आज हरतालिका तीज: सुहागिन महिलाओं ने रखा निर्जला व्रत, शिव-पार्वती संग के स्मरण में उमड़ा आस्था का सागर

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सावन-भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला हरतालिका तीज आज देशभर में श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाओं ने सुबह से ही निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना शुरू कर दी। इस व्रत को अखंड सौभाग्य और पति की लंबी आयु का प्रतीक माना जाता है।

हरतालिका तीज का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन मां पार्वती ने कठोर तपस्या कर भगवान शिव को अपने पति के रूप में प्राप्त किया था। तभी से यह व्रत स्त्रियों के लिए परम मंगलकारी माना जाता है। महिलाएँ आज दिनभर भोजन और जल त्यागकर निर्जला उपवास करती हैं और रातभर जागरण कर शिव-पार्वती के विवाह की कथा का श्रवण करती हैं। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत से विवाह जीवन में प्रेम, सुख और समृद्धि बनी रहती है।

मायके जाने की परंपरा

हरतालिका तीज का एक विशेष सांस्कृतिक पहलू यह भी है कि इस दिन विवाहित महिलाएँ अपने मायके जाती हैं। मायके में उनका स्वागत उल्लास और स्नेह के साथ होता है। माता-पिता और भाई इस अवसर पर अपनी बेटियों-बहनों को ‘तीज का सिन्दारा’ देते हैं, जिसमें नए वस्त्र, श्रृंगार की वस्तुएँ, मिठाइयाँ और उपहार शामिल होते हैं। यह परंपरा रिश्तों की गर्माहट और बेटी-बहनों के महत्व को रेखांकित करती है।

पूजा-विधि और धार्मिक आयोजन

सुबह स्नान-ध्यान कर महिलाएँ सोलह श्रृंगार करती हैं और हरे वस्त्र धारण करती हैं। फिर मिट्टी या बालू से भगवान शिव, मां पार्वती और भगवान गणेश की प्रतिमा बनाकर पूजा की जाती है। रातभर जागरण और शिव-पार्वती के विवाह की कथा सुनने का विशेष महत्व है। मंदिरों में भी आज विशेष आयोजन किए गए हैं, जहां श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी हुई है।

लोक परंपराएँ और उत्सव का माहौल

ग्रामीण इलाकों में तीज के मौके पर महिलाओं के लिए झूले लगाए जाते हैं और वे पारंपरिक लोकगीत गाती हैं। शहरी क्षेत्रों में महिलाएँ सामूहिक रूप से व्रत रखती हैं और कथा-सत्संग में हिस्सा लेती हैं। हाथों में रची मेहंदी, रंग-बिरंगी चूड़ियाँ और पारंपरिक आभूषण इस दिन का विशेष आकर्षण बनते हैं। बाज़ारों में भी तीज से जुड़ी सजावटी और धार्मिक वस्तुओं की रौनक है।

स्वादिष्ट व्यंजनों की परंपरा

हरतालिका तीज पर घरों में विशेष व्यंजन बनाए जाते हैं। घेवर, गुजिया, सेवईं और हलवा-पूरी जैसे पकवान इस पर्व की शान होते हैं। उपवास के बावजूद कई महिलाएँ व्रत समाप्ति के बाद परिवार के साथ इन व्यंजनों का आनंद लेती हैं। मायके और ससुराल दोनों जगह मिठाइयाँ और पकवान बांटे जाते हैं, जिससे त्योहार का उत्साह और बढ़ जाता है।

बदलते समय में तीज का स्वरूप

यद्यपि समय के साथ परंपराओं में बदलाव आया है, लेकिन हरतालिका तीज का महत्व आज भी उतना ही गहरा है। अब सोशल मीडिया पर भी महिलाएँ अपनी मेहंदी, श्रृंगार और पूजा की झलक साझा करती हैं। कई शहरों में तीज मेले और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जहां इस पर्व की परंपराओं को जीवित रखा जाता है।

निष्कर्ष

हरतालिका तीज केवल व्रत और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि यह भारतीय संस्कृति की उस जीवनदायिनी परंपरा का प्रतीक है जिसमें पारिवारिक रिश्तों की मिठास, आस्था का गहन भाव और प्रकृति की सुंदरता सब शामिल हैं। यह पर्व महिलाओं को मायके से जोड़कर रिश्तों को मजबूत बनाता है और समाज को यह संदेश देता है कि प्रेम, आस्था और संस्कार से ही जीवन की डोर मजबूत रहती है।

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Author: THE CG NEWS

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