
अमेरिकी प्रशासन की ओर से ग्रीनलैंड को लेकर दिए गए ताजा बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हलचल मचा दी है। व्हाइट हाउस ने पहली बार खुलकर यह संकेत दिया है कि अमेरिका ग्रीनलैंड पर नियंत्रण पाने के लिए सैन्य विकल्प पर भी विचार कर सकता है। BBC के मुताबिक व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलीन लेविट ने कहा कि ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बेहद अहम है और इसे हासिल करने के कई तरीकों पर काम किया जा रहा है, जिनमें सैन्य बल का इस्तेमाल भी शामिल है। इस बयान के बाद यूरोप और नाटो देशों में चिंता गहराने लगी है।
राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर ट्रम्प का पुराना एजेंडा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पहले भी कई बार ग्रीनलैंड को अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से जरूरी बता चुके हैं। सोमवार को उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड में रूसी और चीनी जहाजों की मौजूदगी अमेरिका के लिए खतरा है और इस मुद्दे पर जल्द बातचीत की जाएगी। ट्रम्प का कहना है कि आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा नीति की “फ्रंट लाइन” बन चुका है।
हमला नहीं, खरीद की बात कर रहे विदेश मंत्री
हालांकि ट्रम्प के बयान और व्हाइट हाउस की टिप्पणी के बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने स्थिति को कुछ हद तक संतुलित करने की कोशिश की है। रॉयटर्स के अनुसार रूबियो ने साफ कहा कि अमेरिका का इरादा ग्रीनलैंड पर हमला करने का नहीं है, बल्कि डेनमार्क से इसे खरीदने या किसी विशेष समझौते के जरिए अपने प्रभाव को बढ़ाने का है। एक वरिष्ठ अमेरिकी अधिकारी ने भी संकेत दिया कि अमेरिका ग्रीनलैंड के लोगों के साथ दीर्घकालिक और लाभकारी रिश्ते बनाना चाहता है।
ग्रीनलैंड: स्वायत्त लेकिन सुरक्षा डेनमार्क के हाथ
ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है और NATO का हिस्सा भी है। यहां की आबादी करीब 57 हजार है और इसकी अपनी कोई सेना नहीं है। रक्षा और विदेश नीति की जिम्मेदारी डेनमार्क संभालता है। ग्रीनलैंड में डेनमार्क के लगभग 200 सैनिक तैनात हैं, जो निगरानी, सर्च एंड रेस्क्यू और संप्रभुता की रक्षा का काम करते हैं। इसके अलावा अमेरिका का थुले एयर बेस, जिसे अब पिटुफिक स्पेस बेस कहा जाता है, ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में स्थित है, जहां करीब 150 से 200 अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं।
यूरोपीय देशों का कड़ा विरोध
व्हाइट हाउस के बयान पर यूरोपीय देशों ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, पोलैंड, स्पेन और डेनमार्क के नेताओं ने संयुक्त बयान जारी कर कहा कि ग्रीनलैंड उसके लोगों का है और उसके भविष्य का फैसला केवल ग्रीनलैंड और डेनमार्क ही कर सकते हैं। नेताओं ने नाटो के तहत सामूहिक सुरक्षा को मजबूत करने की बात कही, लेकिन साथ ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों, खासकर संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान पर जोर दिया।
NATO टूटने की चेतावनी
डेनमार्क की प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिकसन ने ट्रम्प प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि अगर अमेरिका ने किसी NATO सदस्य देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई की, तो यह पूरे NATO गठबंधन के अंत की शुरुआत होगी। एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि NATO में एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला माना जाता है और ऐसे में “कुछ भी नहीं बचेगा।” उन्होंने यह भी याद दिलाया कि ग्रीनलैंड के लोग पहले ही साफ कह चुके हैं कि वे बिकाऊ नहीं हैं।
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री की प्रतिक्रिया
ग्रीनलैंड के प्रधानमंत्री जेंस-फ्रेडरिक नीलसन ने भी यूरोपीय नेताओं के बयान का समर्थन किया है। उन्होंने कहा कि किसी भी तरह की बातचीत सम्मानजनक तरीके से होनी चाहिए। नीलसन ने अमेरिकी बयानों को ग्रीनलैंड के लोगों के प्रति अनादर बताया और कहा कि डरने या घबराने की कोई जरूरत नहीं है।
अमेरिका को ग्रीनलैंड से क्या चाहिए
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति इसे उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच एक अहम ठिकाना बनाती है। यह आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य निगरानी, मिसाइल चेतावनी और स्पेस मॉनिटरिंग के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यहां दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बड़े भंडार माने जाते हैं, जिनका भविष्य में तकनीकी और आर्थिक महत्व और बढ़ने वाला है। इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग के चलते आर्कटिक में नई समुद्री व्यापारिक राहें खुल रही हैं, जिन पर नियंत्रण वैश्विक ताकत के संतुलन को प्रभावित कर सकता है।
इतिहास से जुड़ा रणनीतिक महत्व
दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ग्रीनलैंड का इलाका ‘ग्रीनलैंड एयर गैप’ के कारण रणनीतिक रूप से बेहद अहम था। जर्मन पनडुब्बियां इसी इलाके का फायदा उठाकर मित्र देशों के जहाजों पर हमला करती थीं। बाद में यहां सैन्य ठिकाने बनने से अटलांटिक पर निगरानी संभव हो सकी। आठ दशक बाद एक बार फिर ग्रीनलैंड वैश्विक शक्ति संतुलन के केंद्र में आ गया है।
ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प प्रशासन की आक्रामक बयानबाजी ने साफ कर दिया है कि आर्कटिक क्षेत्र आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का बड़ा रणक्षेत्र बन सकता है। अब नजर इस पर रहेगी कि अमेरिका इस मुद्दे को कूटनीति से आगे बढ़ाता है या यह विवाद NATO और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए नई चुनौती बन जाता है।
Author: THE CG NEWS
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