
सुप्रीम कोर्ट ने हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई करते हुए राजनीतिक दलों और उच्च संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को कड़ी नसीहत दी है। शीर्ष अदालत ने कहा कि नेताओं को भाषण देने से पहले अपने विचारों को सुधारने की जरूरत है, क्योंकि भाषण से पहले विचार आते हैं। अदालत ने स्पष्ट किया कि देश में भाईचारा, संवैधानिक नैतिकता और आपसी सम्मान को बढ़ावा देना सभी जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी है।
मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश Surya Kant, जस्टिस B. V. Nagarathna और जस्टिस Joymalya Bagchi की पीठ ने की। सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि नफरत भरे भाषणों पर अंकुश लगाने के लिए सबसे पहले सोच में बदलाव जरूरी है। अदालत ने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे संवैधानिक मूल्यों और नैतिकता का पालन करें।
संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप आचरण जरूरी
मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह स्वीकार्य है कि राजनीतिक दल वैचारिक सिद्धांतों के आधार पर चुनाव लड़ते हैं और अपने-अपने विचार प्रस्तुत करते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे आपसी सम्मान को भुला दें। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, परंतु वह गरिमा और मर्यादा के दायरे में रहनी चाहिए। अदालत ने जोर देकर कहा कि देश में सामाजिक सौहार्द और भाईचारा बनाए रखना नेताओं की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
पीठ ने यह भी कहा कि जनता अपने नेताओं से आदर्श व्यवहार की अपेक्षा करती है। यदि उच्च पदों पर बैठे लोग ही उग्र और विभाजनकारी भाषा का उपयोग करेंगे तो समाज में गलत संदेश जाएगा। इसलिए सार्वजनिक जीवन में शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए।
असम के मुख्यमंत्री के भाषणों पर दायर याचिका
सुप्रीम कोर्ट नौ याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें असम के मुख्यमंत्री Himanta Biswa Sarma के हालिया भाषणों और भारतीय जनता पार्टी की असम इकाई द्वारा जारी एक वीडियो पर आपत्ति जताई गई थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि वीडियो में एक विशेष समुदाय को निशाना बनाया गया और इससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मांग की थी कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के लिए नफरत फैलाने वाले भाषणों पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोका जा सके। उनका तर्क था कि उच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों के बयान का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है।
अदालत ने याचिका पर जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौजूदा याचिका के दायरे पर आपत्ति जताई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि यह याचिका मुख्य रूप से एक व्यक्ति को केंद्र में रखकर दायर की गई है। अदालत ने सुझाव दिया कि यदि हेट स्पीच पर व्यापक दिशा-निर्देश की मांग की जा रही है, तो याचिका में सभी राजनीतिक दलों और सार्वजनिक पदों पर बैठे व्यक्तियों को शामिल किया जाना चाहिए।
पीठ ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे वर्तमान याचिका वापस लेकर एक नई और व्यापक याचिका दायर करें, जिसमें सभी दलों और नेताओं का उल्लेख हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह मुद्दे की गंभीरता को समझती है और याचिकाकर्ताओं की मंशा का सम्मान करती है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया में संतुलन और व्यापक दृष्टिकोण आवश्यक है।
हेट स्पीच पर सख्त रुख
सुप्रीम कोर्ट पहले भी हेट स्पीच के मामलों में चिंता जता चुका है। अदालत ने कई मौकों पर कहा है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संविधान द्वारा प्रदत्त अधिकार है, लेकिन यह पूर्णतः निरंकुश नहीं है। यदि किसी बयान से सामाजिक सद्भाव और कानून-व्यवस्था प्रभावित होती है, तो उस पर कार्रवाई की जा सकती है।
मंगलवार की सुनवाई में भी पीठ ने दोहराया कि लोकतंत्र में बहस और मतभेद की जगह है, परंतु नफरत और विभाजन की नहीं। अदालत ने सभी राजनीतिक दलों से आग्रह किया कि वे चुनावी राजनीति के बावजूद एक-दूसरे के प्रति सम्मान बनाए रखें और संविधान की भावना के अनुरूप आचरण करें।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश में चुनावी माहौल और राजनीतिक बयानबाजी तेज है। अदालत की नसीहत को राजनीतिक विमर्श में शालीनता और संवैधानिक मर्यादा बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
Author: THE CG NEWS
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