
बोर्ड परीक्षाओं का दौर शुरू होते ही देश के लाखों घरों में पढ़ाई, टेस्ट सीरीज, रिवीजन प्लान और रिजल्ट को लेकर चिंता का माहौल बन जाता है। पढ़ाई से जुड़ा हल्का तनाव सामान्य है और कई बार यह प्रदर्शन बेहतर करने में मदद भी करता है। लेकिन जब यही दबाव लंबे समय तक बना रहे और बच्चे की मानसिक व शारीरिक सेहत को प्रभावित करने लगे, तो यह गंभीर समस्या का रूप ले सकता है।
हाल ही में प्रतिष्ठित मेडिकल जर्नल ‘द लैंसेट चाइल्ड एंड एडोल्सेंट हेल्थ’ में प्रकाशित एक अध्ययन ने चेतावनी दी है कि 15 वर्ष की आयु में अत्यधिक शैक्षणिक दबाव आगे चलकर डिप्रेशन, सेल्फ-हार्म और यहां तक कि आत्महत्या के प्रयास के जोखिम को भी बढ़ा सकता है।
क्या है एकेडमिक स्ट्रेस?
जयपुर की साइकोलॉजिस्ट डॉ. अमिता श्रृंगी के अनुसार, एकेडमिक स्ट्रेस वह मानसिक दबाव है जो छात्र पढ़ाई, परीक्षा, प्रतिस्पर्धा और अभिभावकों या शिक्षकों की अपेक्षाओं के कारण महसूस करते हैं। जब सिलेबस का बोझ, लगातार टेस्ट, अच्छे नंबर लाने का दबाव और दूसरों से तुलना लगातार बनी रहती है, तो यह तनाव बच्चे की सोच, भावनाओं और शरीर तीनों पर असर डाल सकता है।
इसके लक्षणों में चिड़चिड़ापन, चिंता, एकाग्रता में कमी, सिरदर्द, नींद की समस्या और आत्मविश्वास में गिरावट शामिल हैं। यदि यह स्थिति हफ्तों या महीनों तक बनी रहे और रोजमर्रा के कामकाज को प्रभावित करे, तो इसे क्रॉनिक एकेडमिक स्ट्रेस माना जाता है।
रिसर्च क्या कहती है?
स्टडी में करीब 5,000 बच्चों को किशोरावस्था से युवावस्था तक ट्रैक किया गया। निष्कर्षों के अनुसार, 15 साल की उम्र में अत्यधिक परीक्षा दबाव 16 वर्ष की आयु तक डिप्रेशन के जोखिम को 25% तक बढ़ा देता है। वहीं सेल्फ-हार्म का खतरा 8% बढ़ता पाया गया। इतना ही नहीं, 24 वर्ष की उम्र तक आत्महत्या के प्रयास का जोखिम 16% तक बढ़ सकता है।
दिल्ली के पीएसआरआई अस्पताल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. भास्कर शुक्ला बताते हैं कि लंबे समय तक तनाव रहने पर शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन का स्तर बढ़ा रहता है। यह ब्रेन के हिप्पोकैंपस (याददाश्त से जुड़ा हिस्सा) और प्री-फ्रंटल कॉर्टेक्स (निर्णय और फोकस से जुड़ा हिस्सा) की कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकता है। साथ ही एमिगडेला, जो भावनाओं को नियंत्रित करता है, अधिक सक्रिय हो सकता है। इसका असर स्मृति, एकाग्रता और भावनात्मक संतुलन पर पड़ता है।
नॉर्मल स्ट्रेस और डिप्रेशन में अंतर
हल्का या मध्यम तनाव, जिसे ‘यू-स्ट्रेस’ कहा जाता है, बच्चों को प्रेरित करता है और परीक्षा के समय प्रदर्शन सुधार सकता है। लेकिन जब उदासी, निराशा, रुचि की कमी और थकान दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक लगातार बनी रहे, तो यह डिप्रेशन का संकेत हो सकता है। डिप्रेशन में नींद, भूख, आत्मविश्वास और दैनिक गतिविधियां गंभीर रूप से प्रभावित होती हैं।
सोशल मीडिया भी बढ़ा रहा दबाव
विशेषज्ञ मानते हैं कि सोशल मीडिया भी शैक्षणिक तनाव को बढ़ाने में भूमिका निभा रहा है। लगातार दूसरों की उपलब्धियों और ‘परफेक्ट’ जीवनशैली को देखने से तुलना और आत्म-संदेह बढ़ता है। देर रात तक स्क्रीन टाइम नींद को प्रभावित करता है, जिससे थकान और चिड़चिड़ापन बढ़ता है।
भविष्य में बीमारियों का जोखिम
कम उम्र में लगातार तनाव सिर्फ मानसिक ही नहीं, शारीरिक बीमारियों का खतरा भी बढ़ाता है। लंबे समय तक बढ़ा हुआ कॉर्टिसोल स्तर मेटाबॉलिज्म, हृदय स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा प्रणाली पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है। इससे आगे चलकर एंग्जायटी डिसऑर्डर, बर्नआउट, हाई ब्लड प्रेशर और नींद संबंधी विकारों का खतरा बढ़ सकता है।
कैसे करें बचाव?
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि स्ट्रेस को पूरी तरह खत्म करना संभव नहीं, लेकिन इसे नियंत्रित किया जा सकता है। बच्चों और अभिभावकों को समय प्रबंधन पर ध्यान देना चाहिए। रोजाना 7-8 घंटे की नींद, संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि जरूरी है। स्क्रीन टाइम सीमित करें और सोने-जागने का नियमित रूटीन बनाएं।
बड़े लक्ष्यों को छोटे-छोटे टास्क में बांटने से दबाव कम होता है। भावनाओं को दबाने के बजाय परिवार या दोस्तों से साझा करना मददगार होता है। तुलना से बचें और यथार्थवादी लक्ष्य तय करें। जरूरत पड़ने पर काउंसलर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सलाह लेने में संकोच न करें।
परीक्षाएं जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। समय रहते संतुलन बनाए रखना ही बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की असली कुंजी है।
Author: THE CG NEWS
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