
राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) में आवारा कुत्तों को शेल्टर होम में भेजने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर आज एक नई तीन सदस्यीय बेंच ने सुनवाई की। इस बेंच में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन. वी. अंजारिया शामिल हैं। यह मामला पहले दो न्यायाधीशों की बेंच के पास था, जिसने कुत्तों को सड़कों से हटाकर शेल्टर में रखने का निर्देश दिया था। हालांकि, इस आदेश पर विरोध और कानूनी बहस के बाद मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने इसे बड़ी बेंच को सौंप दिया था।
आदेश की पृष्ठभूमि
पिछले आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर की सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाकर उन्हें शेल्टर होम में भेजने का निर्देश दिया था। साथ ही यह भी कहा गया था कि शेल्टर में उनकी उचित देखभाल, नसबंदी और टीकाकरण किया जाए और उन्हें दोबारा सड़कों पर न छोड़ा जाए। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को छह से आठ सप्ताह में पूरा करने का लक्ष्य तय किया था। इसके तहत लगभग 5,000 कुत्तों के लिए शेल्टर तैयार करने की बात कही गई थी।
इस आदेश के दौरान कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि कोई भी संगठन, संस्था या व्यक्ति इस प्रक्रिया में बाधा डाले तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि भावनात्मक हस्तक्षेप के बजाय व्यावहारिक समाधान पर जोर दिया जाना चाहिए, क्योंकि यह केवल ‘वर्चु सिग्नलिंग’ बनकर रह जाता है।
विरोध और विवाद
इस आदेश के बाद कई पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि कुत्तों को उनके प्राकृतिक वातावरण से हटाकर शेल्टर में रखना अमानवीय है और इससे उनकी सेहत व जीवन पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। विरोधियों का तर्क था कि भारत में पहले से मौजूद ‘एनिमल बर्थ कंट्रोल’ (एबीसी) नियमों के तहत कुत्तों की नसबंदी और टीकाकरण के बाद उन्हें वापस उनके क्षेत्र में छोड़ा जाना चाहिए।
कई कार्यकर्ताओं ने यह भी कहा कि इतने बड़े पैमाने पर शेल्टर की व्यवस्था करना न तो आर्थिक रूप से संभव है और न ही यह लंबे समय तक टिकाऊ समाधान है। उनका मानना है कि अचानक से सभी कुत्तों को हटाना पर्यावरण और पारिस्थितिकी पर भी असर डालेगा।
आज की सुनवाई में मुख्य बिंदु
नई तीन सदस्यीय बेंच ने आज मामले की गहन सुनवाई की और सभी पक्षों की दलीलें सुनीं। बेंच ने स्पष्ट किया कि यह एक संवेदनशील मुद्दा है जिसमें सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। अदालत ने संकेत दिया कि वह आदेश की व्यवहारिकता, कानूनी स्थिति और इसके लागू करने में आने वाली चुनौतियों का पुनर्मूल्यांकन करेगी।
सुनवाई के दौरान अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि समाधान ऐसा होना चाहिए जिससे न केवल आम जनता को सुरक्षा मिले बल्कि पशुओं के जीवन और अधिकारों की भी रक्षा हो। कोर्ट ने यह भी माना कि आदेश को लागू करने में स्थानीय निकायों की भूमिका अहम है और उनके संसाधनों की क्षमता का आकलन जरूरी है।
आगे की प्रक्रिया
अगली सुनवाई में यह तय किया जाएगा कि पिछला आदेश बरकरार रहेगा, उसमें संशोधन किया जाएगा या फिर पूरी तरह से नई रणनीति बनाई जाएगी। कोर्ट इस दिशा में भी विचार कर सकती है कि क्या आवारा कुत्तों की संख्या नियंत्रण के लिए मौजूदा एबीसी नियमों को सख्ती से लागू करना पर्याप्त होगा या फिर नई नीति की जरूरत है।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला इस पर दूरगामी असर डालेगा, क्योंकि यह न केवल दिल्ली-एनसीआर बल्कि पूरे देश में आवारा कुत्तों से जुड़ी नीतियों और कार्यप्रणाली को प्रभावित कर सकता है।
संवेदनशील संतुलन की चुनौती
यह मामला ऐसे समय में आया है जब देशभर में आवारा कुत्तों के हमलों की घटनाएं चर्चा में हैं। कई जगहों पर बच्चों और बुजुर्गों पर कुत्तों के हमले के मामले सामने आए हैं, जिससे जनसुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ी है। वहीं, पशु अधिकार कार्यकर्ता इस बात पर जोर देते हैं कि आवारा कुत्तों को भी जीने का अधिकार है और उनके प्रति मानवीय दृष्टिकोण बनाए रखना जरूरी है।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह सार्वजनिक सुरक्षा और पशु कल्याण के बीच एक ऐसा संतुलन स्थापित करे जो लंबे समय तक कारगर रहे।
Author: THE CG NEWS
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