
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने एक अहम बयान देकर सामाजिक और राष्ट्रीय विकास की दिशा में एक नई चर्चा को जन्म दिया है। अपने हालिया संबोधन में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि “देश का सशक्तिकरण तभी संभव है जब समाज की आधी आबादी यानी महिलाएं पिछड़ी परंपराओं की बेड़ियों से पूरी तरह मुक्त हों।” उन्होंने जोर देकर कहा कि महिलाओं की स्वतंत्रता, समान अधिकार और सम्मान भारत के उज्जवल भविष्य की सबसे मजबूत नींव है।
“देश तभी आगे बढ़ेगा जब महिलाएं आगे बढ़ेंगी”
अपने भाषण में मोहन भागवत ने कहा, “भारत को अगर आत्मनिर्भर और वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ना है तो हमें महिलाओं को समाज में वही स्थान देना होगा जिसकी वे अधिकारिणी हैं। यह केवल सामाजिक सुधार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व है।”
उन्होंने यह भी जोड़ा कि पुरानी रूढ़ियों और परंपराओं के नाम पर महिलाओं को दबाना अब स्वीकार नहीं किया जा सकता। चाहे शिक्षा का अधिकार हो, रोजगार की स्वतंत्रता हो या सामाजिक नेतृत्व की भूमिका — हर क्षेत्र में महिलाओं की बराबरी अनिवार्य है।
परिवार से शुरू होनी चाहिए समानता की शिक्षा
डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में भारतीय पारिवारिक ढांचे की ओर इशारा करते हुए कहा कि परिवर्तन की शुरुआत घर से होनी चाहिए। “अगर परिवार में बेटा और बेटी को अलग दृष्टि से देखा जाता है, तो समाज कैसे समानता की दिशा में आगे बढ़ेगा?” उन्होंने कहा कि माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटियों को भी उतनी ही स्वतंत्रता दें जितनी बेटों को, ताकि वे आत्मनिर्भर बन सकें और समाज को नया आकार दे सकें।
“संस्कृति का अर्थ प्रतिबंध नहीं, प्रेरणा है”
आरएसएस प्रमुख ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति का वास्तविक अर्थ नारी को सीमित करना नहीं, बल्कि उसे सम्मानित करना है। उन्होंने कहा, “महिलाओं पर लगाए गए सामाजिक प्रतिबंध न संस्कृति हैं, न धर्म। असली धर्म तो सभी को समान अवसर देना और न्याय का पालन करना सिखाता है। जो परंपराएं नारी को आगे बढ़ने से रोकती हैं, वे सुधार की मांग करती हैं।”
यह बयान ऐसे समय में आया है जब देशभर में महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता को लेकर बहस तेज हो चुकी है, और विभिन्न राज्यों में शिक्षा, राजनीति और कार्यक्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पर सकारात्मक पहल देखी जा रही है।
राष्ट्रीय विकास में महिला भागीदारी जरूरी
मोहन भागवत ने यह भी कहा कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य तभी उज्जवल हो सकता है जब महिलाएं उसमें सक्रिय भागीदार हों। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, प्रशासन, और सेना जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी यह साबित करती है कि उन्हें अवसर मिले तो वे हर क्षेत्र में उत्कृष्टता प्राप्त कर सकती हैं।
उन्होंने कहा, “नारी केवल श्रद्धा की नहीं, सृजन और नेतृत्व की भी पात्र है। हमें यह समझना होगा कि समाज के विकास का इंजन तभी तेज़ी से दौड़ेगा जब उसके दोनों पहिए — पुरुष और महिला — समान गति से चलें।”
बदलते भारत की नई दिशा
RSS प्रमुख के इस बयान को सामाजिक संगठनों, शिक्षाविदों और नारी अधिकार कार्यकर्ताओं से सराहना मिल रही है। कई लोगों ने इसे संघ की सोच में सकारात्मक परिवर्तन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस दिशा में ठोस पहल हो, तो भारत न केवल सामाजिक रूप से प्रगतिशील बनेगा, बल्कि वैश्विक मंच पर भी अधिक सशक्त और समावेशी राष्ट्र बन सकेगा।
निष्कर्ष
मोहन भागवत का यह बयान केवल एक भाषण नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक ताने-बाने को नया आकार देने वाली सोच का प्रतीक है। यदि समाज इस संदेश को अपनाता है और महिलाओं को वास्तविक स्वतंत्रता व समानता प्रदान करता है, तो यह न केवल राष्ट्र के लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत और उज्ज्वल नींव साबित होगा।
Author: THE CG NEWS
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