नेपाल चुनाव में बड़ा उलटफेर: बालेन शाह ने केपी शर्मा ओली को 50 हजार वोटों से हराया, 4 साल पुरानी पार्टी बनी सबसे बड़ी ताकत

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नेपाल में जारी आम चुनावों के नतीजों ने देश की राजनीति में बड़ा बदलाव का संकेत दिया है। मतगणना के शुरुआती रुझानों में राजधानी काठमांडू के पूर्व मेयर और लोकप्रिय रैपर बालेन शाह ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को करारी शिकस्त दी है। झापा-5 संसदीय सीट से हुए इस मुकाबले में बालेन शाह ने करीब 50 हजार वोटों के बड़े अंतर से जीत हासिल की है।

चुनाव आयोग के अनुसार बालेन शाह को 68,348 वोट मिले, जबकि नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और कम्युनिस्ट नेता केपी शर्मा ओली को 18,734 वोट ही मिल सके। ओली इससे पहले 2017 और 2022 में इसी सीट से चुनाव जीत चुके थे, लेकिन इस बार उन्हें भारी हार का सामना करना पड़ा है। इस परिणाम को नेपाल की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का उभार

बालेन शाह की जीत के साथ उनकी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) भी इस चुनाव में मजबूत स्थिति में उभरती दिखाई दे रही है। शुरुआती रुझानों के मुताबिक RSP अब तक 62 सीटें जीत चुकी है और करीब 60 सीटों पर आगे चल रही है।

यह पार्टी महज चार साल पहले बनाई गई थी। इसे पूर्व पत्रकार रबि लामिछाने ने स्थापित किया था। कम समय में ही पार्टी ने युवाओं और शहरी मतदाताओं के बीच अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। विश्लेषकों का मानना है कि भ्रष्टाचार विरोधी छवि और पारंपरिक राजनीति से अलग पहचान के कारण RSP को बड़ी सफलता मिल रही है।

बालेन शाह की लोकप्रियता का असर

बालेन शाह पहले काठमांडू के मेयर रह चुके हैं और सोशल मीडिया तथा युवा वर्ग के बीच उनकी मजबूत लोकप्रियता रही है। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान शहरी विकास और प्रशासनिक सुधार के कई फैसले लिए थे, जिससे उन्हें व्यापक समर्थन मिला।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बालेन शाह की जीत यह संकेत देती है कि नेपाल में युवा नेतृत्व और नई राजनीति की मांग बढ़ रही है। खासतौर पर शहरी क्षेत्रों में पारंपरिक दलों के प्रति नाराजगी और बदलाव की चाहत स्पष्ट रूप से दिखाई दे रही है।

केपी शर्मा ओली की हार के राजनीतिक मायने

केपी शर्मा ओली नेपाल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में गिने जाते रहे हैं। वह दो बार नेपाल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं और उनकी पार्टी नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी लंबे समय तक देश की प्रमुख राजनीतिक ताकत रही है।

ओली को अक्सर भारत के प्रति कड़े रुख वाले नेता के रूप में भी देखा जाता रहा है। उनके कार्यकाल में नेपाल और भारत के बीच कई मुद्दों पर तनाव भी देखने को मिला था। ऐसे में उनकी हार को नेपाल की राजनीति में बदलते समीकरणों के रूप में देखा जा रहा है।

हिंसक प्रदर्शनों के बाद हुए चुनाव

नेपाल में यह आम चुनाव पिछले साल सितंबर में हुए हिंसक प्रदर्शनों के बाद आयोजित किए गए हैं। इन प्रदर्शनों के कारण राजनीतिक अस्थिरता का माहौल बना था, जिसके बाद देश में नए जनादेश की जरूरत महसूस की गई।

5 मार्च को हुए मतदान में करीब 58 प्रतिशत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। चुनाव आयोग के अनुसार मतगणना अभी जारी है और सभी नतीजे आने में तीन से चार दिन लग सकते हैं। आयोग ने कहा है कि 9 मार्च तक पूरी मतगणना समाप्त करने की कोशिश की जा रही है।

नेपाल की मिश्रित चुनाव प्रणाली

नेपाल में संसद के चुनाव मिश्रित चुनाव प्रणाली के तहत कराए जाते हैं। देश की संसद में कुल 275 सीटें हैं, जिनमें से 165 सीटों पर सीधे चुनाव के जरिए सांसद चुने जाते हैं। इस व्यवस्था को ‘फर्स्ट पास्ट द पोस्ट’ प्रणाली कहा जाता है, जिसमें जिस उम्मीदवार को सबसे ज्यादा वोट मिलते हैं, वही विजेता घोषित होता है।

इसके अलावा बाकी 110 सीटें प्रोपोर्शनल रिप्रेजेंटेशन यानी आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत बांटी जाती हैं। इसमें मतदाता किसी उम्मीदवार को नहीं बल्कि किसी राजनीतिक दल को वोट देते हैं। पूरे देश में पार्टी को मिले कुल वोट प्रतिशत के आधार पर उसे संसद में सीटें दी जाती हैं।

छोटे दलों को भी मिलता है प्रतिनिधित्व

नेपाल की इस चुनाव प्रणाली का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि छोटे राजनीतिक दलों और अलग-अलग सामाजिक समूहों को भी संसद में प्रतिनिधित्व मिल सके। इससे किसी एक पार्टी का पूर्ण वर्चस्व बनने की संभावना कम हो जाती है और गठबंधन राजनीति को बढ़ावा मिलता है।

वर्तमान चुनाव परिणामों से संकेत मिल रहा है कि नेपाल की राजनीति में नई ताकतें उभर रही हैं और पारंपरिक दलों को कड़ी चुनौती मिल रही है। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि नई संसद में किस तरह की सरकार बनती है और देश की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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Author: THE CG NEWS

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