
बॉलीवुड में स्टारडम सिर्फ ग्लैमर या बड़े बैनर से नहीं, बल्कि दमदार अभिनय और धैर्य से भी हासिल किया जा सकता है। अभिनेता विपिन शर्मा इसकी जीवंत मिसाल हैं। ‘तारे ज़मीन पर’, ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘पाताललोक’ और ‘महारानी’ जैसे प्रोजेक्ट्स में अपने संजीदा और असरदार किरदारों से पहचान बनाने वाले विपिन शर्मा का सफर आसान नहीं रहा। झोपड़पट्टी में बीते बचपन से लेकर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, लंबे ब्रेक, दोबारा खुद को साबित करने और आज के ओटीटी दौर तक, उनकी कहानी संघर्ष, आत्ममंथन और निरंतर सीखने की है।
झोपड़पट्टी में बीता बचपन, टीवी देखने का सपना बना लक्ष्य
विपिन शर्मा का बचपन दिल्ली के एक स्लम इलाके में बीता, जहां न बिजली थी और न टीवी। आसपास के कुछ घरों में टीवी हुआ करता था और वहीं काम करने जाने वाली महिलाओं के सहारे वे चुपके से कार्यक्रम देख लिया करते थे। उन्हीं टीवी स्क्रीन को देखते हुए उनके मन में यह सपना जन्मा कि एक दिन वे भी इसी स्क्रीन पर नजर आएंगे। अभावों से भरे बचपन ने उन्हें भटकने नहीं दिया, बल्कि अभिनय पर फोकस बनाए रखा। स्कूल में मंच के ज्यादा मौके नहीं मिले, लेकिन भीतर का जुनून लगातार मजबूत होता गया।
थिएटर और एनएसडी ने बदली दिशा
विपिन शर्मा को अभिनय की पेशेवर दुनिया का रास्ता तब दिखा जब उन्हें नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा के बारे में पता चला। एक एनएसडी छात्र की परफॉर्मेंस देखने के बाद उन्होंने तय कर लिया कि उन्हें यहीं आना है। मंडी हाउस के थिएटर से उनका जुड़ाव हुआ और धीरे-धीरे मंच पर अभिनय शुरू किया। एनएसडी में उनका चयन पहली ही कोशिश में हो गया, जो अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी। वहां उनके समकालीन इरफान खान, तिग्मांशु धूलिया, पीयूष मिश्रा और संजय मिश्रा जैसे कलाकार थे। यही ट्रेनिंग उनके अभिनय की मजबूत नींव बनी।
एक्टिंग से ब्रेक और कैमरे के पीछे की दुनिया
एनएसडी और शुरुआती कामों के बाद विपिन शर्मा का झुकाव फिल्ममेकिंग की ओर बढ़ा। उन्होंने एक्टिंग से लगभग दूरी बना ली और एडिटिंग की दुनिया में कदम रखा। उनके लिए एडिटिंग सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि कहानी और भावना को गढ़ने का जादू थी। इसी दौरान एक्टिंग से लंबा गैप आ गया और एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्हें खुद लगने लगा कि वे अब एक्टर नहीं रहे।
खुद को दोबारा तैयार करने का फैसला
दोस्तों की बातों और आत्ममंथन के बाद विपिन शर्मा ने हार मानने के बजाय खुद को दोबारा तराशने का फैसला किया। वे टोरंटो गए और करीब दो साल में 30 हफ्तों की एक्टिंग क्लासेज लीं। उनका मानना है कि एक्टर्स के लिए रियाज़ सिर्फ डायलॉग बोलना नहीं, बल्कि किताबें पढ़ना, संगीत सुनना और दुनिया को समझना है। इसी ट्रेनिंग ने उनका आत्मविश्वास वापस लौटाया।
‘तारे ज़मीन पर’ से मिली नई पहचान
करीब एक दशक के गैप के बाद आमिर खान की फिल्म ‘तारे ज़मीन पर’ विपिन शर्मा के करियर का टर्निंग पॉइंट बनी। आमिर खान ने खुद उनका ऑडिशन लिया और नंदकिशोर अवस्थी के किरदार के लिए चुना। यह फिल्म सिर्फ एक रोल नहीं, बल्कि उनके करियर की नई पारी की शुरुआत थी। यहीं से उन्हें व्यापक पहचान मिली।
सफलता के बाद भी संघर्ष और टाइपकास्टिंग
विपिन शर्मा मानते हैं कि असली संघर्ष ‘तारे ज़मीन पर’ के बाद शुरू हुआ। फिल्म की सफलता के बाद उन्हें लगातार पिता के रोल ऑफर होने लगे, खासकर टीवी के सास-बहू धारावाहिकों में। पैसों की जरूरत होने के बावजूद उन्होंने कई ऐसे ऑफर ठुकरा दिए, ताकि टाइपकास्ट न हो जाएं। उनके लिए काम की क्वालिटी और चुनौती ज्यादा मायने रखती थी।
गंभीर भूमिकाएं और विविध सफर
अनुराग कश्यप के साथ ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, सुधीर मिश्रा की ‘इनकार’, दिबाकर बनर्जी की ‘ओए लकी! लकी ओए!’ और हालिया वेब सीरीज ‘पाताललोक’, ‘द फैमिली मैन’ और ‘महारानी’ में विपिन शर्मा ने अलग-अलग रंग दिखाए। ‘धड़क 2’ में उनका अनुभव खास रहा, जहां दर्शकों की भावनात्मक प्रतिक्रिया ने उन्हें सबसे ज्यादा संतोष दिया।
इरफान खान से प्रेरणा और आगे की राह
विपिन शर्मा के सबसे बड़े इंस्पिरेशन इरफान खान रहे हैं। वे मानते हैं कि कम से कम में ज्यादा कहने की कला उन्होंने इरफान से सीखी। कोविड के बाद उनकी सोच और जीवन में भी बदलाव आया और अब वे अद्वैतवाद पर आधारित फिल्म को खुद डायरेक्ट और प्रोड्यूस करने की योजना बना रहे हैं।
सफलता की अपनी परिभाषा
विपिन शर्मा के लिए सफलता सिर्फ पैसा या शोहरत नहीं, बल्कि वह तारीफ है जो अगले काम को और बेहतर करने की चुनौती दे। उनका मानना है कि अगर अपने काम से सच्चा प्यार हो, तो बस लगे रहना चाहिए। देर–सवेर उसका फल जरूर मिलता है।
Author: THE CG NEWS
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