फ्रांस में बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर सख्ती: राष्ट्रपति मैक्रों बोले— हमारे बच्चों का दिमाग बिकाऊ नहीं, 15 साल से कम उम्र पर लगेगा बैन

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फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने बच्चों और किशोरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर बड़ा और सख्त रुख अपनाया है। उन्होंने साफ कहा है कि उनके देश के बच्चों का दिमाग किसी भी तरह “बिकाऊ” नहीं है और सरकार उन्हें डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के नुकसान से बचाने के लिए निर्णायक कदम उठाने जा रही है। मैक्रों के मुताबिक, सितंबर से पहले 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागू कर दिया जाएगा। इसके साथ ही फ्रांस के हाई स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर भी रोक लगाने की तैयारी है।

सोशल मीडिया पर उम्र आधारित प्रतिबंध का ऐलान

CNN की रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति मैक्रों ने कहा कि सरकार कानूनी प्रक्रिया को तेजी से पूरा कर रही है, ताकि बच्चों और किशोरों को सोशल मीडिया के दुष्प्रभावों से बचाया जा सके। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह नियम केवल प्रतीकात्मक नहीं होगा, बल्कि बच्चों, माता-पिता और शिक्षकों—तीनों के लिए पूरी तरह स्पष्ट और बाध्यकारी होगा। मैक्रों का कहना है कि 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखना उनकी मानसिक सेहत, पढ़ाई और सामाजिक विकास के लिए जरूरी हो गया है।

हाई स्कूलों में मोबाइल फोन पर भी रोक

मैक्रों ने यह भी घोषणा की कि फ्रांस के हाई स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर रोक लगाई जाएगी। उनका मानना है कि कक्षाओं में मोबाइल फोन बच्चों का ध्यान पढ़ाई से भटकाते हैं और सोशल मीडिया की लत को और बढ़ाते हैं। सरकार का उद्देश्य स्कूलों को ऐसा माहौल देना है, जहां बच्चे डिजिटल दबाव से दूर रहकर सीखने और सामाजिक संवाद पर ध्यान दे सकें।

पश्चिमी देशों में बढ़ रही सख्ती

फ्रांस का यह कदम ऐसे समय सामने आया है, जब पश्चिमी देशों में बच्चों को सोशल मीडिया से होने वाले नुकसान को लेकर चिंता लगातार बढ़ रही है। कई सरकारें अब यह मानने लगी हैं कि स्वैच्छिक दिशानिर्देश और चेतावनियां पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि कानूनी प्रतिबंध जरूरी हो गए हैं। फ्रांस का प्रस्ताव इसी वैश्विक रुझान का हिस्सा माना जा रहा है।

ऑस्ट्रेलिया बना मिसाल

पिछले साल दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया ने इस दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया था। वहां 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इंस्टाग्राम, टिकटॉक और फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट रखना प्रतिबंधित कर दिया गया। ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एंथनी अल्बानीज के अनुसार, इस कानून के लागू होने के बाद करीब 47 लाख बच्चों से जुड़े सोशल मीडिया अकाउंट बंद या हटाए गए। उन्होंने कहा था कि सरकार ने यह फैसला इसलिए लिया क्योंकि माता-पिता और बच्चे दोनों ही सोशल मीडिया से हो रहे नुकसान को लेकर आवाज उठा रहे थे।

ब्रिटेन भी कर रहा विचार

मैक्रों की घोषणा से कुछ दिन पहले ब्रिटेन सरकार ने भी संकेत दिए थे कि वह बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर सख्त विकल्पों पर विचार कर रही है। इनमें 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव भी शामिल है। इससे साफ है कि यूरोप में इस मुद्दे पर साझा चिंता उभर रही है।

उम्र सत्यापन को लेकर सख्ती की तैयारी

फ्रांस में इस प्रस्ताव की अगुवाई राष्ट्रपति मैक्रों की पार्टी रिनेसां की सांसद लॉर मिलर कर रही हैं। उनका कहना है कि मौजूदा समय में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उम्र की जांच लगभग नाममात्र की है। कोई भी व्यक्ति केवल जन्मतिथि डालकर आसानी से अकाउंट बना लेता है। सरकार चाहती है कि यूरोपीय डिजिटल सर्विसेज एक्ट के तहत प्लेटफॉर्म्स को असली उम्र की सख्त पुष्टि करनी पड़े। इसका मतलब यह होगा कि यूजर को यह साबित करना होगा कि वह 15 साल से ऊपर है या नहीं।

नियमों की सीमाएं, लेकिन दिशा स्पष्ट

लॉर मिलर ने यह भी स्वीकार किया कि नियमों से बचने के रास्ते हमेशा खोजे जा सकते हैं, लेकिन उनका कहना है कि इससे कम से कम एक स्पष्ट संदेश जाएगा कि सरकार बच्चों की सुरक्षा को गंभीरता से ले रही है। उनके अनुसार, यह कदम ऑनलाइन नुकसान को पूरी तरह खत्म नहीं करेगा, लेकिन जोखिम को काफी हद तक कम कर सकता है।

ऑस्ट्रेलिया में किताब से शुरू हुआ बदलाव

ऑस्ट्रेलिया में सोशल मीडिया बैन के पीछे एक अहम वजह 2024 में प्रकाशित अमेरिकी सामाजिक मनोवैज्ञानिक जोनाथन हाइट की किताब द एंग्जायस जेनरेशन को भी माना जाता है। किताब में तर्क दिया गया है कि सोशल मीडिया बच्चों की मानसिक सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा रहा है। बताया जाता है कि इस किताब को पढ़ने के बाद दक्षिण ऑस्ट्रेलिया के मुख्यमंत्री की पत्नी ने अपने पति से कहा था कि “इस पर कुछ करना ही होगा।” यहीं से यह मुद्दा राज्य स्तर से राष्ट्रीय अभियान में बदल गया।

भारत में आदेश, लेकिन अमल नहीं

भारत में भी बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल को लेकर न्यायिक स्तर पर चिंता जताई जा चुकी है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अगस्त 2013 में केएन गोविंदाचार्य मामले में कहा था कि नाबालिग बच्चे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जॉइन नहीं कर सकते और कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे उम्र की सही जांच करें। अदालत का मानना था कि सोशल मीडिया बच्चों की मानसिक सेहत, पढ़ाई और सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। हालांकि, जमीनी स्तर पर इस आदेश का कभी सख्ती से पालन नहीं हो पाया।

निष्कर्ष

फ्रांस का प्रस्तावित कदम इस बहस को एक नई दिशा देता है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा के लिए सरकारों को कितनी दूर तक जाना चाहिए। मैक्रों का संदेश साफ हैबच्चों की मानसिक दुनिया को बाजार के हवाले नहीं किया जा सकता। आने वाले महीनों में यह देखा जाएगा कि फ्रांस का यह मॉडल दूसरे देशों के लिए कितनी बड़ी मिसाल बनता है।

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Author: THE CG NEWS

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