
देश में ऑनलाइन खरीदारी के बढ़ते चलन के बीच, कई ई-कॉमर्स कंपनियों पर अब उपभोक्ताओं से “कैश ऑन डिलीवरी” (COD) के विकल्प पर छुपे हुए अतिरिक्त शुल्क वसूलने के आरोप लगे हैं। सरकार ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच शुरू कर दी है। उपभोक्ता मामलों के मंत्री प्रल्हाद जोशी ने कहा है कि यदि यह आरोप सही पाए गए, तो इन कंपनियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
कैसे हो रही है ग्राहकों से ठगी
हाल के महीनों में उपभोक्ताओं ने सोशल मीडिया और शिकायत मंचों पर बड़ी संख्या में शिकायतें दर्ज की हैं कि ई-कॉमर्स साइट्स पर जब वे COD का विकल्प चुनते हैं, तो ऑर्डर के अंतिम चरण में ‘ऑफर हैंडलिंग फीस’, ‘पेमेंट हैंडलिंग फी’ या ‘प्रॉमिस प्रोटेक्शन चार्ज’ जैसे नामों से अतिरिक्त रकम जोड़ दी जाती है। ये चार्ज बिलिंग पेज पर शुरुआत में नहीं दिखते, बल्कि फाइनल स्टेज पर ऑर्डर कन्फर्म करते समय अचानक जुड़ जाते हैं।
कई ग्राहकों ने बताया कि यह शुल्क ₹20 से लेकर ₹250 तक का हो सकता है, और इसे समझना मुश्किल होता है कि यह राशि किस सेवा के लिए ली जा रही है। इससे उपभोक्ता भ्रमित हो जाते हैं और उन्हें बिना समझे-समझे ऑर्डर पूरा करना पड़ता है।
सरकार ने जताई नाराजगी
उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने स्पष्ट कहा है कि इस तरह का व्यवहार उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है। मंत्री प्रल्हाद जोशी ने बयान जारी कर कहा कि, “ई-कॉमर्स कंपनियों को पारदर्शिता बरतनी चाहिए। अगर कोई शुल्क लिया जा रहा है तो उसे पहले से स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए। किसी भी रूप में छुपी हुई फीस या भ्रामक शुल्क स्वीकार्य नहीं हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि मंत्रालय ने एक विशेष टीम गठित की है जो यह जांच करेगी कि कौन-सी कंपनियां COD पर अतिरिक्त शुल्क वसूल रही हैं। यदि किसी भी कंपनी के खिलाफ साक्ष्य मिले, तो उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत उस पर जुर्माना और दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
‘डार्क पैटर्न’ का खेल
विशेषज्ञों के अनुसार, यह पूरा मामला “डार्क पैटर्न” नामक मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा है। यह वह तकनीक है जिसके जरिए वेबसाइट या ऐप उपभोक्ताओं को अनजाने में किसी अनचाही खरीद या भुगतान के लिए प्रेरित करते हैं।
डिजिटल नीति विशेषज्ञों का कहना है कि भारत सरकार पहले ही डार्क पैटर्न्स के खिलाफ दिशा-निर्देश जारी कर चुकी है, जिसमें कहा गया है कि कंपनियों को ग्राहकों को किसी सेवा या शुल्क के लिए भ्रमित नहीं करना चाहिए। ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा COD शुल्क छिपाना इन्हीं नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है।
उपभोक्ताओं की परेशानी बढ़ी
त्योहारों के मौसम में जब ऑनलाइन शॉपिंग बढ़ जाती है, ऐसे में ये छुपे शुल्क उपभोक्ताओं के लिए अतिरिक्त बोझ साबित हो रहे हैं। कई बार लोग छूट के लालच में या जल्दबाजी में यह नहीं देख पाते कि अंतिम बिल में कौन-कौन से शुल्क जोड़े गए हैं। परिणामस्वरूप, उन्हें उत्पाद की वास्तविक कीमत से अधिक भुगतान करना पड़ता है।
उपभोक्ता संगठनों का कहना है कि इस तरह की प्रथाएँ ई-कॉमर्स सेक्टर के प्रति उपभोक्ताओं के भरोसे को कमजोर करती हैं। भारतीय उपभोक्ता महासंघ ने इसे “गंभीर वित्तीय शोषण” बताया है और कहा है कि सरकार को दोषी कंपनियों पर कड़ी सज़ा देनी चाहिए।
कंपनियों की सफाई
कुछ प्रमुख ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों ने सफाई देते हुए कहा है कि ये शुल्क “लॉजिस्टिक कॉस्ट” और “सुरक्षित डिलीवरी प्रोसेस” का हिस्सा हैं। कंपनियों का दावा है कि यह राशि ऑर्डर ट्रांजैक्शन के लिए पेमेंट पार्टनर्स को दी जाती है और इसे उपभोक्ता से पारदर्शी तरीके से लिया जाता है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अगर ऐसा है तो उपभोक्ता को यह जानकारी शुरुआत में ही दी जानी चाहिए, न कि ऑर्डर के फाइनल पेज पर।
क्या होगी आगे की कार्रवाई
सरकार ने संकेत दिए हैं कि यदि जांच में आरोप साबित हुए तो ऐसी कंपनियों के खिलाफ न केवल आर्थिक दंड लगाया जाएगा बल्कि उनके लाइसेंस और संचालन पर भी रोक लगाई जा सकती है। इसके अलावा, मंत्रालय “ई-कॉमर्स पारदर्शिता अधिनियम” में संशोधन पर विचार कर रहा है ताकि भविष्य में कोई भी कंपनी इस तरह की छिपी फीस वसूली न कर सके।
साथ ही, उपभोक्ताओं को भी सलाह दी गई है कि वे ऑनलाइन ऑर्डर करते समय बिल का पूरा ब्रेकअप ध्यान से देखें और किसी भी संदिग्ध शुल्क की तुरंत शिकायत करें।
निष्कर्ष
ई-कॉमर्स क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा के इस दौर में पारदर्शिता ही ग्राहकों का भरोसा जीतने का सबसे बड़ा माध्यम है। सरकार की यह जांच न केवल उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करेगी बल्कि पूरे ऑनलाइन मार्केट के लिए भी एक चेतावनी साबित होगी। आने वाले समय में इस केस का नतीजा यह तय करेगा कि डिजिटल इंडिया के युग में उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा कितनी मजबूती से की जा सकेगी।
Author: THE CG NEWS
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