दुर्ग में बाल सुरक्षा पर रेंज स्तरीय कार्यशाला आयोजित: POCSO और किशोर न्याय अधिनियम पर व्यवहारिक प्रशिक्षण, संवेदनशील पुलिसिंग पर जोर

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दुर्ग में बच्चों की सुरक्षा और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के उद्देश्य से 19 फरवरी को रेंज स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम भिलाई के सिविक सेंटर स्थित सीए बिल्डिंग में आयोजित हुआ, जिसमें बाल कल्याण पुलिस अधिकारियों को किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम (POCSO Act) के प्रावधानों पर विस्तृत एवं व्यवहारिक प्रशिक्षण दिया गया।

इस कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य पुलिस अधिकारियों में संवेदनशील, जवाबदेह और चाइल्ड-फ्रेंडली पुलिसिंग की समझ विकसित करना था, ताकि बाल पीड़ितों से जुड़े मामलों में जांच और कार्रवाई कानूनी प्रावधानों के अनुरूप तथा मानवीय दृष्टिकोण से की जा सके। कार्यक्रम में अधिकारियों को यह बताया गया कि बच्चों से जुड़े अपराधों में केवल कानूनी प्रक्रिया ही नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक पहलुओं को भी ध्यान में रखना बेहद आवश्यक है।

बाल पीड़ितों के बयान और जांच प्रक्रिया पर विशेष फोकस

कार्यशाला के दौरान विशेषज्ञों ने बाल पीड़ितों के बयान दर्ज करने की प्रक्रिया, एफआईआर पंजीयन, चिकित्सीय परीक्षण, काउंसलिंग और पुनर्वास से जुड़े कानूनी प्रावधानों की विस्तार से जानकारी दी। अधिकारियों को यह समझाया गया कि बयान दर्ज करते समय वातावरण पूरी तरह सुरक्षित और भरोसेमंद होना चाहिए, ताकि बच्चा बिना भय के अपनी बात रख सके।

POCSO एक्ट के तहत अनिवार्य प्रक्रियाओं, समयसीमा और गोपनीयता के नियमों पर भी विशेष चर्चा की गई। प्रशिक्षण में यह भी स्पष्ट किया गया कि बाल पीड़ित की पहचान को सार्वजनिक करना कानूनन अपराध है और पुलिस को जांच के हर चरण में इस संवेदनशीलता का पालन करना चाहिए।

किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत बालकों के अधिकार, देखरेख और संरक्षण की जिम्मेदारी पर भी प्रकाश डाला गया। अधिकारियों को बताया गया कि कानून का उद्देश्य केवल दंड देना नहीं, बल्कि सुधार और पुनर्वास सुनिश्चित करना भी है।

केस स्टडी के जरिए समझाया गया व्यावहारिक पक्ष

कार्यक्रम में केस स्टडी के माध्यम से वास्तविक परिस्थितियों में आने वाली चुनौतियों और उनके समाधान पर चर्चा की गई। अधिकारियों ने अनुभव साझा किए और विशेषज्ञों से मार्गदर्शन प्राप्त किया। बाल कल्याण समिति (CWC) और किशोर न्याय बोर्ड (JJB) के समक्ष मामलों को प्रस्तुत करने की प्रक्रिया भी विस्तार से समझाई गई।

इस दौरान यह रेखांकित किया गया कि यदि पुलिस, प्रशासन और संबंधित संस्थाएं समन्वय के साथ कार्य करें, तो बाल संरक्षण से जुड़े मामलों में न्यायिक प्रक्रिया अधिक मजबूत और प्रभावी बन सकती है।

प्रशासन और पुलिस ने दिया समन्वय का संदेश

कार्यक्रम में जिला कलेक्टर और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष महत्व दिया। जिला कलेक्टर ने अपने संबोधन में कहा कि बच्चे देश का भविष्य हैं और उन्हें सुरक्षित वातावरण देना प्रशासन और समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रमों से विभिन्न विभागों के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होता है और इससे किशोर न्याय से जुड़े मामलों की विवेचना अधिक सुदृढ़ होती है।

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने बाल संरक्षण मामलों में संवेदनशीलता, गोपनीयता और विधिक प्रावधानों के कड़ाई से पालन को अनिवार्य बताया। उन्होंने कहा कि गुणवत्तापूर्ण जांच, समयबद्ध कार्रवाई और विभागीय समन्वय से ही पीड़ित बच्चों को त्वरित और न्यायपूर्ण सहायता मिल सकती है।

विभिन्न विभागों की सक्रिय सहभागिता

कार्यशाला में किशोर न्याय बोर्ड, रेलवे सुरक्षा बल (RPF), जीआरपी, जिला बाल संरक्षण इकाई, बाल संप्रेक्षण गृह, परिवीक्षा अधिकारी, बाल कल्याण अधिकारी, चाइल्ड हेल्पलाइन, केस वर्कर और स्कूल शिक्षा विभाग के प्रतिनिधियों ने सक्रिय भागीदारी की। सभी विभागों ने बाल सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर अपने अनुभव साझा किए और बेहतर सहयोग की प्रतिबद्धता जताई।

विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि बाल संरक्षण केवल पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक वर्ग की भूमिका महत्वपूर्ण है। स्कूलों, अभिभावकों और सामुदायिक संगठनों को भी बच्चों के अधिकारों और सुरक्षा के प्रति जागरूक रहना होगा।

इस रेंज स्तरीय कार्यशाला के माध्यम से दुर्ग पुलिस ने स्पष्ट संदेश दिया है कि बाल संरक्षण मामलों में केवल कानूनी औपचारिकताएं पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि संवेदनशील दृष्टिकोण, त्वरित कार्रवाई और संस्थागत समन्वय ही बच्चों को सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम आने वाले समय में न्यायिक प्रक्रिया को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होंगे।

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Author: THE CG NEWS

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