
देशभर में ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। हाल ही में लखनऊ का वह मामला सामने आया जिसमें गेमिंग की लत और स्कैम के चलते एक छात्र ने अपने पिता के अकाउंट से 14 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिए। ठगे जाने के सदमे में उसने आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठा लिया। जांच में पता चला कि ठगों ने गेमिंग आईडी अपग्रेड करने और बड़े रिवॉर्ड देने का लालच देकर पैसे ऐंठे थे।
यही नहीं, पिछले महीने ‘साइबर अवेयरनेस मंथन 2025’ कार्यक्रम में अभिनेता अक्षय कुमार ने भी अपनी बेटी से जुड़े एक साइबर अपराध का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि ऑनलाइन गेम खेलते समय एक अनजान लड़के ने उनकी बेटी से न्यूड तस्वीरें मांग लीं। बेटी ने तुरंत इस बारे में अपनी मां ट्विंकल खन्ना को बताया। यह मामला बताता है कि ऑनलाइन गेमिंग अब केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि गंभीर साइबर जोखिम का बड़ा जरिया बन चुका है।
ऑनलाइन गेमिंग में सबसे ज्यादा टीनएजर्स और युवा सक्रिय हैं। साइबर ठग इसी कमजोरी का फायदा उठाकर उन्हें अपना निशाना बनाते हैं। इस सप्ताह के ‘साइबर लिटरेसी’ कॉलम में जानते हैं कि गेमिंग स्कैम कैसे होते हैं, इसमें युवा ही सबसे ज्यादा क्यों फंसते हैं और इससे बचने का तरीका क्या है। इसमें उत्तर प्रदेश पुलिस के साइबर सिक्योरिटी एडवाइजर राहुल मिश्रा का विशेषज्ञ विश्लेषण शामिल है।
ऑनलाइन गेमिंग में साइबर ठगी कैसे हो रही है?
विशेषज्ञों के अनुसार ठग खुद को गेम का ‘प्रो प्लेयर’, ‘आईडी सेलर’ या ‘अपग्रेडर’ बताकर बच्चों से संपर्क करते हैं। वे गेम चैट, सोशल मीडिया या फर्जी ऐप्स के जरिए ऑफर देते हैं कि वे गेमिंग आईडी अपग्रेड कर देंगे, नए हथियार देंगे, अनलिमिटेड कॉइन्स देंगे या लेवल बढ़ा देंगे।
टीनएजर्स इन पर भरोसा कर लेते हैं और पैसे ट्रांसफर कर देते हैं। बदले में उन्हें फेक कोड, फर्जी आईडी या बंद ऐप्स मिलते हैं। कई ठग चैट करेंगे और धीरे-धीरे दोस्ती बढ़ाकर टीनएजर्स की गेमिंग आईडी का पासवर्ड ले लेते हैं और फिर अकाउंट हैक कर लेते हैं।
भारत में गेमिंग स्कैम इतने तेजी से क्यों बढ़ रहे हैं?
भारत में गेमिंग ऐप्स की आसान उपलब्धता और डिजिटल पेमेंट की सुविधा ने ठगों को ज्यादा मौके दिए हैं। लखनऊ के छात्र की तरह कई युवा लगातार हारने पर गेम को अपग्रेड करने के लिए पैसा खर्च करते हैं। ठग फिशिंग लिंक भेजते हैं, जिनके जरिए वे बच्चों का मोबाइल डेटा, बैंक डिटेल्स और पासवर्ड तक चुरा लेते हैं।
डिजिटल पेमेंट का दुरुपयोग करके छोटे-छोटे ट्रांजैक्शन में बच्चों से लाखों रुपये निकलवा लेते हैं। देशभर में ऐसे हजारों मामले हर महीने दर्ज होते हैं।
टीनएजर्स ही सबसे ज्यादा क्यों फंसते हैं?
विशेषज्ञों का कहना है कि टीनएजर्स की मनोवैज्ञानिक कमजोरी ठगों का सबसे बड़ा हथियार होती है। इस उम्र में उत्साह, जीतने की चाह, दोस्तों से आगे निकलने की होड़ और आत्मविश्वास कम या अधिक होना सब ठगों के लिए आसान लक्ष्य बनाता है।
कई बच्चे पढ़ाई के दबाव, अकेलेपन या तनाव के कारण गेमिंग में ज्यादा समय बिताते हैं। ऐसे में ठग आसानी से उन्हें दोस्त बनकर जोड़ लेते हैं, उनकी आदतों को समझते हैं और फिर धीरे-धीरे जाल में फंसा लेते हैं।
आंकड़ों के अनुसार, ऑनलाइन गेमिंग से जुड़े 70% से अधिक साइबर क्राइम के शिकार 18–25 वर्ष के युवा हैं।
गेमिंग आईडी अपग्रेड या बेचने के नाम पर कैसे होता है धोखा?
ठग पहले गेम में बच्चे से दोस्ती करते हैं और फिर बताते हैं कि उनकी आईडी ‘टॉप लेवल’ की है। वे उसे सस्ते में बेचने या आईडी अपग्रेड करने का लालच देते हैं। बच्चा पैसे भेजता है लेकिन न आईडी मिलती है, न अपग्रेड।
कई बार वे बच्चे की असली आईडी का पासवर्ड लेकर ही उसका अकाउंट हड़प लेते हैं। इसके बाद वे ब्लैकमेल भी करते हैं कि अगर पैसे नहीं दिए तो आईडी डिलीट कर देंगे।
ठग डिजिटल पेमेंट का कैसे दुरुपयोग करते हैं?
ठग UPI, वॉलेट और बैंक ऐप्स का इस्तेमाल कर बच्चों से पैसे निकलवाते हैं। वे फर्जी पेमेंट लिंक भेजते हैं, जो दिखते तो असली जैसे हैं लेकिन पैसे सीधे ठगों के अकाउंट में जाते हैं।
कुछ फिशिंग ऐप्स मोबाइल में घुसकर बैंक डिटेल्स कैप्चर कर लेते हैं। ठग कई अकाउंट्स का इस्तेमाल करते हैं ताकि पुलिस उन्हें आसानी से ट्रेस न कर सके।
पेरेंट्स कैसे समझें कि उनका बच्चा ऑनलाइन स्कैम में फंस रहा है?
अगर बच्चा:
– लगातार मोबाइल पर समय बिता रहा है,
– देर रात जाग रहा है,
– पॉकेट मनी ज्यादा मांग रहा है,
– गुस्सा करने लगा है,
– बैंक स्टेटमेंट में अनजान ट्रांजैक्शन दिख रहे हैं,
तो पेरेंट्स को सतर्क हो जाना चाहिए।
ऐसे संकेत बताते हैं कि बच्चा गेमिंग के जाल में गहरे उतर चुका है।
बच्चों को जागरुक कैसे करें?
साइबर लिटरेसी यानी डिजिटल समझ बेहद जरूरी है। बच्चों को सिखाएं कि अनजान लोगों से बातचीत न करें, किसी लिंक पर क्लिक न करें और कभी OTP या PIN न बताएं।
पेरेंट्स कंट्रोल ऐप्स से गेम टाइम सीमित करें। बैंक अकाउंट पर लिमिट सेट करें। बच्चों को समझाएं कि हार-जीत गेम का हिस्सा है पर जिंदगी उससे कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है।
अगर कोई गेमिंग स्कैम हो जाए तो क्या करें?
सबसे पहले बैंक को कॉल कर ट्रांजैक्शन ब्लॉक करवाएं।
सभी चैट, कॉल रिकॉर्ड और स्क्रीनशॉट सबूत के रूप में सुरक्षित रखें।
1930 साइबर हेल्पलाइन पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।
जल्दी रिपोर्ट करने पर पैसे वापस मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
भारत में साइबर अपराध का दायरा तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में बच्चों और युवाओं को डिजिटल दुनिया की समझ देना अब पेरेंट्स की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बन गई है।
Author: THE CG NEWS
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