
इंडस्ट्री के तानों, पिता के विरोध और शुरुआती संघर्ष के बावजूद तीन दशक तक सिनेमा पर कायम रही अभिनेत्री
बॉलीवुड में यह धारणा आम रही है कि फिल्मी परिवार से आने वाले कलाकारों के लिए रास्ते आसान होते हैं, लेकिन रानी मुखर्जी की कहानी इस सोच को पूरी तरह झुठला देती है। करियर की शुरुआत में उन्हें न सिर्फ इंडस्ट्री के भीतर आलोचना और मज़ाक का सामना करना पड़ा, बल्कि अपने आत्मविश्वास और पहचान को लेकर भी लगातार सवाल झेलने पड़े। कभी कहा गया कि वह “हीरोइन बनने लायक नहीं हैं”, कभी उनकी कद-काठी, रंग और भारी आवाज को निशाना बनाया गया। इसके बावजूद रानी मुखर्जी ने न केवल खुद को साबित किया, बल्कि करीब तीन दशक तक हिंदी सिनेमा में अपनी अलग और मजबूत पहचान बनाए रखी।
पिता के विरोध के बावजूद चुना फिल्मी रास्ता
रानी मुखर्जी का जन्म 21 मार्च 1978 को मुंबई में हुआ। वह फिल्म निर्माता राम मुखर्जी की बेटी और अभिनेत्री तनुजा की भतीजी हैं। मजबूत फिल्मी बैकग्राउंड होने के बावजूद उनके पिता नहीं चाहते थे कि वह फिल्मों में जाएं। एक इंटरव्यू में रानी ने बताया था कि उनके पिता इंडस्ट्री के उतार-चढ़ाव से वाकिफ थे और उन्हें डर था कि उनकी बेटी इस दुनिया की कठोरता नहीं झेल पाएगी। रानी के मुताबिक, जब वह खुद मां बनीं, तब उन्हें अपने पिता की चिंता की गहराई समझ में आई। बावजूद इसके उन्होंने अपनी राह खुद चुनी और आगे बढ़ने का फैसला किया।
शुरुआत में झेलनी पड़ी उपेक्षा और ताने
रानी मुखर्जी ने 1996 में बंगाली फिल्म ‘बियेर फूल’ से अभिनय की शुरुआत की और इसके बाद हिंदी फिल्म ‘राजा की आएगी बारात’ से बॉलीवुड में कदम रखा। शुरुआती दौर में उनकी कद-काठी, रंग और आवाज को लेकर खुलेआम मज़ाक उड़ाया गया। कई लोगों ने यह तक कह दिया कि वह पारंपरिक बॉलीवुड हीरोइन के पैमाने पर फिट नहीं बैठतीं। रानी ने खुद स्वीकार किया कि उनकी आवाज तक को कुछ फिल्मों में डब किया गया, लेकिन दर्शकों ने उन्हें दिल से अपनाया और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बनी।
‘कुछ कुछ होता है’ से बदली किस्मत
1998 में रिलीज हुई फिल्म ‘कुछ कुछ होता है’ रानी मुखर्जी के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई। शाहरुख खान और काजोल जैसे बड़े सितारों के बीच सीमित स्क्रीन टाइम के बावजूद रानी ने टीना मल्होत्रा के किरदार से गहरी छाप छोड़ी। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवॉर्ड मिला और इसके बाद इंडस्ट्री ने उन्हें गंभीरता से लेना शुरू किया।
जोखिम भरे किरदारों से बनाई अलग पहचान
रानी मुखर्जी की खासियत यह रही कि उन्होंने खुद को सिर्फ रोमांटिक फिल्मों तक सीमित नहीं रखा। ‘साथिया’, ‘हम तुम’, ‘युवा’, ‘ब्लैक’, ‘बंटी और बबली’, ‘नो वन किल्ड जेसिका’, ‘मर्दानी’ और हालिया ‘मिसेस चटर्जी वर्सेस नॉर्वे’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अलग-अलग और चुनौतीपूर्ण किरदार निभाए। इन फिल्मों ने साबित किया कि वह सिर्फ स्टार नहीं, बल्कि दमदार अभिनेत्री हैं। उनके नाम अब तक 8 फिल्मफेयर अवॉर्ड दर्ज हैं।
‘ब्लैक’ बनी करियर की मील का पत्थर
फिल्म ‘ब्लैक’ को रानी मुखर्जी के करियर की मील का पत्थर माना जाता है। इस फिल्म में उनके अभिनय को देश-विदेश में सराहा गया। अमिताभ बच्चन जैसे दिग्गज अभिनेता के सामने उनका प्रदर्शन बराबरी का रहा। यही वह फिल्म थी जिसने रानी को एक गंभीर और सशक्त अभिनेत्री के रूप में स्थापित कर दिया।
नेशनल अवॉर्ड और पिता को समर्पण
करीब 30 साल के करियर के बाद रानी मुखर्जी को फिल्म ‘मिसेस चटर्जी वर्सेस नॉर्वे’ के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस अवॉर्ड को उन्होंने अपने दिवंगत पिता राम मुखर्जी को समर्पित किया। रानी ने कहा कि उनके पिता उनके सबसे बड़े सपोर्ट सिस्टम थे और उनके जाने के बाद हर खुशी अधूरी लगती है।
स्टारडम नहीं, कहानियां रहीं प्राथमिकता
रानी मुखर्जी का कहना है कि उन्होंने कभी स्टारडम को अपना लक्ष्य नहीं बनाया। उनके लिए जरूरी था कि वह ऐसी कहानियों का हिस्सा बनें जो समाज को सोचने पर मजबूर करें और महिलाओं की ताकत दिखाएं। यही वजह है कि उन्होंने अपने करियर में जोखिम उठाने से कभी परहेज नहीं किया।
संघर्ष से सम्मान तक का सफर
कद–काठी, रंग और आवाज पर उड़ाए गए मज़ाक से लेकर नेशनल अवॉर्ड तक का रानी मुखर्जी का सफर यह साबित करता है कि प्रतिभा और धैर्य के आगे हर पूर्वाग्रह टूट सकता है। आज वह हिंदी सिनेमा की उन चुनिंदा अभिनेत्रियों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने काम के दम पर सम्मान और स्थायित्व दोनों हासिल किए हैं।
Author: THE CG NEWS
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