टॉप लीडरशिप पर हमलों के बाद भी कैसे लड़ रहा ईरान: ‘मोजेक डिफेंस’ रणनीति से 7 हिस्सों में बांटी सैन्य ताकत

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मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच ईरान और अमेरिका-इजराइल के बीच तनावपूर्ण हालात लगातार गहराते जा रहे हैं। पिछले करीब 12 दिनों से जारी हमलों में ईरान की शीर्ष नेतृत्व संरचना को बड़ा नुकसान पहुंचने की खबरें सामने आई हैं। रिपोर्टों के मुताबिक शुरुआती हमलों में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद अब तक लगभग 50 वरिष्ठ सैन्य और प्रशासनिक अधिकारी भी मारे जा चुके हैं। इसके बावजूद ईरान का दावा है कि उसकी सैन्य क्षमता अब भी बरकरार है और वह लंबे समय तक युद्ध जारी रखने में सक्षम है। विशेषज्ञों का कहना है कि इसकी वजह ईरान की एक खास सैन्य रणनीति है, जिसे “डिसेंट्रलाइज्ड मोजेक डिफेंस” कहा जाता है।

‘मोजेक डिफेंस’ से युद्ध क्षमता बनाए रखने की कोशिश

ईरान ने अपने सैन्य ढांचे को पारंपरिक केंद्रीकृत कमांड के बजाय कई छोटे-छोटे स्वतंत्र हिस्सों में बांट रखा है। इस रणनीति के तहत पूरी सैन्य शक्ति को एक केंद्र पर निर्भर नहीं रखा गया है, बल्कि सात अलग-अलग समूहों में विभाजित किया गया है। इस व्यवस्था का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि यदि दुश्मन केंद्रीय कमांड, मुख्यालय या शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर खत्म भी कर दे, तब भी सैन्य ढांचा पूरी तरह ध्वस्त न हो और युद्ध जारी रखा जा सके।

ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हाल ही में कहा था कि देश ने दो दशकों तक अमेरिका के युद्ध अभियानों का अध्ययन किया है। उसी अनुभव के आधार पर ऐसा सुरक्षा ढांचा तैयार किया गया, जिससे राजधानी या नेतृत्व पर हमला होने के बाद भी सैन्य प्रतिरोध जारी रखा जा सके।

नेटवर्क की तरह काम करता है ईरान का सैन्य ढांचा

‘डिसेंट्रलाइज्ड मोजेक डिफेंस’ का सबसे बड़ा आधार इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी IRGC है। यह रणनीति 2007 से 2019 के बीच IRGC के पूर्व कमांडर मोहम्मद अली जाफरी के कार्यकाल में विकसित की गई थी। इस ढांचे में IRGC, नियमित सेना, बसीज मिलिशिया, मिसाइल इकाइयों, नौसेना और स्थानीय कमांड संरचनाओं को एक नेटवर्क की तरह संगठित किया गया है।

इस व्यवस्था की खासियत यह है कि यदि केंद्रीय संचार प्रणाली टूट जाए या आदेश न पहुंच पाए, तब भी स्थानीय इकाइयों को स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने की अनुमति रहती है। इससे युद्ध के दौरान कमांड चेन के टूटने का खतरा कम हो जाता है।

ईरान की सेना सात प्रमुख हिस्सों में विभाजित

ईरान ने अपने सैन्य तंत्र को अलग-अलग भूमिकाओं के आधार पर सात प्रमुख हिस्सों में बांटा है। नियमित सेना, जिसे आर्टेश कहा जाता है, दुश्मन के शुरुआती हमलों को झेलने और मोर्चे को स्थिर रखने का काम करती है। वहीं एयर डिफेंस यूनिट्स का लक्ष्य दुश्मन की हवाई ताकत को रोकना और अपने संसाधनों को छिपाकर सुरक्षित रखना होता है।

IRGC की भूमिका दूसरे चरण में ज्यादा सक्रिय होती है। यह गुरिल्ला युद्ध, घात लगाकर हमले, सप्लाई लाइनों को बाधित करने और शहरों या पहाड़ी इलाकों में लचीले सैन्य ऑपरेशन चलाने में विशेषज्ञ मानी जाती है। बसीज मिलिशिया को देश के 31 प्रांतों में संगठित किया गया है और स्थानीय कमांडरों को काफी स्वायत्तता दी गई है।

इसके अलावा नौसेना फारस की खाड़ी और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों में तेज हमला करने वाली नौकाओं, समुद्री बारूदी सुरंगों और एंटी-शिप मिसाइलों के जरिए दुश्मन की नौसैनिक ताकत को चुनौती देती है। मिसाइल फोर्स दुश्मन के सैन्य ठिकानों और महत्वपूर्ण ढांचे पर दूर से हमला करने के लिए जिम्मेदार है, जबकि क्षेत्रीय सहयोगी समूहों के जरिए युद्ध को सीमाओं से बाहर भी फैलाने की रणनीति अपनाई जाती है।

अमेरिका के युद्ध अभियानों से सीखी रणनीति

विशेषज्ञों के अनुसार ईरान ने यह रणनीति अमेरिका के अफगानिस्तान और इराक युद्धों से सीखकर तैयार की। 2003 में इराक पर अमेरिकी हमले के दौरान सद्दाम हुसैन की सरकार का केंद्रीकृत सैन्य ढांचा कुछ ही दिनों में ढह गया था। उस अनुभव से ईरान ने समझा कि केवल केंद्रीय कमांड पर निर्भर रहना बेहद जोखिम भरा हो सकता है।

इसी वजह से ईरान ने अपने सैन्य ढांचे को छोटे-छोटे हिस्सों में बांट दिया, ताकि किसी एक स्थान या नेतृत्व के खत्म होने से पूरा सिस्टम ठप न पड़े। यह रणनीति सीधे मुकाबले के बजाय लंबा युद्ध खींचने और दुश्मन को धीरे-धीरे थकाने पर केंद्रित मानी जाती है।

हर पद के लिए कई उत्तराधिकारी तय

ईरान ने अपने प्रशासनिक और सैन्य ढांचे में उत्तराधिकार की व्यवस्था भी पहले से तय कर रखी है। कई पदों के लिए एक नहीं बल्कि चार-चार संभावित उत्तराधिकारी निर्धारित किए गए हैं। इसे “फोर्थ सक्सेसर” की अवधारणा कहा जाता है। इसका उद्देश्य यह है कि यदि किसी नेता की हत्या हो जाए या संपर्क टूट जाए, तो तुरंत दूसरा अधिकारी जिम्मेदारी संभाल सके और व्यवस्था प्रभावित न हो।

इस व्यवस्था के तहत केवल शीर्ष नेतृत्व ही नहीं, बल्कि कई स्तरों पर कमांडर और अधिकारियों के लिए भी उत्तराधिकारी तय किए गए हैं। इसके अलावा एक सीमित आंतरिक समूह भी बनाया गया है, जो आपात स्थिति में स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने में सक्षम होता है।

लंबे युद्ध की रणनीति पर आधारित सोच

विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की यह सैन्य सोच चीन के नेता माओ त्से-तुंग की “प्रोलॉन्ग्ड वॉर” यानी लंबे युद्ध की अवधारणा से प्रभावित है। इस सिद्धांत के अनुसार कमजोर पक्ष को तुरंत जीत हासिल करने के बजाय युद्ध को लंबा खींचकर ताकतवर दुश्मन के संसाधनों और इच्छाशक्ति को धीरे-धीरे कमजोर करना चाहिए।

ईरान का ध्यान त्वरित जीत पर नहीं बल्कि समय के साथ दुश्मन पर आर्थिक और राजनीतिक दबाव बढ़ाने पर केंद्रित है। इसी कारण ईरान सस्ते ड्रोन और मिसाइल तकनीक का उपयोग भी करता है, जिससे विरोधी देशों को महंगे रक्षा हथियारों का इस्तेमाल करना पड़ता है। ईरान का दावा है कि यही रणनीति उसे भारी नुकसान के बावजूद युद्ध जारी रखने की क्षमता देती है।

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Author: THE CG NEWS

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