
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने हाल ही में एक संवेदनशील मामले में सड़क को निजी संपत्ति समझने की प्रवृत्ति पर कड़ी टिप्पणी की है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक सड़कें किसी की निजी प्रॉपर्टी नहीं हैं और अमीरजादों पर मिल रही ढीली कार्रवाई आम नागरिकों के लिए खतरनाक मिसाल बन रही है ।
मामले की पूर्वभूमि
यह मामला सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो से शुरू हुआ, जिसमें कुछ युवा अपनी लग्जरी कारों को हाईवे पर रोककर जन्मदिन मना रहे थे—केक काटना और आतिशबाजी करना शामिल था। इस विडियो को देखकर हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और राज्य के मुख्य सचिव से इस मामले में उठाए गए कदमों की जानकारी मांगने के निर्देश दिए । न्यायालय की नज़रिया
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा:
“सड़कें सार्वजनिक संपत्ति हैं—व्यक्तिगत नहीं। ये ऐसे समझा गया जैसे वे मालिक हों। ऐसा व्यवहार समाज को अराजकता की दिशा में ले जाएगा।”
कोर्ट ने यह भी जोड़ा कि पुलिस और प्रशासन ने सिर्फ मामूली चालानी कार्रवाई की — 300 रुपये का जुर्माना काटा, फिर छोड़ दिया।
“यदि यह कोई आम नागरिक करता, तो उसे जेल तक भेजा जा सकता था। लेकिन अमीरजादों के मामले में लगता है कानून केवल गरीबों और असहायों पर लागू होता है।” 
समाजिक खतरे की चेतावनी
हाईकोर्ट ने इस प्रवृत्ति को बेहद खतरनाक बताया — क्योंकि यदि अमीर या प्रभावशाली लोग सड़क को उनका निजी अधिकार समझकर उपयोग करना शुरू करें, तो समाज में कानून-व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित होगी।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि यह “कानून-व्यवस्था का मखौल” है, जब सख्ती केवल आम लोगों के खिलाफ की जाती है, जबकि प्रभावशाली लोगों को छूट मिल जाती है ।
अधिकारियों पर कार्रवाई में देरी
सड़क जाम के बाद पुलिस ने केवल जुर्माना लगाया, गाड़ियां जब्त नहीं कीं। हाईकोर्ट ने इस निष्क्रियता पर सवाल उठाए और राज्य सरकार से पूछा कि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत अन्य धाराएं क्यों नहीं लगाईं गईं, और गाड़ियों को क्यों नहीं जब्त किया गया ।
कोर्ट का आदेश और आगे की कार्रवाई
हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव को एक व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश भी दिया है जिसमें स्पष्ट किया जाए कि दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई हुई, और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के कौन से निवारक कदम उठाए जाएंगे। अगली सुनवाई की तारीख भी जल्द ही तय की जाएगी ।
निष्कर्ष
यह घटना बताती है कि न्यायपालिका समाज की कमजोर इकाइयों के लिए संवेदनशील है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश भेजा — कानून में वर्गभेद नहीं होना चाहिए। सड़क जैसे सार्वजनिक संसाधन को निजी अधिकार समझना लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
Author: THE CG NEWS
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