पद्मश्री डॉ. सुरेन्द्र दुबे का निधन: हास्य–व्यंग्य की दुनिया में शोक की लहर

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रायपुर, 26 जून 2025 – पद्मश्री से सम्मानित प्रख्यात हास्य–व्यंग्य कवि डॉ. सुरेन्द्र दुबे का आज दोपहर रायपुर के एडवांस कार्डियक इंस्टिट्यूट (ACI) में हार्ट अटैक के कारण निधन हो गया। वह 71 वर्ष के थे। लंबे समय से उनका इलाज चल रहा था और आज दोपहर 4:00 से 4:30 बजे के बीच उनकी हृदयगति रुक गई, जिसके बाद उन्हें बचाया नहीं जा सका। परिवार के अनुसार, अस्पताल की लापरवाही भी एक बड़ा कारण रही, जिसकी जांच की माँग की गई है।

साहित्यिक जीवन और सम्मान

डॉ. सुरेन्द्र दुबे का जन्म 8 अगस्त 1953 को बेमेतरा, छत्तीसगढ़ में हुआ था। वे पेशे से आयुर्वेदाचार्य थे, लेकिन साहित्यिक दुनिया में उनका नाम हास्य–व्यंग्य के मंचीय कवि के रूप में प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने “मिथक मंथन”, “दो पाँव का आदमी”, “सवाल ही सवाल है” जैसी चर्चित पुस्तकें लिखीं। 2008 में उन्हें काका हाथरसी सम्मान और 2010 में भारत सरकार द्वारा पद्मश्री से नवाजा गया। वे भारत के उन चुनिंदा कवियों में से थे जिन्होंने हास्य–व्यंग्य को सम्मान और लोकप्रियता दोनों दिलाई।

अफवाह पर जवाब बनी कविता

2018 में उनके निधन की झूठी खबर सोशल मीडिया पर फैल गई थी, जिसका उन्होंने ज़िंदादिली से जवाब देते हुए एक कविता लिखी: “टाइगर अभी जिंदा है”। इस कविता ने न केवल अफवाह को खारिज किया बल्कि हास्य और व्यंग्य के माध्यम से एक गंभीर विषय को हल्के-फुल्के अंदाज में प्रस्तुत कर दिया। इस रचना ने उन्हें फिर से चर्चा में ला दिया और सोशल मीडिया पर लाखों लोगों ने इसे साझा किया।

कोरोना काल में ऊर्जा का संचार

कोविड-19 महामारी के समय भी डॉ. दुबे ने जनता को हँसी और उत्साह से जोड़े रखने का कार्य किया। उन्होंने एक कविता में कहा था: “हम हँसते हैं, लोगों को हँसाते हैं, इम्यूनिटी बढ़ाते हैं।” यह पंक्ति लोगों के दिलों को छू गई और साबित कर दिया कि हास्य केवल मनोरंजन नहीं बल्कि एक मानसिक औषधि भी है।

राजनेताओं और साहित्यकारों ने जताया शोक

डॉ. दुबे के निधन पर पूरे छत्तीसगढ़ सहित देश भर से शोक संदेश आने लगे। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने ट्वीट कर कहा, “छत्तीसगढ़ी साहित्य व हास्य काव्य के शिखर पुरुष हमारे बीच नहीं रहे, यह क्षति अपूरणीय है।” डिप्टी सीएम विजय शर्मा ने लिखा, “सुरेन्द्र जी जीवन भर मुस्कान बाँटते रहे, आज आँखें नम कर गए।” कवि कुमार विश्वास, अली मीर और पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी गहरा दुःख व्यक्त किया।

हास्य–व्यंग्य की अमर छवि

डॉ. दुबे ने अपने पूरे जीवन में यह साबित किया कि हास्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त विरोधाभासों को उजागर करने का प्रभावशाली तरीका है। उनकी आवाज़, उनकी शैली, और उनके शब्दों की गूंज आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचती रहेगी। वे उन विरलों में से एक थे, जिन्होंने मंचीय काव्य को जन–जन तक पहुँचाया और छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

निष्कर्ष

डॉ. सुरेन्द्र दुबे का निधन हिंदी साहित्य, खासकर हास्य–व्यंग्य की दुनिया के लिए एक अपूरणीय क्षति है। उन्होंने जिस आत्मीयता और प्रभाव के साथ शब्दों को मंच पर जीवंत किया, वह दुर्लभ है। उनकी कविताएँ, विचार और मुस्कान हमारे साथ सदा जीवित रहेंगी। जैसा उन्होंने एक बार लिखा था – “टाइगर अभी जिंदा है” – ठीक वैसे ही, उनकी स्मृतियाँ भी साहित्यिक चेतना में सदा जीवित रहेंगी।

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Author: THE CG NEWS

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