अमेरिका-चीन के बीच संतुलन साधता भारत: ट्रम्प के टैरिफ के बाद बदली विदेश और व्यापार नीति, मध्यम ताकत वाले देशों से बढ़ी नजदीकी

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दुनिया की भू-राजनीतिक व्यवस्था तेजी से बदल रही है और इसका सीधा असर भारत की विदेश व व्यापार नीति पर दिखने लगा है। पिछले महीने स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के मंच से कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने कहा था कि दुनिया की पुरानी वैश्विक व्यवस्था टूट रही है और अब मध्यम ताकत वाले देशों को एकजुट होकर आगे बढ़ना होगा। उन्होंने भले ही किसी देश का नाम न लिया हो, लेकिन उनके बयान को अमेरिका की बदलती नीतियों और भारत जैसी उभरती शक्तियों से जोड़कर देखा गया।

भारत इस समय दो बड़े दबावों के बीच खड़ा है। एक ओर अमेरिका की संरक्षणवादी नीतियां और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के टैरिफ फैसलों का असर है, तो दूसरी ओर चीन की बढ़ती आक्रामकता। इन परिस्थितियों में भारत अब पारंपरिक साझेदारों तक सीमित रहने के बजाय नए और अपेक्षाकृत कम ताकतवर देशों के साथ रिश्ते मजबूत करने की रणनीति अपना रहा है।

इस बदलाव का संकेत तब साफ दिखा, जब दावोस के भाषण के ठीक एक हफ्ते बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नई दिल्ली में यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ नजर आए। दोनों पक्षों ने लगभग 18 साल से अटकी भारत-यूरोपीय संघ व्यापार डील को आगे बढ़ाने की घोषणा की, जिसे ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा गया। इस समझौते से करीब दो अरब लोगों का साझा बाजार तैयार होगा और इसे उस नए वैश्विक ढांचे की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, जहां अमेरिका की भूमिका पहले जैसी निर्णायक नहीं रह गई है।

भारत की विदेश नीति में यह बदलाव उसकी बढ़ती वैश्विक भूमिका से भी जुड़ा है। 140 करोड़ से अधिक आबादी वाला भारत आज दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो चुका है। जापान और जर्मनी के साथ उसका नाम टॉप-5 इकोनॉमी में गिना जाता है, हालांकि प्रति व्यक्ति आय के मामले में वह अब भी पीछे है। लंबे समय तक ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विचार के तहत सीमित आर्थिक जुड़ाव की सोच रही, लेकिन अब नीति में लचीलापन दिख रहा है। यूरोप, कनाडा और अन्य देश लगातार यह तर्क देते रहे हैं कि खुले व्यापार और साझेदारी से ही स्थायी मजबूती मिलती है।

इस बदलाव की शुरुआत पिछले साल भारत-ब्रिटेन के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट से मानी जा रही है। इसके बाद दिसंबर में ओमान और न्यूजीलैंड के साथ भी अहम द्विपक्षीय समझौते हुए। हाल के हफ्तों में जर्मनी, जापान, यूएई और सऊदी अरब के शीर्ष नेताओं की नई दिल्ली यात्राएं भी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं। फरवरी में ब्राजील के राष्ट्रपति लूला दा सिल्वा और मार्च में मार्क कार्नी के भारत आने की उम्मीद है, जहां नए व्यापार समझौतों पर बातचीत हो सकती है।

अमेरिका के साथ रिश्तों में बदलाव की बड़ी वजह ट्रम्प के टैरिफ फैसले रहे। पिछले साल भारत से आने वाले कई उत्पादों पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया गया था, जिसमें रूस से तेल खरीदने को लेकर अतिरिक्त पेनल्टी भी शामिल थी। इससे भारत-अमेरिका संबंधों में तनाव आया, जबकि इससे पहले 25 वर्षों तक दोनों देश चीन के मुकाबले रणनीतिक साझेदारी बढ़ाने की कोशिश करते रहे थे। हालांकि अब अमेरिका ने कुल टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत करने का फैसला लिया है और रूसी तेल से जुड़ी पेनल्टी हटाने की बात कही है।

विशेषज्ञों के मुताबिक, भारत की एक कमजोरी यह है कि वैश्विक सप्लाई चेन में उसके पास ऐसा कोई निर्णायक संसाधन नहीं है, जिससे वह दबाव बना सके। वॉशिंगटन स्थित ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सीनियर फेलो तन्वी मदान के अनुसार, चीन के पास रेयर-अर्थ खनिज हैं और ताइवान व नीदरलैंड के पास उन्नत चिप तकनीक, जबकि भारत अभी इस स्तर की निर्भरता पैदा नहीं कर पाया है। ऐसे में चीन के मुकाबले उसे व्यापक अंतरराष्ट्रीय समर्थन की जरूरत है।

कनाडा के साथ रिश्तों में सुधार भी इसी संदर्भ में अहम माना जा रहा है। अक्टूबर 2024 में एक सिख अलगाववादी की हत्या को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया था और राजनयिकों को निष्कासित किया गया था। जून 2025 में जी-7 शिखर सम्मेलन के दौरान मोदी-कार्नी मुलाकात के बाद से रिश्तों में सुधार के संकेत मिले, जो अब नए व्यापार समझौते की दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं।

अमेरिका आज भी भारत का सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। टैरिफ बढ़ने के बाद शुरुआती महीनों में निर्यात गिरा और रुपये पर दबाव आया, लेकिन इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे कम टैरिफ वाले सेक्टर और नए बाजारों पर फोकस कर भारत ने आंशिक भरपाई कर ली। अर्थशास्त्री रजत कथूरिया के शब्दों में, भारत अक्सर संकट को सुधार का अवसर बना लेता है। मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल में भी भारत इसी रणनीति के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

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Author: THE CG NEWS

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