
दुनिया के सबसे समृद्ध और लोकप्रिय हिन्दू मंदिरों में से एक तिरुमाला तिरुपति बालाजी मंदिर अपने आध्यात्मिक वैभव, अनूठी परंपराओं और प्राचीन रहस्यों के लिए जाना जाता है। आंध्र प्रदेश के तिरुमाला पर्वत पर स्थित श्रीवेंकटेश्वर स्वामी का यह मंदिर हर वर्ष करोड़ों भक्तों को आकर्षित करता है। यहां की परंपराएं इतनी विशिष्ट हैं कि कई वैज्ञानिक खोजों और ऐतिहासिक अध्ययनों के बाद भी इसके कई रहस्य आज भी लोगों के मन में श्रद्धा और जिज्ञासा दोनों बनाए रखते हैं। इन्हीं परंपराओं में से एक है—भगवान को एक साथ साड़ी और धोती पहनाने की परंपरा, जिसे लेकर वर्षों से भक्तों में उत्सुकता रही है।
श्रीवेंकटेश्वर स्वामी को साड़ी और धोती पहनाने की प्राचीन परंपरा
मंदिर के ग्रंथों और परंपराओं के अनुसार, भगवान श्रीवेंकटेश्वर को प्रतिदिन उत्तरीय या वस्त्राभरण सेवा के दौरान अलग-अलग वस्त्र पहनाए जाते हैं। विशेष बात यह है कि उन्हें एक साथ धोती (पारंपरिक दक्षिण भारतीय पुरुष वस्त्र) और साड़ी (स्त्री परिधान) धारण कराई जाती है। यह परंपरा भगवान की दिव्य उपस्थिति और उनकी अद्वितीय स्वरूपता का प्रतीक मानी जाती है, जिसमें वे अलौकिक पुरुष और शक्ति स्वरूपा लक्ष्मी दोनों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
दक्षिण भारतीय वैष्णव मत के अनुसार, भगवान नारायण और देवी लक्ष्मी एक-दूसरे से अविभाज्य हैं। मान्यता है कि जब भगवान तिरुपति पर्वत पर प्रकट हुए, तब देवी लक्ष्मी भी उनके हृदय में ‘नित्य वासिनी’ के रूप में निवास कर रही थीं। इसी दिव्य एकत्व के प्रतीक के रूप में भगवान को पुरुष और स्त्री दोनों के प्रतीक वस्त्र पहनाए जाते हैं।
क्यों माना जाता है भगवान का रूप ‘अर्धनारीश्वर’ का प्रतीक?
तिरुमला मंदिर की ‘संहिता’ और ‘वैष्णव आगम’ ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि श्रीवेंकटेश्वर स्वामी का स्वरूप “पुरुषोत्तम” होने के साथ-साथ “शक्तिस्वरूप” भी है। उनका यह रूप शिव के ‘अर्धनारीश्वर’ स्वरूप की तरह पूजनीय माना जाता है, जहां दिव्यता के दोनों पक्ष एक साथ उपस्थित होते हैं।
माना जाता है कि भगवान के हृदय में सदैव श्री महालक्ष्मी का वास है, इसलिए उन्हें स्त्री स्वरूप का भी प्रतिनिधित्व करने वाले वस्त्र पहनाए जाते हैं। मंदिर के पुजारी इसे ‘लक्ष्मीनिवास’ की परंपरा बताते हैं। यही कारण है कि बालाजी के वस्त्रों में स्त्री-पुरुष दोनों के चिह्न दिखाई देते हैं।
इतिहास और शास्त्रों में क्या मिलता है प्रमाण?
तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) के इतिहास में भी इस परंपरा का उल्लेख मिलता है। वार्षिक ब्रह्मोत्सव, वैभवोत्सव और पवित्रोत्सव जैसे प्रमुख कार्यक्रमों में मंदिर की यह अनूठी परंपरा और अधिक स्पष्ट दिखाई देती है, जब विभिन्न सेवाओं में भगवान के वस्त्रों में विशेष बदलाव किए जाते हैं।
प्राचीन ‘वैकानस आगम’ ग्रंथ के अनुसार, भगवान को पहनाई जाने वाली साड़ी देवी लक्ष्मी के सौम्य स्वरूप का प्रतीक है, जबकि धोती भगवान के वीर पुरुष स्वरूप की प्रतिनिधि मानी जाती है। यह परंपरा हज़ारों वर्षों से बिना परिवर्तन आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जा रही है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी विशिष्ट है यह परंपरा
कुछ शोधों में यह माना गया है कि तिरुपति मंदिर में भगवान की मूर्ति ‘जीवंत’ प्रतीत होती है, जिसके पीछे कई वैज्ञानिक रहस्य जुड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, मूर्ति पर हमेशा ताज़गी बनी रहना, उसके तापमान में स्थिरता और माथे पर लगाए जाने वाला ‘तिरुनामम’ चंदन का देर तक न पिघलना—ये सब बातें इस दिव्य उपस्थिति को और रहस्यमय बनाती हैं।
हालांकि साड़ी और धोती पहनाने की परंपरा धार्मिक आधार पर है, मगर इसका सांस्कृतिक महत्व भी गहरा है। यह धर्म के भीतर स्त्री-पुरुष ऊर्जाओं के संतुलन और एकत्व के आध्यात्मिक सिद्धांत को दर्शाता है।
भक्तों के लिए आस्था और आकर्षण का प्रतीक
तिरुपति बालाजी मंदिर में हर दिन लाखों श्रद्धालु दर्शन करने पहुंचते हैं। भगवद्भक्ति और रहस्यों से भरे इस मंदिर की परंपराएं हर किसी को आकर्षित करती हैं। भगवान के इस अनोखे वस्त्राभरण को देखकर भक्त भावविभोर हो जाते हैं और इसे ईश्वर की अनंत लीला का स्वरूप मानते हैं।
मंदिर प्रबंधन भी इसे दिव्य परंपरा बताते हुए कहता है कि यह कोई साधारण पूजा-विधि नहीं, बल्कि हजारों वर्षों की धार्मिक परंपरा और भगवान के अद्वितीय स्वरूप की स्वीकृति का प्रतीक है।
तिरुपति बालाजी का मंदिर न केवल भक्तों की आस्था का केंद्र है, बल्कि इसकी परंपराएं भारतीय दर्शन, धर्म और संस्कृति की गहराई का भी जीवंत प्रमाण हैं। साड़ी और धोती पहनाने की यह अनूठी परंपरा इसी अद्वितीय आध्यात्मिक इतिहास का हिस्सा है, जो भगवान के दिव्य स्वरूप और ऊर्जा के संतुलन का प्रतीक बनकर आज भी जीवित है।
Author: THE CG NEWS
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