
छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में स्थित लाइवलीहुड कॉलेज अब सिर्फ एक शैक्षणिक संस्थान नहीं, बल्कि नक्सलवाद से मुख्यधारा की ओर लौटने की एक बड़ी मिसाल बन चुका है। कभी जिस कॉलेज पर हथियारों के साथ हमला किया गया था, आज उसी परिसर में 110 आत्मसमर्पित नक्सली सुरक्षित माहौल में रहकर सिलाई, ड्राइविंग, मैकेनिक, नल-सोलर मिस्त्री जैसे हुनर सीख रहे हैं। कॉलेज परिसर पूरी तरह सुरक्षा घेरे में है और बिना अनुमति प्रवेश प्रतिबंधित है, क्योंकि इसे नक्सलियों के पुनर्वास केंद्र के रूप में विकसित किया गया है।
हथियार से हुनर तक का सफर
इन आत्मसमर्पित नक्सलियों में कई ऐसे हैं जिन पर एक समय 8-8 लाख रुपये तक का इनाम घोषित था। वर्षों तक जंगलों में बिताई ज़िंदगी, लगातार मुठभेड़ और हिंसा का हिस्सा रहे ये लोग अब सामान्य जीवन की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। उनका कहना है कि जंगल की कठिन और असुरक्षित ज़िंदगी की तुलना में यह जीवन बेहतर है, हालांकि मानसिक रूप से ढलने में समय लग रहा है।
पंडीराम ध्रुव: नाटक से संगठन तक, फिर मुख्यधारा की वापसी
कटुलनार निवासी पंडीराम ध्रुव बताते हैं कि वर्ष 2010 में गांव में आने वाले नक्सलियों के नाटक और पर्चों से प्रभावित होकर वे संगठन से जुड़े। जंगल में दलम के साथ भर्ती हुई, पहले हथियार साफ करने और बाद में बंदूक चलाने की ट्रेनिंग मिली। पुलिस के साथ कई मुठभेड़ों में शामिल रहे। शादीशुदा होने के बावजूद परिवार से मिलने के लिए संगठन की अनुमति लेनी पड़ती थी। बाद में साथियों के सरेंडर और लगातार दबाव के बाद उन्होंने भी मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया।
डर और चुप्पी के बीच नई शुरुआत
कॉलेज के प्राचार्य मानकलाल अहिरवार बताते हैं कि कई सरेंडर नक्सली आज भी अपने अतीत और भविष्य को लेकर मानसिक संघर्ष से गुजर रहे हैं। कुछ को गांव लौटने का डर है, कुछ बेहद खामोश रहते हैं। बावजूद इसके, अनुशासन और सीखने की इच्छा इनमें साफ दिखाई देती है।
सुखलाल: डॉक्टर बनने का सपना जंगल में अधूरा, अब नई उम्मीद
ऐनमेटा गांव निवासी सुखलाल ने 14 साल की उम्र में संगठन जॉइन किया। पढ़ाई के दौरान नक्सली नेताओं की कहानियों से प्रभावित होकर वे क्रांति की राह पर चले गए। संगठन में रहते हुए उन्हें प्राथमिक चिकित्सा और छोटी सर्जरी तक की ट्रेनिंग दी गई। कई मुठभेड़ों में घायल साथियों का इलाज किया। लगातार बढ़ते फोर्स दबाव और साथियों की मौत के बाद उन्होंने 20 अगस्त 2025 को आत्मसमर्पण कर दिया।
दिवाकर गावड़े: हथियार बनाने से लेकर सरेंडर तक
कांकेर निवासी दिवाकर गावड़े 2004 में संगठन से जुड़े। बाद में वे प्लाटून कमांडर और डिविजन कमांड चीफ बने। अबूझमाड़ में उन्हें हथियार बनाने की जिम्मेदारी दी गई, जहां वे बीजीएल से लेकर 12 बोर तक के हथियार बनाने लगे। कई मुठभेड़ों में इन हथियारों का इस्तेमाल हुआ। पुलिस कार्रवाई के बढ़ते खतरे के चलते 8 अक्टूबर 2025 को उन्होंने सरेंडर किया।
रमली: नाच-गाने से प्रभावित होकर उठाई बंदूक
नारायणपुर जिले की रमली बताती हैं कि 2008 में संगठन के सांस्कृतिक कार्यक्रमों से प्रभावित होकर वे नक्सलियों के साथ जंगल चली गईं। परिवार के विरोध के बावजूद उन्होंने यह रास्ता चुना। संगठन में उन्हें यह सिखाया गया कि पुलिस दुश्मन है। पिता की मृत्यु और लगातार बढ़ते दबाव के बाद उन्होंने 2024 में आत्मसमर्पण कर दिया।
कमला जूरी: 19 साल जंगल में, अब चुप्पी के साथ नया जीवन
ऐनमेटा गांव की कमला जूरी 2006 में संगठन से जुड़ीं और बाद में डिप्टी कमांडर बनीं। संगठन के भीतर शादी के बाद उनके पति की नसबंदी कर दी गई। बढ़ती हिंसा और असुरक्षा के चलते उन्होंने जुलाई 2025 में सरेंडर किया। उनका कहना है कि जंगल में बिताए लंबे समय के बाद अब सामान्य जीवन में ढलना आसान नहीं है।
संगठन में नसबंदी की कड़वी सच्चाई
नक्सली संगठन में शादी के बाद पुरुषों की नसबंदी आम प्रक्रिया थी। तर्क दिया जाता था कि बच्चे होने से संगठन की गतिविधियों में बाधा आएगी और जंगल में इलाज की सुविधाएं नहीं हैं। इसके लिए संगठन द्वारा डॉक्टर भी रखे जाते थे। यह व्यवस्था वर्षों तक चलती रही।
नई राह, नई चुनौती
नारायणपुर का लाइवलीहुड कॉलेज आज उन लोगों के लिए नई शुरुआत का प्रतीक है, जिन्होंने कभी हिंसा का रास्ता चुना था। सरकार और प्रशासन की कोशिश है कि प्रशिक्षण, सुरक्षा और मानसिक काउंसलिंग के जरिए इन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ा जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को भटकने से रोका जा सके।
Author: THE CG NEWS
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