
सुप्रीम कोर्ट ने मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिविजन यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग की प्रक्रिया पर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि किसी भी संवैधानिक संस्था को निरंकुश अधिकार नहीं दिया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि वोटर लिस्ट से नाम हटने के गंभीर नागरिक परिणाम होते हैं, इसलिए ऐसी प्रक्रिया नियमों और संविधान के दायरे में ही होनी चाहिए। बिहार समेत कई राज्यों में SIR के खिलाफ दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दस्तावेजों की संख्या, प्रक्रिया की पारदर्शिता और कानूनी आधार को लेकर तीखे सवाल उठाए।
दस्तावेजों की संख्या पर सवाल, कोर्ट की चिंता
चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने सुनवाई के दौरान विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि जब फॉर्म-6 के तहत मतदाता सूची में नाम जोड़ने या संशोधन के लिए सात दस्तावेज तय हैं, तो SIR प्रक्रिया में 11 दस्तावेज क्यों मांगे जा रहे हैं। जस्टिस बागची ने कहा कि यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या चुनाव आयोग को मनमाने ढंग से दस्तावेजों की संख्या बढ़ाने या घटाने का अधिकार है। कोर्ट ने दोहराया कि किसी भी संस्था की शक्ति पूरी तरह खुली नहीं हो सकती और चुनाव आयोग भी बिना नियंत्रण के अधिकारों का प्रयोग नहीं कर सकता।
मतदान अधिकार और संवैधानिक सीमाएं
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस ने कहा कि मतदान का अधिकार सीधे तौर पर संविधान से जुड़ा है। अगर किसी व्यक्ति का नाम वोटर लिस्ट से हटाया जाता है, तो उसके गंभीर नागरिक नतीजे होते हैं। ऐसे मामलों में यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि पूरी प्रक्रिया कानून और नियमों के मुताबिक हो। अदालत ने सवाल किया कि यदि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 21(2) में संशोधन के लिए तय नियमों का पालन जरूरी है, तो धारा 21(3) के तहत चुनाव आयोग खुद को उन नियमों से बाहर कैसे रख सकता है।
चुनाव आयोग की दलीलें
चुनाव आयोग की ओर से वरिष्ठ वकील राकेश द्विवेदी ने अदालत में दलील दी कि धारा 21(3) आयोग को एक अलग और स्वतंत्र शक्ति प्रदान करती है, जो सामान्य संशोधन प्रक्रिया से अलग है। उन्होंने कहा कि कानून आयोग को कुछ हद तक लचीलापन देता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आयोग मनमानी कर सकता है। द्विवेदी ने भरोसा दिलाया कि आयोग को अदालत के सामने यह साबित करना होगा कि पूरी प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और संविधान के अनुरूप है। उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग तानाशाही तरीके से काम नहीं कर सकता और अनुच्छेद 326 का पूरी तरह पालन करेगा।
कोर्टरूम में दो टूक संदेश
सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने बार-बार इस बात पर जोर दिया कि कोई भी शक्ति निरंकुश नहीं हो सकती। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिए कि यदि SIR जैसी प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटते हैं, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर असर डाल सकता है। कोर्ट ने माना कि चुनाव आयोग की जिम्मेदारी वोटर लिस्ट को शुद्ध रखना है, लेकिन यह जिम्मेदारी भी संवैधानिक सीमाओं के भीतर ही निभाई जानी चाहिए।
पहले के आदेश और पृष्ठभूमि
इस मामले से पहले सुप्रीम कोर्ट ने 19 जनवरी को पश्चिम बंगाल के करीब 1.25 करोड़ मतदाताओं को वोटर लिस्ट में नाम जुड़वाने के लिए एक और मौका दिया था। कोर्ट ने निर्देश दिया था कि गड़बड़ी वाली मतदाता सूची ग्राम पंचायत भवन, ब्लॉक कार्यालय और वार्ड कार्यालय में सार्वजनिक रूप से चस्पा की जाए, ताकि लोगों को जानकारी मिल सके। इससे पहले 15 जनवरी को चुनाव आयोग ने अदालत में स्पष्ट किया था कि SIR प्रक्रिया के तहत किसी का डिपोर्टेशन नहीं होता और देश से बाहर निकालने का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है।
राजनीतिक विवाद और अगली सुनवाई
चुनाव आयोग पहले यह भी कह चुका है कि SIR को लेकर कुछ राजनीतिक दल जानबूझकर डर का माहौल बना रहे हैं। आयोग का कहना है कि उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है कि कोई भी विदेशी नागरिक मतदाता सूची में शामिल न हो। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अंतिम फैसला सुरक्षित नहीं रखा है और मामले की सुनवाई गुरुवार को फिर जारी रखने का आदेश दिया है। अब सबकी नजर इस पर है कि अदालत SIR प्रक्रिया की सीमाओं और चुनाव आयोग के अधिकारों को लेकर क्या दिशा तय करती है।
Author: THE CG NEWS
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