RSS ने प्रस्तावित समीक्षा: क्या ‘धर्मनिरपेक्ष’–‘समाजवादी’ हटना संविधान का अपमान?

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नई दिल्ली, 28 जून 2025 – हाल ही में RSS महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने भारतीय संविधान की प्रस्तावना से ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्दों की समीक्षा करने की अपील की, जिससे राजनीतिक वाक्य-विवाद की आग और तेज हो गई है। उन्होंने तर्क दिया कि ये शब्द 1976 के 42वें संशोधन के दौरान, देश पर आपातकाल के साये में जोड़े गए थे, जब संसद, न्यायपालिका और मौलिक अधिकार प्रभावित थे  ।
होसबाले के तर्क
उन्होंने कहा कि मूल रूप में B.R. Ambedkar की रूपरेखा में ये शब्द नहीं थे, बल्कि बाद में समर्थित आपातकाल के समय जोड़े गए। उन्होंने इसे संविधान की आत्मा से छेड़छाड़ बताते हुए कांग्रेस से आपातकाल पर माफी मांगने की मांग की  । RSS से जुड़े प्रकाशन ‘Organiser’ में यह चर्चा ‘मूल संविधान की भावना में पुनः लौटने’ के रूप में पेश की गई है, न कि संविधान को कमजोर करने के लिए  ।
विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया
वहीं कांग्रेस ने इसे संविधान की आत्मा पर हमला बताया। संचार प्रमुख जयराम रमेश ने यह कहा कि “RSS ने कभी भी संविधान स्वीकार नहीं किया” और उन्होंने ‍RSS–BJP को ‘मनुस्मृति’ लौटाने का आरोप भी लगाया  । राहुल गांधी ने भी कहा कि RSS संविधान को “मनुस्मृति” में बदलना चाहता है और यह पश्चिमी आलोचना नहीं, बल्कि संविधान के हितों का उल्लंघन है ।
राज्य नेताओं का भी विरोध
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस कदम को संविधान लेखन का अनुचित दृष्टिकोण करार दिया और कांग्रेस ने इसे टाला नहीं जाएगा कहा ()। केरल के सीएम पिनाराई विजयन ने इसे लोकतंत्र को कमजोर करने की साजिश कहा और कहा कि RSS आपातकाल में कांग्रेस से सहयोगी थीं, अतः उनका यह प्रस्ताव विरोधाभासी है  ।
RJD प्रमुख लालू प्रसाद ने भी RSS पर ‘सबसे बड़ी जातिवादी और घृणा फैलाने वाली संस्था’ होने का आरोप लगाया ।
संवैधानिक और न्यायिक संदर्भ
•सुप्रीम कोर्ट ने नवंबर 2024 में स्पष्ट किया है कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ और ‘समाजवादी’ शब्द 42वें संशोधन द्वारा जोड़े गए, लेकिन ये अब व्यापक रूप से स्वीकार्य हैं और संसद में इन शब्दों की वैधता बरकरार है  ।
•इतिहासकार कहते हैं कि संविधान के प्रारंभिक मसौदे में के.टी. शाह ने ‘secular’ शब्द जोड़ने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन डॉ. अम्बेडकर और समिति ने इसे अनावश्यक समझा।
•SC की “basic structure doctrine” के तहत प्रस्तावना का संरचनात्मक तत्व अपरिवर्तनीय है; संसद को संशोधन का अधिकार है, लेकिन आवश्यकता इसके बचाव की भी है।
राजनीति और लोकप्रिय बहस की दिशा
RSS के प्रस्ताव ने शासन-व्यवस्था और जनता के बीच नया विवाद खड़ा कर दिया है। कांग्रेस, Left-वामपंथी दलों ने इसे लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला बताया। सोशल मीडिया और विद्वानों ने भी इस पर बहस तेज कर दी है – क्या संविधान को मूल मसौदे की ओर वापस लौटना चाहिए या मौजूदा स्वरूप को सशक्त रखना चाहिए?
एक ओर RSS यह कह रहा है कि वह संविधान को संरक्षण करना चाहता है, वहीं विपक्ष इसे एक षड्यंत्र और संवैधानिक आधार पर हमला मान रहा है।
निष्कर्ष
राजनीतिक दलों, न्यायपालिका, और जनता के बीच यह विमर्श आगे बढ़ेगा – क्या भारत को वर्तमान संविधान की प्रस्तावना में परिवर्तन चाहिए? क्या ये शब्द संविधान के मौलिक ढांचे को प्रभावित करते हैं? या ये Indian Republic के आदर्शों का अभिन्न हिस्सा हैं?
यह बहस आने वाले दिनों में विधायी प्रस्ताव, सार्वजनिक चर्चा और शायद अदालतों तक जा सकती है, जहाँ इस मुद्दे का अंतिम फैसला हो सकता है। फिलहाल परिस्थिति यही है: RSS की समीक्षा की मांग—एक राजनीतिक झगड़ा, संवैधानिक बहस और लोकतांत्रिक विमर्श का नया अध्याय।
THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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