भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी पर होगा हरछठ व्रत, इस वर्ष 14 अगस्त को मनाया जाएगा हलषष्ठी

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भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को हरछठ व्रत यानी हलषष्ठी का पर्व आस्था और परंपरा के साथ मनाया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए किया जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन महिलाएं संतान की कुशलता और घर-परिवार की सुख-शांति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं और माता शष्ठी की पूजा करती हैं। इस वर्ष यह पावन पर्व 14 अगस्त, बुधवार को मनाया जाएगा।

तिथि और शुभ मुहूर्त

पंचांग के अनुसार इस साल भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि 14 अगस्त को मनाई जाएगी। षष्ठी तिथि का प्रारंभ 14 अगस्त की सुबह 4 बजकर 23 मिनट पर होगा और इसका समापन 15 अगस्त की सुबह 4 बजकर 57 मिनट पर होगा। चूंकि उदया तिथि 14 अगस्त को पड़ रही है, इसलिए इसी दिन हरछठ व्रत और पूजन किए जाएंगे। इस दिन सुबह स्नान-ध्यान के बाद महिलाएं निर्जल रहकर माता शष्ठी का पूजन करती हैं और पारंपरिक रूप से बनाए जाने वाले प्रसाद का भोग लगाती हैं।

व्रत का महत्व और धार्मिक मान्यता

हरछठ या हलषष्ठी व्रत का विशेष महत्व है, खासकर ग्रामीण अंचलों में इसका आयोजन बड़े उत्साह से किया जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से संतान निरोगी और दीर्घायु होती है। यह पर्व विशेष रूप से मातृत्व और संतान सुख से जुड़ा हुआ है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि षष्ठी देवी को बच्चों की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है और वे हर प्रकार की विघ्न-बाधा से बालकों की रक्षा करती हैं। इस दिन महिलाएं हल से जोते गए खेत की चीजों का सेवन नहीं करतीं और व्रत के दौरान दूध, दही तथा फलाहार का सेवन करती हैं।

पारंपरिक रीति-रिवाज और पूजा विधि

हरछठ व्रत में महिलाएं सुबह जल्दी स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। मिट्टी से षष्ठी माता की प्रतिमा बनाई जाती है या चित्र स्थापित किया जाता है। फिर दूध, दही, चावल, फल और विशेष रूप से सात प्रकार के अनाज का उपयोग पूजा में किया जाता है। इसमें खासतौर पर भैंस के दूध और उससे बने दही का महत्व माना गया है। पूजा में महिलाएं कथा श्रवण करती हैं और संतान की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इस दिन मिट्टी के छोटे-छोटे बर्तन (कुल्हड़) में दूध-दही रखकर माता को अर्पित करने की परंपरा है।

लोक आस्था और सामाजिक महत्व

हरछठ व्रत केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। यह व्रत मातृत्व और पारिवारिक बंधन को मजबूत करने का प्रतीक है। महिलाएं अपने आस-पास की सहेलियों और पड़ोसियों के साथ मिलकर समूह में व्रत करती हैं और पूजा-अर्चना में हिस्सा लेती हैं। इस अवसर पर कई जगह भजन-कीर्तन और सामूहिक कथा वाचन का भी आयोजन होता है। ग्रामीण परिवेश में यह पर्व मेल-जोल बढ़ाने और परंपराओं को आगे बढ़ाने का माध्यम भी है।

इस प्रकार हरछठ व्रत भक्ति, आस्था और लोक परंपरा का अद्भुत संगम है, जो हर वर्ष भाद्रपद माह की षष्ठी को महिलाओं द्वारा पूरे श्रद्धा भाव से मनाया जाता है। इस साल 14 अगस्त को होने वाला यह पर्व संतान सुख और परिवार की समृद्धि के लिए विशेष शुभ अवसर लेकर आएगा।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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