पाक डिप्टी पीएम ने ट्रम्प के सीजफायर दावे को खारिज किया, इशाक दार बोले – भारत ने कभी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की

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पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री इशाक दार ने अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उस दावे को खारिज कर दिया है जिसमें कहा गया था कि हाल ही में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्षविराम में अमेरिका ने मध्यस्थता की थी। दार ने साफ कहा कि भारत ने कभी किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं की है और यह मामला हमेशा से द्विपक्षीय रहा है।

दार का यह बयान उस समय आया है जब ट्रम्प ने सार्वजनिक मंच से दावा किया कि भारत और पाकिस्तान के बीच तनाव कम करने में उनकी भूमिका अहम रही है। उन्होंने कहा था कि सीजफायर की सहमति अमेरिका की कोशिशों और दबाव का नतीजा है। लेकिन पाकिस्तान ने अब खुद यह स्वीकार किया है कि भारत ने किसी भी तीसरे पक्ष की भूमिका को मान्यता नहीं दी।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद तनाव

मई 2025 में भारत ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर निशाना साधा था। इसके बाद सीमापार कई दिनों तक गोलीबारी चली और हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए। 10 मई को संघर्षविराम की घोषणा हुई, जिसने दोनों देशों को अस्थायी राहत दी। इसी दौरान ट्रम्प ने दावा किया कि यह उनकी मध्यस्थता और बातचीत की वजह से संभव हुआ है।

हालांकि भारत ने शुरू से ही इन दावों को नकारते हुए कहा कि संघर्षविराम सैन्य स्तर पर हुई सीधी बातचीत का नतीजा था और इसमें किसी तीसरे देश की कोई भूमिका नहीं थी। अब पाकिस्तान के वरिष्ठ मंत्री इशाक दार ने भी भारत की इसी स्थिति को सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर लिया है।

दार का बयान और स्वीकारोक्ति

अंतरराष्ट्रीय मीडिया को दिए गए इंटरव्यू में इशाक दार ने कहा कि पाकिस्तान को अमेरिका से सीजफायर का प्रस्ताव जरूर मिला था, लेकिन भारत ने इसे कभी स्वीकार नहीं किया। उन्होंने कहा, “भारत ने साफ कर दिया था कि यह मुद्दा केवल द्विपक्षीय है और किसी तीसरे देश को इसमें दखल देने का अधिकार नहीं है। हमने भी इस बात का सम्मान किया।”

दार ने यह भी कहा कि पाकिस्तान वार्ता के लिए हमेशा तैयार है और वह चाहता है कि दोनों देश व्यापार, सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और अन्य मुद्दों पर मिलकर समाधान निकालें। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि बातचीत तभी सफल होगी जब भारत ईमानदारी के साथ इसमें शामिल हो और सभी मुद्दों को व्यापक तौर पर सामने रखे।

भारत की नीति स्पष्ट

भारत लगातार यह रुख अपनाता रहा है कि पाकिस्तान के साथ उसके संबंध पूरी तरह से द्विपक्षीय दायरे में सुलझाए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खुद ट्रम्प को पहले ही स्पष्ट कर दिया था कि भारत किसी तीसरे देश की मध्यस्थता स्वीकार नहीं करेगा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी यह बयान दिया था कि संघर्षविराम का फैसला सीधे सैन्य नेतृत्वों के बीच हुआ था और इसमें अमेरिका या किसी अन्य देश की कोई भूमिका नहीं थी।

भारत की यह स्थिति उसकी विदेश नीति के अनुरूप है, जिसमें संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है। भारत मानता है कि किसी बाहरी हस्तक्षेप से उसके आंतरिक और क्षेत्रीय मुद्दों पर अनावश्यक दबाव बनेगा, जो स्वीकार्य नहीं है।

ट्रम्प के दावों की सच्चाई

ट्रम्प ने अपने कार्यकाल और उसके बाद कई बार यह दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत कराई। इस बार भी उन्होंने संघर्षविराम का श्रेय खुद को दिया। लेकिन भारत और पाकिस्तान दोनों के हालिया बयानों ने यह साफ कर दिया है कि ट्रम्प की बातें राजनीतिक बयानबाज़ी से ज्यादा कुछ नहीं थीं।

विश्लेषकों का मानना है कि ट्रम्प का यह दावा अमेरिकी घरेलू राजनीति से जुड़ा हुआ है, जहां वे अपनी विदेश नीति की उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना चाहते हैं। वहीं पाकिस्तान का बयान यह साबित करता है कि भारत ने अपने रुख पर दृढ़ता से कायम रहते हुए किसी भी तरह की बाहरी दखल को नकार दिया।

रणनीतिक मायने

दार का यह बयान न केवल ट्रम्प के दावे को कमजोर करता है बल्कि यह भी दिखाता है कि भारत की कूटनीतिक नीति कितनी सुसंगत और स्थिर है। पाकिस्तान की यह स्वीकारोक्ति भविष्य की वार्ताओं के लिए एक नई पृष्ठभूमि तैयार कर सकती है, जहां दोनों देश सीधे तौर पर संवाद की राह अपनाएं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह संकेत गया है कि भारत-पाकिस्तान संबंधों में तीसरे पक्ष की भूमिका सीमित रहेगी। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में अमेरिका और अन्य देश केवल एक सहयोगी या सलाहकार की भूमिका में रह सकते हैं, लेकिन मध्यस्थता की गुंजाइश लगभग खत्म हो चुकी है।

निष्कर्ष

इशाक दार के इस बयान ने भारत की उस नीति को मजबूती दी है जिसके तहत किसी भी विवाद को बाहरी मध्यस्थता से नहीं बल्कि द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाया जाएगा। ट्रम्प के दावे चाहे जितने बड़े हों, वास्तविकता यह है कि भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्षविराम का फैसला उनके अपने सैन्य और कूटनीतिक चैनलों के जरिए हुआ। यह घटनाक्रम एक बार फिर दिखाता है कि दक्षिण एशिया की राजनीति में बाहरी हस्तक्षेप की सीमा तय हो चुकी है और आगे की राह केवल आपसी बातचीत पर ही निर्भर करेगी।

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Author: THE CG NEWS

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