बार-बार गरम किया गया तेल बनता है ज़हर, डॉक्टरों ने दी चेतावनी — बढ़ सकता है दिल और कैंसर का ख़तरा

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त्योहारों के दौरान घरों में तली-भुनी चीज़ें अक्सर बनी रहती हैं, और बचा हुआ तेल दोबारा इस्तेमाल करना आम बात है। लेकिन विशेषज्ञों और वैज्ञानिक अध्ययनों की मानें तो यह सरल आदत “धीमा ज़हर” बन सकती है, क्योंकि दोबारा गर्म किए गए तेल में कुछ ऐसे जैव-रासायनिक परिवर्तन होते हैं जो स्वास्थ्य को नुक़सान पहुँचा सकते हैं। आइए जानते हैं कि कैसे और कितना खतरा है — और इसे कैसे रोका जा सकता है।

तेल में रासायनिक बदलाव: “धीमा ज़हर” कैसे बनता है?

ऑक्सीडेशन, पॉलिमराइज़ेशन और हाइड्रोलाइसिस

जब तेल को पहली बार गरम किया जाता है, तो उसमें उपस्थित वसा अणु (फैटी एसिड) ऑक्सीडेशन (ऑक्सीजन के संपर्क में प्रतिक्रियाएं), हाइड्रोलाइसिस (पानी से टूटना) और पॉलिमराइज़ेशन (आणुओं का जोड़ना) जैसी प्रक्रियाओं से गुजरते हैं। ये प्रभाव अधिक बढ़ जाते हैं जब तेल को बार-बार गरम किया जाता है। ऐसे में नई हानिकारक यौगिक बनने लगते हैं जैसे एल्डिहाइड्स, पॉलीमरिक पदार्थ, ट्रांस फैट्स, और अन्य “टोटल पोलर कंपाउंड्स” (Total Polar Compounds)।

ICMR (भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद) ने हाल ही में चेतावनी दी है कि बार-बार गरम किए गए वनस्पति तेलों में विषैले यौगिक बन सकते हैं, जिससे हृदय रोग और कैंसर का खतरा बढ़ सकता है। 

इसी तरह Indian Express द्वारा प्रकाशित एक लेख कहता है कि ऑक्सिडेशन से पॉलीसाइकलिक अरोमैटिक हाइड्रोकार्बन (PAHs), एल्डिहाइड्स और ऐक्रिलामाइड जैसे यौगिक बन सकते हैं, जो डीएनए को क्षति पहुँचाते हैं और कैंसर के जोखिम को बढ़ाते हैं। 

फ्री रेडिकल्स और सूजन

दोबारा गर्म किए गए तेल में मुक्त (free) रैडिकल्स बनते हैं, जो कोशिका स्तर पर ऑक्सीडेटिव तनाव बढ़ाते हैं। ये तनाव क्रॉनिक सूजन (chronic inflammation) की उत्पत्ति कर सकता है, जो मोटापा, मधुमेह, हृदय रोग और अन्य पुरानी बीमारियों में भूमिका निभाता है। 

एक पशु अध्ययन (rats) में यह पाया गया कि दोबारा इस्तेमाल किया गया तला तेल मस्तिष्क कोशिकाओं में न्यूरोडीजेनेरेशन (तंत्रिका क्षय) को तेज कर सकता है। 

कोलेस्ट्रॉल, ट्रांस फैट्स और हृदय संबंधी जोखिम

जब तेल को दोबारा गरम किया जाता है, तो उसमें LDL (खराब कोलेस्ट्रॉल) बढ़ने लगता है और HDL (अच्छी तरह का कोलेस्ट्रॉल) कम हो सकता है। साथ ही, ट्रांस फैट्स का स्तर बढ़ जाता है, जो एथेरोस्क्लेरोसिस (धमनियों की मोटाई), स्ट्रोक और हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाते हैं। 

डॉक्टरों की राय – सच में कितना ख़तरा?

डॉ. Soumyadeep Mukhopadhyay (MitraSK Food Testing Services) के अनुसार, reheating और reuse तेल के हानिकारक प्रभावों को तेज कर देता है। वे बताते हैं कि प्रत्येक बार तेल को गर्म करने पर उसकी संरचना बदलती है, और अनपेक्षित यौगिक निकलने लगते हैं। 

ICMR और पोषण विशेषज्ञों का सुझाव है कि यदि तेल को दोबारा उपयोग करना ही हो, तो:

1.छानना (filtering) — बचा तेल छान कर उपयोग करना चाहिए, ताकि खाद्य अवशेष निकल जाएँ। 

2.कम से कम गरम करना और जल्द उपयोग करना — दोबारा उपयोग के लिए केवल हल्का गरम करना और अगले 1–2 दिन में उपयोग करना चाहिए। 

3.तेल का प्रकार बदलना — ऐसे तेल चुनना जिनका स्मोक प्वाइंट अधिक हो और जो स्थिर हों (monounsaturated या saturated oil) जैसे नारियल, जैतून आदि। 

4.तेल को ज़्यादा समय संग्रहीत न करना — इस्तेमाल किए गए तेल को लंबे समय तक भंडारण न करना चाहिए, क्योंकि ख़राबी तेज़ी से बढ़ती है। 

सावधानी कैसे बरतें? (रसोई टिप्स)

•एक ही बार तला करने के लिए पर्याप्त तेल ही इस्तेमाल करें — अधिक मात्रा को बचाना कम तेल में विघटन को तेज करता है।

•जब तेल धुंआ देने लगे (smoking point), तुरंत उसका उपयोग बंद करें।

•दीप Frying (गहरे तलने) की बजाय बेकिंग, ग्रिलिंग, स्ट्रिमिंग जैसी विधियाँ अपनाएँ।

•ठंडे, अक्रिय (cold-pressed) और अनप्रोसेस्ड तेलों का उपयोग करें।

•बाहर खाते समय यह पूछें कि तेल कितनी बार इस्तेमाल किया गया है।

निष्कर्ष

दोबारा गरम किया गया तेल सिर्फ “बचे हुए” नहीं होता — उसमें रासायनों और टूट-फूट की श्रृंखला चलती है, जो धीरे-धीरे स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल सकती है। इसे “धीमा ज़हर” कहा जा सकता है, क्योंकि समय के साथ यह शरीर में सूजन, कोलेस्ट्रॉल असंतुलन, ऑक्सीडेटिव तनाव और संभावित रोग-प्रवण अवस्थाएँ उत्पन्न कर सकता है।

लेकिन इसका उपाय भी सरल है — समझदारी से उपयोग करना, तेल को ज़्यादा बार नहीं गरम करना, और बेहतर खाना पकाने की तकनीक अपनाना।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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