
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले राज्य की राजनीति मतदाता सूची के मुद्दे पर गरमा गई है। स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) के तहत जारी ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के बाद तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के बीच तीखी बयानबाजी शुरू हो गई है। राज्य की 294 विधानसभा सीटों में औसतन 19 हजार से अधिक नाम हटाए जाने का दावा किया जा रहा है, जिसे लेकर राजनीतिक माहौल चुनावी रैलियों से पहले ही गर्म हो चुका है।
सवा करोड़ नोटिस और ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ पर विवाद
निर्वाचन प्रक्रिया के तहत ड्राफ्ट सूची से 58 लाख 20 हजार 898 नाम हटाए गए हैं। इसके अलावा ‘लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी’ और ‘अनमैप्ड’ श्रेणियों को मिलाकर करीब 1.26 करोड़ नोटिस जारी किए गए हैं। यानी बड़ी संख्या में मतदाताओं को अपने दस्तावेजों और विवरण की पुष्टि के लिए लाइन में लगना पड़ रहा है। कोलकाता से मुर्शिदाबाद और बर्द्धमान तक निर्वाचन कार्यालयों में लंबी कतारें देखी जा रही हैं।
कई मामलों में नाम की स्पेलिंग या छोटे अंतर के कारण नोटिस जारी हुए हैं। जैसे ‘Ashok’ और ‘Asoke’, ‘Devi’ और ‘Debi’, ‘Ganguli’ और ‘Gangopadhyay’ जैसे उदाहरणों पर सुनवाई हो रही है। कुछ मतदाताओं का कहना है कि वे वर्षों से वोट दे रहे हैं, लेकिन इस बार मामूली विसंगतियों के कारण सूची से बाहर कर दिए गए।
टीएमसी का आरोप: भाजपा ने बंगालियों को लाइन में खड़ा किया
टीएमसी का आरोप है कि यह पूरी प्रक्रिया राजनीतिक मकसद से प्रभावित है। पार्टी प्रवक्ता कुणाल घोष का कहना है कि भाजपा ने एसआईआर के जरिए सवा करोड़ बंगालियों को अनावश्यक रूप से लाइन में खड़ा कर दिया है। उनका दावा है कि इससे राज्य में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ जो भी एंटी-इंकंबेंसी थी, वह कम हो गई है और लोग इस प्रक्रिया को ‘भाजपा आयोग’ की कार्रवाई के रूप में देख रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा इस मुद्दे को सुप्रीम कोर्ट तक ले जाने को भी टीएमसी अपनी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा मान रही है।
भाजपा का पलटवार: ‘घोस्ट वोटर्स’ हटने का डर
भाजपा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मतदाता सूची की सफाई लोकतंत्र के लिए जरूरी है। भाजपा प्रदेशाध्यक्ष समिक भट्टाचार्य का कहना है कि टीएमसी को ‘घोस्ट वोटर्स’ और कथित घुसपैठियों के नाम कटने का डर है। भाजपा का आरोप है कि पहले ऐसे नामों के सहारे चुनावी लाभ लिया जाता रहा है और अब सूची शुद्ध होने से राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
आंकड़ों से समझिए संभावित असर
एक डेटा विश्लेषक के अनुसार, 2021 के विधानसभा चुनाव में 166 सीटों पर जीत का अंतर 25 हजार से कम था। इनमें से 102 सीटें टीएमसी और 64 भाजपा ने जीती थीं। यदि प्रति सीट औसतन लगभग 19,795 नाम हटे हैं, तो करीबी मुकाबले वाली सीटों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। 25 से 50 हजार के अंतर वाली 68 सीटें टीएमसी और 12 सीटें भाजपा के खाते में गई थीं। वहीं 50 हजार से अधिक अंतर से टीएमसी ने 43 और भाजपा ने एक सीट जीती थी। ऐसे में अंतिम मतदाता सूची का स्वरूप कई सीटों पर जीत-हार का गणित बदल सकता है।
मतदाताओं के लिए क्या है प्रक्रिया
निर्वाचन आयोग ने मतदाताओं से अपील की है कि वे आधिकारिक वेबसाइट पर जाकर अपना नाम और ईपीआईसी नंबर जांच लें। यदि नाम ड्राफ्ट सूची से हट गया है, तो फॉर्म-6 भरकर दोबारा आवेदन किया जा सकता है। यह फॉर्म बूथ लेवल ऑफिसर (BLO), तहसील या एसडीएम कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है और ऑनलाइन भी उपलब्ध है। पहचान, पते और उम्र के प्रमाण के साथ आवेदन जमा करना होगा। इसके बाद स्थानीय स्तर पर जांच होगी और यदि विवरण सही पाया गया तो नाम अंतिम सूची में जोड़ दिया जाएगा।
चुनावी परिदृश्य पर प्रभाव
चुनाव में अभी कुछ माह शेष हैं, लेकिन मतदाता सूची ही फिलहाल राजनीतिक रणभूमि बन चुकी है। एक ओर टीएमसी इसे राजनीतिक उत्पीड़न बताकर जनता के बीच मुद्दा बना रही है, तो दूसरी ओर भाजपा इसे पारदर्शिता और शुद्धिकरण की प्रक्रिया बता रही है। अंतिम मतदाता सूची जारी होने तक यह विवाद और तेज होने की संभावना है। स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में इस बार चुनावी मुकाबला सिर्फ भाषणों और रैलियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मतदाता सूची की हर पंक्ति भी सियासी रणनीति का अहम हिस्सा बनेगी।
Author: THE CG NEWS
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