा शर्तें पूरी तरह अलग थीं और ग्रेडेशन का प्रावधान वहां लागू नहीं होता था। इसी वजह से हाईकोर्ट ने कहा कि ग्रेडेशन की पात्रता संविलियन के बाद ही शुरू होती है।

फैसले के बाद स्थिति

इस फैसले से हजारों शिक्षकों की उम्मीदें टूट गई हैं। संविलियन के बाद वे लंबे समय से मांग कर रहे थे कि उनकी 10 साल की पुरानी सेवा को जोड़कर क्रमोन्नति दी जाए। पर अब हाईकोर्ट ने साफ कर दिया है कि पुरानी सेवा को शिक्षा विभाग गिन नहीं सकता।

हालांकि सरकार का मानना है कि संविलियन से वेतनमान और पद संरचना पहले ही सुधर चुकी है, इसलिए ग्रेडेशन की मांग उचित नहीं है।

यह मामला अब शिक्षक संगठनों के लिए एक नया मोड़ बन गया है, क्योंकि फैसला सीधे तौर पर आने वाले वर्षों में पदोन्नति और वेतन सुधार को प्रभावित करेगा।

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Author: THE CG NEWS

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