
शुरुआती जांच के बाद बड़ा फैसला; 6 जुलाई को अंतिम निर्णय, अमेरिकी बाजार में भारतीय कंपनियों के लिए चुनौती
अमेरिका ने भारत से आयात होने वाले सोलर पैनल और सोलर सेल पर 126% तक की शुरुआती काउंटरवेलिंग ड्यूटी (CVD) लगाने की घोषणा की है। यह फैसला अमेरिकी वाणिज्य विभाग की प्रारंभिक जांच के आधार पर लिया गया है। विभाग का आरोप है कि भारत अपने सोलर निर्माताओं को अनुचित सरकारी सब्सिडी दे रहा है, जिससे अमेरिकी घरेलू उद्योग को नुकसान हो रहा है। भारत के अलावा इंडोनेशिया और लाओस पर भी 81% से 143% तक की ड्यूटी प्रस्तावित की गई है। इस मामले में अंतिम निर्णय 6 जुलाई को आएगा। यदि सब्सिडी के आरोप साबित होते हैं, तो यह ड्यूटी स्थायी रूप से लागू हो सकती है।
अमेरिकी बाजार में बढ़ेगी कीमत, प्रतिस्पर्धा होगी कठिन
126% ड्यूटी का सीधा असर कीमतों पर पड़ेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक, इतनी ऊंची लेवी के बाद अमेरिकी बाजार में भारतीय सोलर मॉड्यूल की कीमत दोगुनी से अधिक हो सकती है। ऐसे में अमेरिकी खरीदार स्थानीय निर्माताओं या अन्य देशों से खरीदारी को प्राथमिकता दे सकते हैं। इससे भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिका में प्रतिस्पर्धा करना बेहद कठिन हो जाएगा।
ब्लूमबर्ग एनईएफ के आंकड़ों के अनुसार, 2025 की पहली छमाही में अमेरिका में आयात होने वाले सोलर मॉड्यूल का 57% हिस्सा भारत, इंडोनेशिया और लाओस से आया था। भारत ने 2024 में अमेरिका को 792.6 मिलियन डॉलर (करीब 7,200 करोड़ रुपये) के सोलर उत्पाद निर्यात किए, जो 2022 की तुलना में नौ गुना अधिक है। ऐसे में यह फैसला भारतीय उद्योग के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
चीन के ‘रूट’ का आरोप
अमेरिकी सोलर निर्माताओं का आरोप है कि चीनी कंपनियां अमेरिकी टैरिफ से बचने के लिए भारत, इंडोनेशिया और लाओस के जरिए सस्ता माल अमेरिका भेज रही हैं। पहले चीन ने वियतनाम, मलेशिया और थाईलैंड जैसे देशों के रास्ते निर्यात किया था। वहां सख्ती बढ़ने के बाद उत्पादन और निर्यात का रुख अन्य एशियाई देशों की ओर मोड़ा गया। अमेरिकी उद्योग संगठनों का दावा है कि इस रणनीति से अमेरिकी बाजार में सस्ते मॉड्यूल की बाढ़ आई, जिससे घरेलू कंपनियों को नुकसान हुआ।
‘अलायंस फॉर अमेरिकन सोलर मैन्युफैक्चरिंग एंड ट्रेड’ ने वाणिज्य विभाग से सब्सिडी और डंपिंग की जांच की मांग की थी। संगठन के मुख्य वकील टिम ब्राइटबिल ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि यह कदम अमेरिकी सोलर उद्योग में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बहाल करने की दिशा में महत्वपूर्ण है। उनका तर्क है कि अमेरिकी कंपनियां उत्पादन क्षमता बढ़ाने और रोजगार सृजन के लिए अरबों डॉलर का निवेश कर रही हैं, जिसे सस्ते आयात से खतरा है।
ट्रम्प के 10% ग्लोबल टैरिफ से अलग
यह ड्यूटी हाल ही में घोषित 10% ग्लोबल टैरिफ से अलग है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने पिछले सप्ताह पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की एक पुरानी टैरिफ योजना को रद्द कर दिया था, जिसके बाद नए सिरे से टैरिफ लागू किए गए। हालांकि, सोलर पैनलों पर यह कार्रवाई विशेष रूप से सब्सिडी और डंपिंग के आरोपों से जुड़ी है।
एंटी-डंपिंग जांच भी जारी
अमेरिकी वाणिज्य विभाग सोलर सेल पर एंटी-डंपिंग ड्यूटी की भी जांच कर रहा है। आरोप है कि भारत, इंडोनेशिया और लाओस की कंपनियां अपने उत्पाद लागत से कम कीमत पर अमेरिका में बेच रही हैं, जिससे स्थानीय उद्योग प्रभावित हो रहा है। जुलाई में दायर याचिका के बाद इंटरनेशनल ट्रेड कमीशन ने एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी के दावों की जांच शुरू की थी।
क्या होती है एंटी-डंपिंग और काउंटरवेलिंग ड्यूटी?
एंटी-डंपिंग ड्यूटी तब लगाई जाती है जब कोई देश अपने उत्पादों को घरेलू बाजार से कम कीमत पर दूसरे देश में बेचता है, जिससे वहां के उद्योग को नुकसान होता है। वहीं, काउंटरवेलिंग ड्यूटी तब लागू होती है जब किसी देश की सरकार निर्यातकों को सब्सिडी देती है और आयातक देश उस प्रभाव को संतुलित करने के लिए अतिरिक्त कर लगाता है।
उद्योग पर संभावित असर
विश्लेषकों का मानना है कि यदि अंतिम निर्णय में भी इतनी ही ऊंची ड्यूटी बरकरार रहती है, तो भारतीय सोलर कंपनियों को अमेरिकी बाजार से अपने निर्यात में भारी गिरावट का सामना करना पड़ सकता है। सिटीग्रुप के विश्लेषक विक्रम बागरी के अनुसार, इतनी ऊंची लेवी के बाद अमेरिकी बाजार भारतीय निर्माताओं के लिए लगभग बंद हो जाएगा।
हालांकि, अंतिम निर्णय 6 जुलाई को आने वाला है। तब तक भारतीय उद्योग और सरकार की ओर से कूटनीतिक और व्यापारिक स्तर पर प्रयास जारी रहने की संभावना है। यह मामला वैश्विक सोलर सप्लाई चेन और भारत–अमेरिका व्यापार संबंधों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Author: THE CG NEWS
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