
डिजिटल दौर में पेरेंट्स के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है—बच्चों का सोशल मीडिया की ओर बढ़ता आकर्षण। 15 साल की एक छात्रा की मां ने चिंता जताई कि उनकी बेटी इंस्टाग्राम अकाउंट बनाना चाहती है और कहती है, “सब दोस्तों का है, मेरा क्यों नहीं?” मां को साइबर बुलिंग, प्राइवेसी और ऑनलाइन खतरों की चिंता है, जबकि बेटी को लगता है कि घरवाले पुराने विचारों वाले हैं।
इस मुद्दे पर जयपुर की साइकोलॉजिस्ट और फैमिली एंड चाइल्ड काउंसलर डॉ. अमिता श्रृंगी कहती हैं कि आज लगभग हर परिवार इस दुविधा से गुजर रहा है। टीनएज वह उम्र है जब बच्चे ‘फोमो’ यानी पीछे छूट जाने का डर महसूस करते हैं। जब दोस्तों के बीच किसी रील, ट्रेंड या पोस्ट की चर्चा होती है तो जिन बच्चों को उसकी जानकारी नहीं होती, वे खुद को अलग-थलग महसूस करते हैं।
टीनएज में सोशल मीडिया का आकर्षण क्यों?
विशेषज्ञों के मुताबिक 13 से 16 साल की उम्र में बच्चों के लिए ‘सोशल वैलिडेशन’ बहुत मायने रखता है। सोशल मीडिया उन्हें एक ऐसा मंच देता है, जहां वे अपनी पहचान दिखा सकते हैं, अपनी पसंद साझा कर सकते हैं और तुरंत प्रतिक्रिया (लाइक्स, कमेंट्स, व्यूज) पा सकते हैं। यह प्रतिक्रिया उनके आत्मविश्वास को प्रभावित करती है।
सोशल मीडिया केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि टीनएजर्स के लिए यह एक वर्चुअल स्पेस है, जहां वे अपनी जगह तलाशते हैं। ऐसे में पूरी तरह रोक लगाने से बच्चे जिज्ञासु हो सकते हैं और चोरी-छिपे अकाउंट बना सकते हैं।
खतरे भी कम नहीं
हालांकि सोशल मीडिया के कई जोखिम भी हैं। इस उम्र में बच्चों का मस्तिष्क पूरी तरह विकसित नहीं होता और ‘इम्पल्स कंट्रोल’ यानी खुद पर नियंत्रण कम होता है। वे बिना सोचे-समझे फोटो या निजी जानकारी साझा कर सकते हैं।
ऑनलाइन बुलिंग, फेक प्रोफाइल, स्क्रीनशॉट का दुरुपयोग, निजी तस्वीरों का वायरल होना और ऑनलाइन चैलेंज जैसे खतरे आम हो चुके हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि ज्यादा सोशल मीडिया उपयोग से एंग्जायटी, नींद की कमी, आत्मविश्वास में गिरावट और डिप्रेशन जैसी समस्याएं भी देखी गई हैं।
हाल ही में कुछ देशों ने नाबालिगों के लिए सोशल मीडिया पर सख्त नियम लागू किए हैं। यह उदाहरण बच्चों को समझाने में मददगार हो सकते हैं कि डिजिटल दुनिया में सावधानी क्यों जरूरी है।
रोक नहीं, संवाद जरूरी
डॉ. श्रृंगी कहती हैं कि पेरेंट्स का रोल ‘पुलिस’ का नहीं, बल्कि ‘गाइड’ का होना चाहिए। डराकर या पाबंदी लगाकर समस्या हल नहीं होती। बेहतर है कि बच्चों से खुलकर बातचीत की जाए।
बेटी को यह समझाया जा सकता है कि इंटरनेट पर डाली गई चीजें हमेशा के लिए रह सकती हैं। किसी भी फोटो या चैट का स्क्रीनशॉट लेकर उसका गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। साथ ही यह भी भरोसा दिलाना जरूरी है कि अगर ऑनलाइन कुछ गलत होता है, तो वह बिना डरे घरवालों को बता सकती है।
अगर अकाउंट बनाने दें तो ये गाइडलाइंस तय करें
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि यदि बच्चा 15-16 साल का है और सोशल मीडिया पर आना चाहता है, तो कुछ नियम तय किए जा सकते हैं—
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अकाउंट प्राइवेट रखा जाए।
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केवल परिचित लोगों को फॉलो या स्वीकार किया जाए।
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रोजाना स्क्रीन टाइम की सीमा तय हो।
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पासवर्ड मजबूत हो और पेरेंट्स को उसकी जानकारी हो (कम से कम शुरुआती दौर में)।
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किसी भी अजनबी मैसेज या संदिग्ध लिंक पर प्रतिक्रिया न दी जाए।
इसके अलावा पेरेंट्स समय-समय पर बातचीत के जरिए यह जान सकते हैं कि बच्चा क्या देख रहा है और किससे जुड़ा है, लेकिन लगातार जासूसी करने से बचना चाहिए।
पेरेंट्स खुद भी बनें रोल मॉडल
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर पेरेंट्स खुद हर समय मोबाइल पर व्यस्त रहते हैं, तो बच्चों पर नियंत्रण कठिन हो जाता है। संतुलित व्यवहार ही बच्चों को संतुलन सिखाता है।
बच्चों की बात सुने बिना निर्णय थोपना, गलती पर शर्मिंदा करना या डर का माहौल बनाना उल्टा असर डाल सकता है।
अंततः सवाल यह नहीं है कि सोशल मीडिया पूरी तरह सही है या गलत। असली बात यह है कि उसे कितनी समझ, समय-सीमा और निगरानी के साथ उपयोग किया जा रहा है। पेरेंट्स का काम बच्चों को डिजिटल दुनिया से काटना नहीं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार और सुरक्षित यूजर बनाना है। संवाद, भरोसा और संतुलन—यही आधुनिक पेरेंटिंग की कुंजी है।
Author: THE CG NEWS
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