कहीं आपको टेलिफोबिया तो नहीं: फोन बजते ही घबराहट, तेज धड़कन और पसीना—न्यूरोलॉजिस्ट से जानें कंट्रोल करने के तरीके

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आज के डिजिटल दौर में मोबाइल फोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है। काम, पढ़ाई, रिश्ते और इमरजेंसी—हर चीज फोन से जुड़ी है। इसके बावजूद कई लोग ऐसे हैं, जिन्हें फोन कॉल आते ही बेचैनी होने लगती है। फोन की घंटी सुनते ही दिल की धड़कन तेज हो जाती है, हाथ-पैर ठंडे पड़ने लगते हैं और मन में डर बैठ जाता है। इस स्थिति को मेडिकल भाषा में टेलिफोबिया कहा जाता है। यह एक तरह की एंग्जायटी डिसऑर्डर से जुड़ी समस्या मानी जाती है, जिसे समय रहते पहचानना और संभालना जरूरी है।

क्या है टेलिफोबिया

टेलिफोबिया का मतलब है फोन कॉल का असामान्य डर। इसमें व्यक्ति को कॉल करने या कॉल रिसीव करने दोनों से घबराहट हो सकती है। कई लोग मैसेज या चैट में सहज रहते हैं, लेकिन फोन बजते ही तनाव में आ जाते हैं। न्यूरोलॉजिस्ट के अनुसार यह समस्या सिर्फ शर्मीलापन नहीं है, बल्कि दिमाग की स्ट्रेस रिस्पॉन्स प्रणाली से जुड़ी होती है। इसमें व्यक्ति को यह डर सताने लगता है कि कॉल पर क्या बोलना है, सामने वाला क्या पूछेगा या कहीं कोई बुरी खबर तो नहीं है।

टेलिफोबिया के आम लक्षण

फोन की घंटी बजते ही बेचैनी महसूस होना, दिल की धड़कन तेज हो जाना, पसीना आना, सांस लेने में दिक्कत, कॉल काट देने की तीव्र इच्छा और बाद में खुद को दोष देना—ये टेलिफोबिया के आम लक्षण हैं। कुछ लोगों में पेट दर्द, सिर भारी लगना या चक्कर जैसी शिकायतें भी देखी जाती हैं। लंबे समय तक यह समस्या बनी रहे तो व्यक्ति सामाजिक और प्रोफेशनल जीवन में पीछे रहने लगता है।

क्यों बढ़ रही है यह समस्या

न्यूरोलॉजिस्ट बताते हैं कि टेलिफोबिया के पीछे कई कारण हो सकते हैं। अचानक बुरी खबर मिलने का पुराना अनुभव, ऑफिस में सख्त बॉस की कॉल, बार-बार कॉल पर डांट पड़ना या सोशल एंग्जायटी इसकी वजह बन सकती है। इसके अलावा आजकल मैसेजिंग कल्चर बढ़ने से लोग कॉल पर बात करने की आदत खोते जा रहे हैं। कोविड के बाद वर्क फ्रॉम होम, अनिश्चितता और लगातार नेगेटिव न्यूज ने भी एंग्जायटी को बढ़ाया है, जिससे टेलिफोबिया के मामले सामने आ रहे हैं।

दिमाग में क्या होता है

विशेषज्ञों के मुताबिक जब फोन बजता है, तो टेलिफोबिया से ग्रस्त व्यक्ति का दिमाग उसे खतरे के संकेत की तरह लेता है। इससे एमिग्डाला नाम का हिस्सा एक्टिव हो जाता है, जो डर और तनाव को कंट्रोल करता है। नतीजतन शरीर में स्ट्रेस हार्मोन रिलीज होते हैं और घबराहट के लक्षण सामने आते हैं। यह प्रतिक्रिया असली खतरे से ज्यादा दिमाग की आशंका पर आधारित होती है।

कैसे करें टेलिफोबिया को कंट्रोल

न्यूरोलॉजिस्ट का कहना है कि टेलिफोबिया को धीरे-धीरे कंट्रोल किया जा सकता है। सबसे पहला कदम है इस डर को स्वीकार करना। खुद को यह समझाना जरूरी है कि हर फोन कॉल खतरा नहीं होता। शुरुआत में दिन में एक-दो कॉल जानबूझकर रिसीव करने की आदत डालें। कॉल से पहले गहरी सांस लें और खुद को शांत रखें। जरूरत हो तो कॉल के दौरान छोटे-छोटे नोट्स बना लें, ताकि बात करते समय घबराहट कम हो।

माइंडफुलनेस और ब्रीदिंग एक्सरसाइज का रोल

डीप ब्रीदिंग, माइंडफुलनेस और मेडिटेशन टेलिफोबिया में काफी मददगार माने जाते हैं। फोन बजने पर तुरंत प्रतिक्रिया देने की बजाय पहले तीन गहरी सांस लें। इससे दिमाग को यह संकेत मिलता है कि स्थिति सुरक्षित है। रोजाना कुछ मिनट का ध्यान अभ्यास करने से एंग्जायटी लेवल धीरे-धीरे कम होने लगता है।

कब लें विशेषज्ञ की मदद

अगर फोन कॉल का डर इतना बढ़ जाए कि काम, रिश्ते या रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित होने लगे, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना जरूरी है। न्यूरोलॉजिस्ट या साइकोलॉजिस्ट काउंसलिंग, बिहेवियर थेरेपी या जरूरत पड़ने पर दवा की सलाह दे सकते हैं। समय पर इलाज से टेलिफोबिया पूरी तरह कंट्रोल किया जा सकता है।

फोन से डर नहीं, संतुलन जरूरी

टेलिफोबिया कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक समस्या है। इसे नजरअंदाज करने की बजाय समझना और सही तरीके से संभालना जरूरी है। सही अभ्यास, धैर्य और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ की मदद से फोन की घंटी दोबारा डर की नहीं, सामान्य बातचीत की आवाज बन सकती है।

THE CG NEWS
Author: THE CG NEWS

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