
भारत में अदालतों में गवाही देने से पहले अक्सर लोगों को भगवद्गीता की कसम खिलाई जाती है। यही प्रचलन अंग्रेज़ी शासन के समय से अब तक चला आ रहा है। लेकिन कई लोगों के मन में वर्षों से एक सवाल है—आखिर कोर्ट में गीता की कसम ही क्यों, रामायण की क्यों नहीं?
क्या यह केवल परंपरा है या इसके पीछे कोई कानूनी और ऐतिहासिक कारण भी है? विशेषज्ञों के अनुसार, इसका जवाब धार्मिक मान्यताओं, ऐतिहासिक घटनाओं और ब्रिटिश न्याय व्यवस्था की बारीकियों में छिपा हुआ है।
अदालत में ‘कसम’ की परंपरा कैसे शुरू हुई?
ब्रिटिश शासन के दौरान जब अंग्रेज़ों ने भारत में आधुनिक अदालतें और कानून व्यवस्था बनाई, तो उन्होंने अपने देश की ‘होलि बाइबल पर शपथ’ की पद्धति का भारतीय संस्करण तैयार किया।
उस समय अंग्रेज़ प्रशासन ने धार्मिक ग्रंथों के आधार पर यह व्यवस्था बनाई कि हिन्दू गवाह अपनी पवित्र पुस्तक पर शपथ लेकर सच बोलने का वचन दें।
इस दौरान कई धार्मिक ग्रंथों पर विचार हुआ, लेकिन भगवद्गीता को सबसे उपयुक्त और सर्वमान्य ग्रंथ माना गया।
कारण ये था कि गीता को संपूर्ण हिंदू धर्म का दार्शनिक आधार माना जाता है, जिसमें सत्य और धर्म के पालन का सिद्धांत अत्यंत स्पष्ट है।
कानूनी इतिहासकार बताते हैं कि 19वीं सदी में मद्रास और बंबई उच्च न्यायालयों ने भी गीता को ‘हिंदू सत्य प्रतिज्ञा’ का आदर्श ग्रंथ माना। इसके बाद यह पूरे देश की अदालतों में लागू हो गया।
तो क्या रामायण कोर्ट में उपयोग नहीं की जा सकती?
इसका जवाब है—
कानून रामायण पर शपथ लेने से नहीं रोकता, लेकिन व्यवहार में गीता को ही चुना गया है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि रामायण, विशेषकर वाल्मीकि रामायण, धार्मिक ग्रंथ होने के बावजूद कथा-आधारित महाकाव्य है।
कानूनी रूप से शपथ का उद्देश्य है—
“व्यक्ति को सच बोलने के लिए मानसिक और धार्मिक रूप से बांधना।”
गीता का हर अध्याय सत्य, कर्तव्य, न्याय और धर्मपालन पर आधारित है।
इसका अध्यात्मिक संदेश न्यायिक प्रक्रिया के उद्देश्य के अधिक करीब माना गया।
यही कारण है कि अदालतों में रामायण नहीं, बल्कि भगवद्गीता को आधिकारिक और व्यावहारिक आधार पर चुना गया।
कसम केवल परंपरा है—जरूरी नहीं कि हर बार गीता ही हो
कई लोग यह नहीं जानते कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Indian Oaths Act, 1873) के अनुसार,
कोर्ट व्यक्ति के धर्म के अनुसार शपथ दिला सकती है।
अगर कोई व्यक्ति मुस्लिम है तो वह कुरान पर, ईसाई बाइबल पर, सिख गुरु ग्रंथ साहिब पर शपथ ले सकता है।
अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक ग्रंथ में विश्वास नहीं रखता, तो वह बिना किसी पुस्तक के भी सिर्फ “सच बोलने की शपथ” लेकर गवाही दे सकता है।
इसलिए गीता कोई अनिवार्य नियम नहीं बल्कि एक परंपरागत विकल्प है।
कानूनी विशेषज्ञ कहते हैं—
“अदालत में शपथ का मकसद किसी धर्म को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि गवाह के मन में सत्य बोलने की जिम्मेदारी और ईमानदारी पैदा करना है।”
क्यों गीता को सबसे ‘निष्पक्ष’ और ‘सार्वभौमिक’ माना जाता है?
धर्म विशेषज्ञ बताते हैं कि गीता किसी एक वर्ग, जाति या संप्रदाय की पुस्तक नहीं है।
यह संपूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शन मानी जाती है।
इसके संदेश—
•सत्य,
•कर्तव्य,
•न्याय,
•कर्म,
•और धर्म—
को सार्वभौमिक मान्यताओं के रूप में स्वीकार किया गया है।
गीता ऐसी प्रथम पुस्तक है जिसे हिंदू समाज का अधिकांश हिस्सा पवित्र मानता है और इसके संदेश न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांतों से मेल खाते हैं।
आधुनिक अदालतों में क्या ये परंपरा बदल रही है?
बदलते समय के साथ नए नियम भी सामने आए हैं।
आज कई अदालतों में शपथ दिलाने के लिए धार्मिक ग्रंथ का उपयोग कम हो गया है।
इसके स्थान पर अधिकतर जगह लोगों से सीधे “मैं सच बोलूंगा” का शपथ बयान कराया जाता है।
डिजिटल कोर्ट और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के बढ़ते उपयोग के बाद धार्मिक ग्रंथों की जरूरत और भी कम होती जा रही है।
हालांकि ग्रामीण इलाकों और पारंपरिक अदालतों में अभी भी गीता की कसम देने की परंपरा जारी है।
निष्कर्ष: गीता की कसम परंपरा है, नियम नहीं
अदालत में गीता की कसम दिलाए जाने के पीछे स्पष्ट कानूनी, धार्मिक और ऐतिहासिक आधार हैं।
रामायण की जगह गीता को चुनने का कारण यह है कि वह न्याय और सत्य के सिद्धांतों पर सबसे अधिक केंद्रित है।
लेकिन कानून किसी को रामायण या किसी अन्य धार्मिक ग्रंथ से रोकता नहीं।
आज यह सिर्फ परंपरा है, न कि बाध्यकारी नियम।
इसलिए जब अगली बार आप यह सवाल सुनें कि “गीता की कसम ही क्यों?”—
तो जान लें कि इसका आधार केवल धर्म नहीं, बल्कि न्याय व्यवस्था की सैकड़ों साल पुरानी सोच और विश्वास है।
Author: THE CG NEWS
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