मोदी बोले- भारत किसानों के हित से समझौता नहीं करेगा: अमेरिका के 25% टैरिफ के बावजूद कीमत चुकाने को तैयार

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को एक बार फिर स्पष्ट किया कि भारत किसानों के हितों से कोई समझौता नहीं करेगा, चाहे इसके लिए देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई भी कीमत क्यों न चुकानी पड़े। यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिका ने भारत के कृषि निर्यात पर 25% टैरिफ (शुल्क) लगाने की घोषणा की है, जो आज से प्रभावी हो गया है। यह मुद्दा विश्व व्यापार संगठन (WTO) में भारत के खाद्य भंडारण और कृषि सब्सिडी को लेकर चल रहे विवादों की पृष्ठभूमि में सामने आया है।

किसानों को लेकर मोदी का सख्त रुख

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में कहा कि भारत एक कृषि प्रधान देश है और यहां के किसानों की मेहनत देश की खाद्य सुरक्षा की रीढ़ है। उन्होंने कहा कि वैश्विक दबाव या व्यापारिक समझौतों के कारण सरकार किसानों के अधिकारों और उनकी भलाई से पीछे नहीं हटेगी। “हमारे किसान हमारे अन्नदाता हैं, हम उनके हितों से समझौता नहीं करेंगे। अगर इसके लिए हमें कीमत चुकानी पड़े, तो हम तैयार हैं,” पीएम मोदी ने कहा।

मोदी का यह बयान न केवल देश के किसानों को आश्वस्त करने के लिए था, बल्कि यह वैश्विक मंच पर एक स्पष्ट संदेश भी था कि भारत अपनी कृषि नीतियों को विदेशी दबाव में आकर नहीं बदलेगा।

WTO में खाद्य सब्सिडी को लेकर विवाद

अमेरिका, यूरोपीय संघ और कुछ अन्य विकसित देशों ने हाल ही में विश्व व्यापार संगठन में यह आपत्ति जताई थी कि भारत अपने किसानों को दी जाने वाली न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) जैसी सब्सिडी के जरिए WTO के नियमों का उल्लंघन कर रहा है। उनका तर्क है कि यह अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों के विरुद्ध है और इससे वैश्विक कृषि बाजार प्रभावित होता है।

भारत का पक्ष है कि खाद्य सुरक्षा कानून और किसानों को दी जाने वाली सहायता उसके आंतरिक नीति का हिस्सा हैं और इससे वैश्विक बाजार को कोई नुकसान नहीं होता। भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी खाद्य भंडारण नीति करोड़ों गरीब नागरिकों को सस्ती दर पर खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए जरूरी है।

अमेरिका की प्रतिक्रिया: टैरिफ का हथियार

भारत के अपने रुख पर कायम रहने के बाद अमेरिका ने भारतीय कृषि उत्पादों – खासकर चावल, दालें और कुछ फल-सब्जियों – पर 25% का आयात शुल्क लगाने की घोषणा कर दी, जो 7 अगस्त से लागू हो गया है। इससे भारत के इन उत्पादों की अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा घटेगी, जिससे निर्यात को झटका लग सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस टैरिफ से भारतीय कृषि उत्पादों की कीमत अमेरिका में बढ़ेगी और वहां की कंपनियां वैकल्पिक स्रोत तलाशेंगी। हालांकि भारत सरकार का कहना है कि वह इसके प्रभाव को कम करने के लिए अन्य बाजारों में निर्यात बढ़ाने पर ध्यान देगी।

राजनीतिक प्रतिक्रिया और किसानों की चिंता

प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्षी दलों ने मिलीजुली प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय दबाव को पहले ही संतुलित ढंग से संभाल लेना चाहिए था, ताकि किसानों को झटका न लगे। वहीं भारतीय किसान यूनियन जैसे संगठन प्रधानमंत्री के बयान से संतुष्ट नजर आए और कहा कि सरकार को WTO में मजबूती से देश का पक्ष रखना चाहिए।

देश के अलग-अलग राज्यों में किसानों ने भी अमेरिकी टैरिफ के खिलाफ नाराजगी जताई है। पंजाब, हरियाणा और आंध्र प्रदेश जैसे कृषि प्रधान राज्यों में किसानों ने प्रदर्शन कर सरकार से निर्यात प्रोत्साहन नीति में बदलाव की मांग की है।

आगे की रणनीति क्या होगी?

सरकार ने संकेत दिए हैं कि वह इस मसले पर WTO के मंच पर कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है। इसके अलावा भारत ने अमेरिका के इस फैसले को अनुचित और भेदभावपूर्ण बताया है। भारत अन्य विकासशील देशों के साथ मिलकर एक साझा मोर्चा बनाने की योजना बना रहा है, जिससे कृषि सब्सिडी पर उनकी नीति को मान्यता मिल सके।

इसके साथ ही सरकार घरेलू बाजार को स्थिर रखने और किसानों को आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए फसलों की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद को और सशक्त बनाने की योजना पर काम कर रही है।

निष्कर्ष

अमेरिका के टैरिफ के फैसले के बाद भारत और पश्चिमी देशों के बीच व्यापारिक तनाव और गहराने की संभावना है। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी के स्पष्ट रुख ने यह संकेत दिया है कि भारत अपनी खाद्य सुरक्षा और किसानों के हित को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा, चाहे इसके लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विरोध का सामना क्यों न करना पड़े। अब यह देखना होगा कि आने वाले महीनों में भारत अपनी कूटनीतिक रणनीति से इस दबाव से कैसे निपटता है और किसानों के हितों की रक्षा करता है।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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