20 साल बाद ठाकरे भाइयों की सियासी वापसी: उद्धव और राज आज गठबंधन का ऐलान करेंगे, जनवरी 2026 के नगर निगम चुनाव साथ लड़ेंगे

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महाराष्ट्र की राजनीति में आज एक बड़ा और ऐतिहासिक मोड़ आने जा रहा है। करीब दो दशक बाद ठाकरे परिवार एक बार फिर सियासी तौर पर एकजुट होने जा रहा है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे आज दोपहर 12 बजे अपने गठबंधन का औपचारिक ऐलान करेंगे। यह गठबंधन जनवरी 2026 में होने वाले राज्य के 29 नगर निगम चुनावों के लिए किया जा रहा है, जिसमें मुंबई, पुणे और पिंपरी-चिंचवड़ जैसे बड़े महानगर शामिल हैं।

गठबंधन की घोषणा से पहले दोनों नेता सुबह 11 बजे शिवाजी पार्क स्थित बालासाहेब ठाकरे स्मारक पहुंचकर बालासाहेब ठाकरे को श्रद्धांजलि देंगे। इसके बाद एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में राजनीतिक समझौते की पूरी रूपरेखा सामने रखी जाएगी।

2006 के बाद पहली बार एकसाथ चुनावी मोर्चा

उद्धव और राज ठाकरे आखिरी बार 2006 से पहले एक ही राजनीतिक दल के रूप में सक्रिय थे। इसके बाद राज ठाकरे के शिवसेना से अलग होकर नई पार्टी बनाने से दोनों के रास्ते अलग हो गए थे। हालांकि, इसी साल जुलाई में मुंबई के वर्ली डोम में हुई एक रैली ने सियासी संकेत दे दिए थे, जब दोनों भाई 20 साल बाद पहली बार एक ही मंच पर नजर आए। अब यह नजदीकी औपचारिक गठबंधन में बदल रही है।

इस समझौते के तहत शिवसेना (यूबीटी) और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना मिलकर नगर निगम चुनाव लड़ेंगी। महाराष्ट्र राज्य चुनाव आयोग ने राज्य की 29 नगर निगमों के चुनाव की घोषणा कर दी है। वोटिंग 15 जनवरी 2026 को होगी और नतीजे 16 जनवरी को आएंगे।

मराठी राजनीति के समीकरण बदलने की तैयारी

ठाकरे भाइयों का साथ आना सिर्फ एक चुनावी समझौता नहीं, बल्कि मराठी राजनीति के बिखरे वोट बैंक को फिर से एकजुट करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। अब तक शिवसेना (यूबीटी) और मनसे अलग-अलग चुनाव लड़ने के कारण मराठी वोट बंटता रहा, जिसका फायदा भाजपा और कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को मिलता रहा। दोनों दलों के साथ आने से यह विभाजन खत्म होने की संभावना है।

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, इसका सीधा असर मुंबई और उसके आसपास के मराठी बहुल इलाकों में दिख सकता है। इससे भारतीय जनता पार्टी के लिए चुनौती बढ़ेगी, जिसने हाल के वर्षों में शहरी, गुजराती और उत्तर भारतीय वोटरों में मजबूत पकड़ बनाई है।

शिंदे गुट पर भी बढ़ेगा दबाव

ठाकरे भाइयों की एकजुटता का असर एकनाथ शिंदे गुट पर भी पड़ सकता है। शिंदे गुट खुद को ‘असली शिवसेना’ बताता रहा है, लेकिन उद्धव और राज का साथ आना उस दावे को कमजोर कर सकता है। पार्टी कैडर और मराठी मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति बनना तय माना जा रहा है।

BMC चुनाव क्यों है सबसे अहम

इन चुनावों का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बृहन्मुंबई नगर निगम यानी BMC है। यह न सिर्फ देश, बल्कि एशिया की सबसे अमीर नगर निगम मानी जाती है। करीब 74 हजार करोड़ रुपये के बजट वाली इस सिविक बॉडी पर लंबे समय तक अविभाजित शिवसेना का दबदबा रहा था।

BMC का बजट कई छोटे राज्यों—गोवा, मिजोरम, सिक्किम और त्रिपुरा—से भी ज्यादा है। यही वजह है कि भाजपा, शिवसेना (यूबीटी), शिंदे गुट, मनसे, कांग्रेस और दोनों एनसीपी गुट इस चुनाव को प्रतिष्ठा का सवाल मान रहे हैं। ठाकरे भाइयों का साथ आना उद्धव ठाकरे के लिए खोई हुई राजनीतिक जमीन वापस पाने का मौका माना जा रहा है।

फूट की कहानी: कहां से शुरू हुआ था विवाद

राज ठाकरे 1989 से शिवसेना में सक्रिय थे और युवा संगठन के जरिए उन्होंने पार्टी का जमीनी नेटवर्क मजबूत किया। 1990 के दशक में शिवसेना के विस्तार में उनकी भूमिका अहम मानी जाती है।

हालांकि 2003 के बाद पार्टी में नेतृत्व को लेकर मतभेद उभरने लगे। बालासाहेब ठाकरे ने उद्धव ठाकरे को पार्टी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाने का फैसला लिया, जिससे राज ठाकरे असहज हो गए। 2005 तक पार्टी पर उद्धव का प्रभाव बढ़ता चला गया और यही टकराव का कारण बना।

27 नवंबर 2005 को राज ठाकरे ने शिवसेना से इस्तीफा देने का ऐलान किया और मार्च 2006 में शिवाजी पार्क में मनसे की स्थापना की। इसके बाद दोनों भाई राजनीतिक रूप से अलग राह पर चलते रहे।

अब साथ आने के मायने

करीब 20 साल बाद उद्धव और राज ठाकरे का साथ आना महाराष्ट्र की राजनीति में नए समीकरण बना सकता है। यह गठबंधन सिर्फ नगर निगम चुनाव तक सीमित रहेगा या आगे विधानसभा और लोकसभा चुनावों तक जाएगा, यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल इतना तय है कि जनवरी 2026 के नगर निगम चुनाव राज्य की राजनीति की दिशा तय करने वाले साबित हो सकते हैं।

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Author: THE CG NEWS

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