
देश की सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को एक अहम फैसला सुनाते हुए रिलायंस फाउंडेशन द्वारा संचालित जामनगर स्थित Vantara Wildlife Rescue and Rehabilitation Centre को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि वंतारा ने जानवरों की खरीद-फरोख्त और हस्तांतरण में Wildlife Protection Act 1972, Zoo Rules और अंतरराष्ट्रीय संधि CITES के तहत आवश्यक सभी कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया है।
अदालत में उठे आरोप और जांच
पिछले कुछ महीनों से वंतारा पर कई गंभीर आरोप लगाए गए थे। विभिन्न एनजीओ और पशु अधिकार संगठनों ने अदालत में याचिका दाखिल कर दावा किया था कि केंद्र में जानवरों की अवैध खरीद-फरोख्त हो रही है, अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन किया जा रहा है और पशु कल्याण मानकों की अनदेखी की जा रही है।
इन आरोपों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया। इस दल को यह परखने का जिम्मा दिया गया कि जानवरों की खरीद, शिफ्टिंग, प्रजनन और देखभाल किस हद तक कानून के अनुरूप की गई है। जांच दल ने देश-विदेश से आए जानवरों के सभी दस्तावेज, परमिट और परिवहन प्रक्रियाओं का बारीकी से अध्ययन किया।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
न्यायमूर्ति पंकज मित्तल और न्यायमूर्ति पी. बी. वरले की खंडपीठ ने SIT की रिपोर्ट को स्वीकार करते हुए कहा कि आरोपों का कोई ठोस आधार नहीं है। अदालत ने माना कि वंतारा ने सभी कानूनी मानदंडों और प्रक्रियाओं का पालन किया है और आरोप महज संदेह या अधूरी जानकारी पर आधारित थे।
कोर्ट ने यह भी साफ किया कि इसी मुद्दे पर बार-बार याचिकाएं दाखिल कर न्यायिक प्रक्रिया को बाधित नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट का पूरा विवरण सार्वजनिक नहीं किया जाएगा, लेकिन अदालत के आदेश का हिस्सा रहेगा।
हाथिनी माध्युरी का मामला
इस विवाद का सबसे संवेदनशील पहलू महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित नंदनी जैन मठ से हाथिनी माध्युरी का वंतारा में स्थानांतरण था। यह हाथिनी 32 वर्षों से मठ में थी और उसे धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
मठ ने दावा किया था कि हाथिनी को जबरन ले जाया गया है और यह धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ है। दूसरी ओर जांच में यह तथ्य सामने आया कि हाथिनी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रही थी — गठिया, पैरों की चोट और भारी वजन उठाने की वजह से उसे तकलीफ़ थी। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि बेहतर उपचार और देखभाल के लिए उसका स्थानांतरण कानूनी और न्यायसंगत है।
वंतारा का पक्ष
वंतारा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने अदालत में कहा कि केंद्र पूरी पारदर्शिता और मानक प्रक्रियाओं का पालन करता है। यहां केवल संरक्षण, देखभाल और पुनर्वास का काम होता है, न कि व्यावसायिक लाभ कमाने का। उन्होंने यह भी बताया कि वंतारा में आधुनिक पशु चिकित्सक सुविधाएं, प्राकृतिक वातावरण और अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप देखभाल उपलब्ध है।
फैसले का महत्व
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के कई मायने हैं:
•यह स्पष्ट संदेश है कि जानवरों का अधिग्रहण और हस्तांतरण तभी वैध है जब सभी कानूनी प्रावधानों का पालन हो।
•धार्मिक संस्थाओं की भावनाओं का सम्मान करते हुए भी अदालत ने यह दोहराया कि पशु कल्याण सर्वोपरि है।
•सोशल मीडिया और मीडिया में फैले आरोपों की पुष्टि के लिए अदालत ने कहा कि केवल ठोस सबूत ही मान्य होंगे।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद वंतारा पर लगे अवैधता और पशु कल्याण उल्लंघन के आरोप अब खारिज हो चुके हैं। अदालत ने साफ किया है कि जानवरों की खरीद-फरोख्त और शिफ्टिंग कानूनी प्रक्रिया के तहत ही की गई थी।
जैन मठ से हाथिनी माध्युरी के स्थानांतरण पर उठे विवाद को भी अदालत ने शांत करते हुए कहा है कि यह कदम उसकी बेहतर देखभाल और स्वास्थ्य सुधार के लिए उठाया गया था।
यह फैसला न केवल वंतारा के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि यह भी साबित करता है कि देश में पशु संरक्षण और धार्मिक आस्थाओं के बीच संतुलन बनाए रखना न्यायपालिका की प्राथमिकता है।
Author: THE CG NEWS
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